गिरिडीह के बनियाडीह में सेंट्रल दुर्गा पूजा समिति की पूजा 100 साल से हो रही है। इसकी खास पहचान बंगाली रीति-रिवाज, वैष्णवी पूजा और भव्य मेला है। सबसे अनोखी बात यह है कि यहां मां दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन कंधे पर उठाकर किया जाता है। इस पूजा की शुरुआत अंग्रेजी शासन के समय हुई थी। तब कोयलवारी में काम करने वाले बंगाली लोगों ने वर्कशॉप के पास इसे शुरू किया था। बाद में पूजा स्थल बदला गया और अब यह पूरे कोयलांचल में जानी जाती है। पुरानी परंपराएं आज भी निभाई जाती हैं। यहां मां दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन विजयादशमी के अगले दिन होता है। यह वर्करों की सुविधा के लिए किया जाता है। भक्त और समिति सदस्य मां की प्रतिमा को कंधे पर उठाकर विसर्जन के लिए निकलते हैं। मां दुर्गा की प्रतिमा करीब 25 से 30 फीट ऊंची होती है। इतनी बड़ी प्रतिमा को कंधे पर ले जाते देखने के लिए भारी भीड़ जुटती है। विसर्जन के समय लोग मां को अगले साल फिर आने की प्रार्थना के साथ विदाई देते हैं। एक घंटे की आरती में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं बनियाडीह सेंट्रल दुर्गा पूजा में बंगाली विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। यहां की भव्य आरती भी श्रद्धालुओं के बीच विशेष आकर्षण का केंद्र रहती है। शाम के समय होने वाली लगभग एक घंटे की आरती में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं। इस दौरान पारंपरिक धार्मिक विधियों के साथ मां दुर्गा की आराधना की जाती है। पूजा समिति के सदस्य पूरे आयोजन को व्यवस्थित तरीके से संपन्न कराने में जुटे रहते हैं। यहां वैष्णवी पूजा पद्धति का पालन किया जाता है। बंगाल, बिहार और ओडिशा से पहुंचे हैं श्रद्धालु पूजा के दौरान आसपास के गांवों के अलावा बंगाल, बिहार और ओडिशा में रहने वाले ऐसे लोग भी बनियाडीह पहुंचते हैं, जिनका इस क्षेत्र से पुराना जुड़ाव रहा है। दुर्गा पूजा उनके लिए अपने लोगों से मिलने और अपनी परंपराओं से जुड़ने का भी अवसर बनती है। बनियाडीह सेंट्रल दुर्गा पूजा के साथ लगने वाला मेला भी काफी पुराना है। पूजा समिति के अध्यक्ष प्रमोद सिंह के अनुसार, यहां वर्ष 1940 से मेले का आयोजन किया जा रहा है। हर साल मेले में बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। पूजा परिसर और आसपास के इलाके में उत्सव जैसा माहौल रहता है। बंगाली रीति-रिवाज से मां दुर्गा की पूजा की जाती है प्रमोद सिंह ने बताया कि बनियाडीह में दुर्गा पूजा के अलावा लक्ष्मी पूजा और काली पूजा का आयोजन भी किया जाता है। इस तरह यहां धार्मिक आयोजनों की एक लंबी परंपरा रही है, जिसमें स्थानीय लोगों की भागीदारी महत्वपूर्ण है। स्थानीय निवासी शिवांश तिवारी ने बताया कि बनियाडीह की दुर्गा पूजा आजादी से पहले से होती आ रही है। यहां बंगाली रीति-रिवाज से मां दुर्गा की पूजा की जाती है। लगभग एक घंटे तक चलने वाली भव्य आरती में सैकड़ों श्रद्धालु शामिल होते हैं। विसर्जन के दौरान भी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ जुटती है उन्होंने बताया कि मेले में बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं और पूजा समिति के कार्यकर्ता पूरे आयोजन को संभालने में सहयोग करते हैं। साथ कहा कि कांधे पर 25 से 30 फीट ऊंची मां दुर्गा की प्रतिमा लेकर विसर्जन करना यहां की सबसे खास परंपरा है। इसे देखने के लिए विसर्जन के दौरान भी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ जुटती है। करीब एक सदी से चली आ रही यह पूजा आज भी बनियाडीह की धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए हुए है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोग इस परंपरा से जुड़ते आ रहे हैं। मां दुर्गा के प्रति अटूट विश्वास, पारंपरिक पूजा पद्धति और सामूहिक भागीदारी ने बनियाडीह सेंट्रल दुर्गा पूजा को कोयलांचल क्षेत्र की विशिष्ट पहचान दिलाई