रिश्वतखोरी की जांच के लिए पूर्व मंजूरी जरूरी नहीं: Supreme Court

रिश्वतखोरी की जांच के लिए पूर्व मंजूरी जरूरी नहीं: Supreme Court

उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत, किसी सरकारी कर्मचारी द्वारा कथित तौर पर रिश्वत मांगने के मामले की जांच के लिए पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं है क्योंकि यह कृत्य आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन से जुड़ा हुआ नहीं है। न्यायमूर्ति एस.वी.एन. भट्टी और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने 16 अक्टूबर को दिए गए अपने फैसले में यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की। इस फैसले के जरिए, पीठ ने राजस्थान पुलिस के एक कांस्टेबल की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें उसने अपने खिलाफ भ्रष्टाचार का आरोप तय किए जाने को चुनौती दी थी।

पीठ के लिए फैसला लिखते हुए, न्यायमूर्ति अंजारिया ने राजस्थान उच्च न्यायालय के उस निर्णय को बरकरार रखा, जिसमें कांस्टेबल तेजाराम के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 के तहत आरोप तय करने वाली अधीनस्थ अदालत के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था। अधिनियम की धारा 7 (2018 में संशोधित), उन लोक सेवकों को दंडित करने का प्रावधान करती है जो अपने सार्वजनिक कर्तव्यों का अनुचित या बेईमानी से पालन करने के लिए कोई गैर-वाजिब लाभ प्राप्त करते हैं, या इसे हासिल करने का प्रयास करते हैं। शीर्ष अदालत ने कांस्टेबल के इस बचाव को खारिज कर दिया कि लोक सेवकों द्वारा अपने आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान लिए गए निर्णयों या की गई अनुशंसा से जुड़े कुछ अपराधों की जांच या पूछताछ के लिए, अधिनियम की धारा 17ए के तहत जांच एजेंसी ने पूर्व अनुमति नहीं ली थी।

धारा 17ए उन अपराधों की जांच या पूछताछ से संबंधित है, जो लोक सेवकों द्वारा अपने आधिकारिक कार्यों या कर्तव्यों का पालन करते समय की गई अनुशंसा या लिए गए निर्णयों से संबंधित हैं। विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए, इस निर्णय में कहा गया कि धन का दुरुपयोग, खातों में हेराफेरी, धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात और रिश्वत लेने जैसे अपराध इस प्रावधान के दायरे से बाहर हैं। अधिनियम की धारा 17ए के लागू होने के दायरे और विस्तार के संबंध में दिए गए फैसलों से कानून की एक स्पष्ट स्थिति सामने आती है।

इस धारा के तहत किसी लोक सेवक के खिलाफ जांच या पूछताछ शुरू करने से पहले पूर्व अनुमति लेना आवश्यक है। न्यायालय के निर्णय के अनुसार, ‘‘इस प्रावधान की भाषा ही इसके लागू होने के दायरे को तय और सीमित करती है। इस धारा में सबसे महत्वपूर्ण वाक्य आधिकारिक कार्यों या कर्तव्यों का निर्वहन है।’’
हालांकि, शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि कानून बनाने वाली संस्था (विधायिका) का मकसद धारा 17ए को कानून में शामिल करके लोक सेवक को मुकदमे से बचाना था।

इस बात को ध्यान में रखते हुए कि इस धारा को ‘‘सर्वव्यापी’’ नहीं माना जा सकता, निर्णय में कहा गया है, ‘‘भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए के प्रावधान लागू होने के लिए, किसी लोक सेवक द्वारा कोई निर्णय लिया जाना या ‘अनुशंसा’ आवश्यक है, जिनके खिलाफ जांच या पूछताछ शुरू की जानी है।’’
इसमें कहा गया है, ‘‘इस तरह का निर्णय या अनुशंसा , किसी लोक सेवक द्वारा अपने आधिकारिक कार्यों या कर्तव्यों का पालन करते समय लिया गया निर्णय या की गई अनुशंसा होगी।’’
मामले के रिकॉर्ड के अनुसार, तेजाराम राजस्थान के सिरोही में पुलिस उपाधीक्षक के कार्यालय में तैनात था। एक सहकर्मी कांस्टेबल, देवेंद्र कुमार ने 22 अप्रैल 2021 की एक ईमेल शिकायत में आरोप लगाया कि तेजाराम ने पुलिस अधीक्षक की ओर से 1.5 लाख रुपये की मांग की। चार जून 2021 को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7ए और भारतीय दंड संहिता की धारा 120बी (आपराधिक साजिश) के तहत एक प्राथमिकी दर्ज की गई।

तेजाराम को एक सितंबर 2021 को गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद आठ दिसंबर 2023 को अधिनियम की धारा 19 के तहत मुकदमा चलाने की मंजूरी मिलने के बाद, 19 जनवरी 2024 को आरोपपत्र दाखिल किया गया। राजस्थान के पाली में एक विशेष अदालत ने 12 सितंबर 2024 को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 के तहत आरोप तय किए।

तेजाराम ने इस आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी, जिसने 26 मार्च 2025 को उसकी पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी। इसके बाद उसने उच्चतम न्यायालय का रुख किया था।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *