छत्तीसगढ़ के जनजातीय इलाकों में तिलहन की खेती बढ़ाने और किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए रायपुर में कार्यशाला आयोजित की गई। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय में हुई इस कार्यशाला में 40 से ज्यादा किसान और वैज्ञानिक शामिल हुए। किसानों को रामतिल, सूरजमुखी, कुसुम, तिल, अलसी और सरसों के बीज बांटे गए। साथ ही अच्छी पैदावार के लिए उन्नत किस्मों के बीज, वैज्ञानिक तरीके से खेती और फसलों की देखभाल की जानकारी दी गई कार्यशाला भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के भारतीय तिलहन अनुसंधान संस्थान, हैदराबाद के सहयोग से आयोजित की गई। इसमें बस्तर, सरगुजा और मैदानी इलाकों से आए किसानों को तिलहन की अलग-अलग फसलों और उनकी खेती के तरीकों के बारे में बताया गया। किसानों को रायपुर में तिलहन फसलों और उनसे जुड़े उत्पाद तैयार करने की तकनीकों का प्रदर्शन भी दिखाया गया। अलसी के डंठल से धागा और कपड़ा बनाने की तकनीक देखी कार्यक्रम के दौरान भारतीय तिलहन अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ. आर.के. माथुर ने बेमेतरा में अलसी के डंठल से धागा और कपड़ा बनाने की तकनीक का जायजा लिया। उन्होंने कहा कि इस तकनीक से किसानों को कमाई का एक अतिरिक्त जरिया मिल सकता है। इससे फसल के उस हिस्से का भी उपयोग हो सकेगा, जो आमतौर पर खेती के बाद बच जाता है। बेहतर बीज और वैज्ञानिक खेती पर जोर कार्यशाला में किसानों को मिट्टी की सेहत बनाए रखने, खरपतवार नियंत्रित करने और खेती में मशीनों के इस्तेमाल की जानकारी दी गई। वैज्ञानिकों ने खेतों में नई तकनीकों का प्रदर्शन करने, किसानों को प्रशिक्षण देने, फसल का सही तरीके से भंडारण करने और बाजार से बेहतर जुड़ाव बनाने पर भी जोर दिया। विश्वविद्यालय के कुलपति ने कहा कि तिलहन फसलों की पैदावार बढ़ाने के लिए किसानों को खेती के उन्नत तरीके अपनाने होंगे। इससे किसानों की आमदनी बढ़ाने के साथ देश को खाद्य तेल के उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने में मदद मिलेगी। कार्यशाला में विश्वविद्यालय के संचालक अनुसंधान सेवाएं डॉ. विवेक त्रिपाठी, जनजातीय उप-योजना कार्यक्रम के प्रभारी डॉ. जी. सुरेश, प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. संजय के. द्विवेदी और विभिन्न केंद्रों के वैज्ञानिक भी शामिल हुए।