है। गिरिडीह के बनियाडीह में सेंट्रल दुर्गा पूजा समिति की पूजा 100 साल से हो रही है। इसकी खास पहचान बंगाली रीति-रिवाज, वैष्णवी पूजा और भव्य मेला है। सबसे अनोखी बात यह है कि यहां मां दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन कंधे पर उठाकर किया जाता है। इस पूजा की शुरुआत अंग्रेजी शासन के समय हुई थी। तब कोयलवारी में काम करने वाले बंगाली लोगों ने वर्कशॉप के पास इसे शुरू किया था। बाद में पूजा स्थल बदला गया और अब यह पूरे कोयलांचल में जानी जाती है। पुरानी परंपराएं आज भी निभाई जाती हैं। यहां मां दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन विजयादशमी के अगले दिन होता है। यह वर्करों की सुविधा के लिए किया जाता है। भक्त और समिति सदस्य मां की प्रतिमा को कंधे पर उठाकर विसर्जन के लिए निकलते हैं। मां दुर्गा की प्रतिमा करीब 25 से 30 फीट ऊंची होती है। इतनी बड़ी प्रतिमा को कंधे पर ले जाते देखने के लिए भारी भीड़ जुटती है। विसर्जन के समय लोग मां को अगले साल फिर आने की प्रार्थना के साथ विदाई देते हैं। एक घंटे की आरती में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं बनियाडीह सेंट्रल दुर्गा पूजा में बंगाली विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। यहां की भव्य आरती भी श्रद्धालुओं के बीच विशेष आकर्षण का केंद्र रहती है। शाम के समय होने वाली लगभग एक घंटे की आरती में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं। इस दौरान पारंपरिक धार्मिक विधियों के साथ मां दुर्गा की आराधना की जाती है। पूजा समिति के सदस्य पूरे आयोजन को व्यवस्थित तरीके से संपन्न कराने में जुटे रहते हैं। यहां वैष्णवी पूजा पद्धति का पालन किया जाता है। बंगाल, बिहार और ओडिशा से पहुंचे हैं श्रद्धालु पूजा के दौरान आसपास के गांवों के अलावा बंगाल, बिहार और ओडिशा में रहने वाले ऐसे लोग भी बनियाडीह पहुंचते हैं, जिनका इस क्षेत्र से पुराना जुड़ाव रहा है। दुर्गा पूजा उनके लिए अपने लोगों से मिलने और अपनी परंपराओं से जुड़ने का भी अवसर बनती है। बनियाडीह सेंट्रल दुर्गा पूजा के साथ लगने वाला मेला भी काफी पुराना है। पूजा समिति के अध्यक्ष प्रमोद सिंह के अनुसार, यहां वर्ष 1940 से मेले का आयोजन किया जा रहा है। हर साल मेले में बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। पूजा परिसर और आसपास के इलाके में उत्सव जैसा माहौल रहता है। बंगाली रीति-रिवाज से मां दुर्गा की पूजा की जाती है प्रमोद सिंह ने बताया कि बनियाडीह में दुर्गा पूजा के अलावा लक्ष्मी पूजा और काली पूजा का आयोजन भी किया जाता है। इस तरह यहां धार्मिक आयोजनों की एक लंबी परंपरा रही है, जिसमें स्थानीय लोगों की भागीदारी महत्वपूर्ण है। स्थानीय निवासी शिवांश तिवारी ने बताया कि बनियाडीह की दुर्गा पूजा आजादी से पहले से होती आ रही है। यहां बंगाली रीति-रिवाज से मां दुर्गा की पूजा की जाती है। लगभग एक घंटे तक चलने वाली भव्य आरती में सैकड़ों श्रद्धालु शामिल होते हैं। विसर्जन के दौरान भी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ जुटती है उन्होंने बताया कि मेले में बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं और पूजा समिति के कार्यकर्ता पूरे आयोजन को संभालने में सहयोग करते हैं। साथ कहा कि कांधे पर 25 से 30 फीट ऊंची मां दुर्गा की प्रतिमा लेकर विसर्जन करना यहां की सबसे खास परंपरा है। इसे देखने के लिए विसर्जन के दौरान भी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ जुटती है। करीब एक सदी से चली आ रही यह पूजा आज भी बनियाडीह की धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए हुए है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोग इस परंपरा से जुड़ते आ रहे हैं। मां दुर्गा के प्रति अटूट विश्वास, पारंपरिक पूजा पद्धति और सामूहिक भागीदारी ने बनियाडीह सेंट्रल दुर्गा पूजा को कोयलांचल क्षेत्र की विशिष्ट पहचान दिलाई है।

