दारानगर में 247 साल पुरानी कुप्पी युद्ध की परंपरा:दशमी को रावण की सेना पड़ी भारी, एकादशी को राम की सेना ने जीता कुप्पी युद्ध

दारानगर में 247 साल पुरानी कुप्पी युद्ध की परंपरा:दशमी को रावण की सेना पड़ी भारी, एकादशी को राम की सेना ने जीता कुप्पी युद्ध

कौशाम्बी के ऐतिहासिक कस्बे दारानगर में विजयदशमी पर विश्व प्रसिद्ध कुप्पी युद्ध की परंपरा निभाई गई। इस अनोखी रामलीला को देखने के लिए कौशाम्बी के अलावा आसपास के जिलों से भी हजारों लोग पहुंचे। यहां रावण का वध दशमी को नहीं, बल्कि एकादशी को किया जाता है। 1779 में शुरू हुई थी रामलीला दारानगर की रामलीला की शुरुआत 1779 में हुई थी। यह परंपरा लगातार 247 वर्षों से चली आ रही है। मान्यता है कि दशमी को रावण पराजित हुआ था, जबकि उसके प्राण एकादशी को निकले थे। इसी मान्यता के चलते यहां रावण वध एकादशी को किया जाता है। दो दिन चलता है कुप्पी युद्ध दारानगर का कुप्पी युद्ध दो दिन तक चलता है। पहले दिन दशमी को चार चरणों में युद्ध होता है। दूसरे दिन एकादशी को तीन चरणों में निर्णायक मुकाबला होता है। राम की सेना लाल और रावण की सेना काले कपड़े पहनकर मैदान में उतरती है। दोनों दलों में 20-20 सेनानी होते हैं। सीटी बजते ही एक-दूसरे पर बरसाते हैं कुप्पी आयोजकों की सीटी बजते ही दोनों सेनाएं प्लास्टिक से बनी कुप्पियों से एक-दूसरे पर हमला करती हैं। युद्ध का दृश्य बेहद रोमांचक होता है। पहले दिन रावण की सेना भारी पड़ती है, जबकि दूसरे दिन राम की सेना जीत हासिल करती है। यह मुकाबला असत्य पर सत्य की जीत का संदेश देता है। घायल सेनानी मिट्टी से करते हैं उपचार पहले कुप्पियां चमड़े और ऊंट की खाल से बनाई जाती थीं। अब प्लास्टिक की कुप्पियों का इस्तेमाल होता है। युद्ध के दौरान कई सेनानी घायल भी हो जाते हैं। परंपरा के अनुसार, वे रणभूमि की मिट्टी को ही घाव पर लगाते हैं। इस रामलीला में स्थानीय लोग ही अलग-अलग किरदार निभाते हैं।आयोजन के दौरान सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए डीएम, एसपी समेत प्रशासनिक अधिकारी मौजूद रहे। अधिकारियों की निगरानी में कार्यक्रम शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ।

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