गुरुग्राम में ₹190 करोड़ के GST घोटाले का आरोपी बरी:20 तारीखों पर पुख्ता दस्तावेज-गवाह पेश नहीं हुए, जज बोले-गिरफ्तारी दोषी बनाने का आधार नहीं

गुरुग्राम में ₹190 करोड़ के GST घोटाले का आरोपी बरी:20 तारीखों पर पुख्ता दस्तावेज-गवाह पेश नहीं हुए, जज बोले-गिरफ्तारी दोषी बनाने का आधार नहीं

गुरुग्राम में 190 करोड़ रुपए के कथित जीएसटी इनपुट टैक्स क्रेडिट घोटाले के मुख्य आरोपी मोहम्मद शमशाद सैफी को कोर्ट सभी आरोपों से बरी कर दिया है। अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (ACJM) मनीष कुमार की कोर्ट ने पाया कि गुड्स एंड सर्विस टैक्स इंटेलिजेंस विभाग आरोपी के खिलाफ कोर्ट में ठोस सबूत या गवाह पेश करने में पूरी तरह नाकाम रहा है। कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि केवल विभाग के दावों या गिरफ्तारी के आधार पर किसी व्यक्ति पर आरोप तय नहीं किए जा सकते। यह मामला गुड्स एंड सर्विस टैक्स इंटेलिजेंस (जीडीडीआई) की गुरुग्राम जोनल यूनिट द्वारा दर्ज कराया गया था। विभाग ने दिल्ली के लक्ष्मी नगर निवासी मोहम्मद शमशाद सैफी पर आरोप लगाया था कि वह देशभर में फर्जी और गैर-मौजूद कंपनियां बनाने के सिंडिकेट में शामिल था। 190 करोड़ रुपए का इनपुट टैक्स क्रेडिट लेने का आरोप शिकायत के अनुसार, मैसर्स टेक्नो इलेक्ट्रिकल एंड सेल्स और मैसर्स लता सेल्स जैसी फर्जी फर्म बनाई गईं, जिनका उद्देश्य बिना किसी माल या सेवा की वास्तविक आपूर्ति के केवल गुड्स-लेस इनवॉइस (फर्जी बिल) जारी करना था। इन जाली बिलों के माध्यम से विभिन्न संस्थाओं को लगभग 190 करोड़ रुपए का इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) अवैध रूप से ट्रांसफर कर सरकार को भारी वित्तीय चपत लगाने का आरोप था। इस मामले में आरोपी को 9 अक्टूबर 2020 को सीजीएसटी अधिनियम की धारा 69 के तहत गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेजा गया था। कोर्ट ने अपने आदेश में साफ किया कि विभाग ने शुरुआत में जितने गंभीर दावे किए थे, वह उन्हें कानूनी रूप से साबित करने में पूरी तरह विफल रहा। कोर्ट में इसलिए कमजोर पड़ा जीडीडीआई का पक्ष… पांच गवाह, पेश किया सिर्फ एक: शिकायतकर्ता विभाग ने कोर्ट को कुल छह गवाहों की सूची सौंपी थी, जिसमें जांच, छापेमारी और बयान दर्ज करने वाले कई अधिकारी शामिल थे। हालांकि, पूरे मामले में विभाग केवल एक ही गवाह वरिष्ठ खुफिया अधिकारी रामाशीष शर्मा को कोर्ट के सामने पेश कर सका। बाकी पांच गवाहों को कभी कोर्ट में पेश ही नहीं कराया गया। एकमात्र गवाह के बयानों में विरोधाभास: विभाग के इकलौते गवाह रामाशीष शर्मा ने क्रॉस एक्जामिनेशन के दौरान कोर्ट में यह स्वीकार किया कि उन्हें व्यक्तिगत रूप से इस मामले में शामिल सटीक फर्जी राशि की जानकारी नहीं है। इसके अलावा उन्होंने यह भी माना कि वह आरोपी के ठिकानों या कथित फर्जी कंपनियों पर की गई किसी भी छापेमारी या तलाशी टीम का हिस्सा नहीं थे। दस्तावेजी सबूतों का पूर्ण अभाव: सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि करोड़ों रुपए के इस वित्तीय घोटाले में विभाग कोर्ट के समक्ष कोई भी प्राथमिक दस्तावेजी सबूत साबित नहीं कर सका। कोर्ट रूम में न तो कोई पंचनामा पेश हुआ, न बैंक स्टेटमेंट, न ही कोई जीएसटी रिटर्न या इनवॉइस की कॉपियां पेश की जा सकी। विभाग ने केवल शिकायत दर्ज करने का आधिकारिक अथॉराइजेशन लेटर पेश किया था, जो केस साबित करने के लिए नाकाफी था। कोर्ट ने की सख्त टिप्पणी एसीजेएम कोर्ट ने अपने फैसले में विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने रिकॉर्ड पर दर्ज किया कि विभाग को अपने प्री-चार्ज सबूत पेश करने के लिए 29 मई 2023 से 13 अक्टूबर 2025 के बीच 20 से अधिक तारीखें दी गई थी। इसके बावजूद विभाग सबूत पूरे नहीं कर पाया, जिसके चलते अक्टूबर 2025 में कोर्ट ने विभाग की गवाही का अवसर बंद कर दिया था। इसके अलावा, केस की अंतिम बहसों के दौरान भी 12 अक्टूबर, 16 अक्टूबर और फैसले के दिन 17 अक्टूबर 2026 को विभाग की ओर से कोई भी वकील या प्रतिनिधि कोर्ट में उपस्थित नहीं हुआ। कोर्ट ने कहा कि विभाग के इस रवैये से मामले को लेकर उनकी गंभीरता की कमी साफ झलकती है। आरोपी बरी, बेल बॉन्ड जारी किए जज मनीष कुमार ने फैसला सुनाते हुए कहा कि एकमात्र गवाह की गवाही पूरी तरह से अधूरी, अपर्याप्त और सुनी-सुनाई बातों पर आधारित है। 5 साल तक की सजा वाले इतने गंभीर आर्थिक अपराध में बिना किसी ठोस मौखिक या दस्तावेजी साक्ष्य के आरोप तय नहीं किए जा सकते। प्रथम दृष्टया कोई मामला न बनता देख, कोर्ट ने शमशाद सैफी को आरोपों से पूरी तरह बरी कर दिया और उनके बेल बॉन्ड भी डिस्चार्ज कर दिए।

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