मई 2027 में पंचायत चुनाव होने पर सवाल:ट्रिपल टेस्ट पर फैसला नहीं, एसआईआर धीमी; समय पर पंचायत चुनाव मुश्किल

मई 2027 में पंचायत चुनाव होने पर सवाल:ट्रिपल टेस्ट पर फैसला नहीं, एसआईआर धीमी; समय पर पंचायत चुनाव मुश्किल

आरक्षण निर्धारण में देरी व लंबी बूथ मैपिंग प्रक्रिया से फंसा मामला झारखंड में मई 2027 में प्रस्तावित त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव एक बार फिर अनिश्चितता के भंवर में फंस सकता है। ट्रिपल टेस्ट के पेंच और मतदाता सूची पुनरीक्षण (एसआईआर) की धीमी रफ्तार को देखते हुए समय पर पंचायत चुनाव होने पर संशय है। मई 2022 में चार चरणों में संपन्न हुए त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के बाद नियमानुसार अगला चुनाव मई 2027 तक हो जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार निकाय और पंचायत चुनावों में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण तय करने के लिए ‘ट्रिपल टेस्ट’ अनिवार्य है।
राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग ट्रिपल टेस्ट के लिए तैयार है। बावजूद राज्य कैबिनेट की ओर से अब तक इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है। दूसरी ओर एसआईआर और उसके बाद बूथवार विखंडन की प्रक्रिया में लगनेवाले समय ने 2027 में समय पर चुनाव कराने के दावों पर सवाल खड़ा कर दिया है। मतदाता सूची के अंतिम प्रकाशन के बाद बूथवार नाम छांटने का काम शुरू होगा, जो जटिल व समय लगनेवाली प्रक्रिया अभी राज्य में एसआईआर का काम चल रहा है। मतदाता सूची के अंतिम प्रकाशन के बाद ही राज्य चुनाव आयोग मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी कार्यालय से पूरे राज्य के मतदाताओं की सूची मांगेगा। उसके बाद पंचायतों के वार्ड और बूथों के अनुसार मतदाताओं के नाम अलग-अलग करने (विखंडन) का काम शुरू होगा। राज्य की 4,345 ग्राम पंचायतों, 264 पंचायत समितियों और 24 जिला परिषदों में लाखों मतदाताओं की बूथ-वार मैपिंग अपने आप में जटिल और समय लेनेवाली प्रक्रिया है। इसमें प्रशासनिक मशीनरी को कम से कम 6 से 8 महीने का समय लगता है। क्या है ट्रिपल टेस्ट का पेंच
जब तक ट्रिपल टेस्ट के आधार पर सीटों का आरक्षण तय नहीं होता, तब तक राज्य निर्वाचन आयोग चुनावी प्रक्रिया का प्रारूप तैयार नहीं कर सकता। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार स्थानीय निकायों में ओबीसी आरक्षण देने से पहले तीन चरणों की प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
स्वतंत्र आयोग का गठन : स्थानीय निकायों में पिछड़ेपन की प्रकृति और प्रभाव की जांच के लिए एक स्वतंत्र आयोग को इसकी जिम्मेवारी देना होगा।
आंकड़ों का संग्रह : आयोग द्वारा स्थानीय निकायों के अनुसार पिछड़ेपन के ठोस और वैज्ञानिक आंकड़े जुटाना।
50% की सीमा : कुल आरक्षण (अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी मिलाकर) किसी भी स्थिति में 50 प्रतिशत की सीमा को पार न करे।
प्रशासनिक ढिलाई : वर्ष 2015 में हुए पंचायत चुनावों के बाद अगला चुनाव 2020 में होना था, लेकिन पहले प्रशासनिक देरी और फिर कोविड-19 महामारी का हवाला देकर इसे टाला जाता रहा। नतीजतन, चुनाव मई 2022 में जाकर कराया जा सका था । अब एक बार फिर वही स्थिति बनती दिख रही है। कैबिनेट को जल्द लेना होगा ट्रिपल टेस्ट पर फैसला
प्रशासनिक जानकारों का मानना है कि यदि सरकार वाकई समय पर चुनाव कराना चाहती है, तो कैबिनेट को तुरंत ट्रिपल टेस्ट पर फैसला लेना होगा। चूंकि राज्य की सभी पंचायतों में ओबीसी -1, ओबीसी -2, एससी और एसटी के वोटरों की गणना करनी होगी, ऐसे में इसमें काफी समय लगेगा। नगर निकाय चुनाव के दौरान पूर्व में हुए ट्रिपल टेस्ट के दौरान इसकी जटिलता सामने आई थी। उस समय करीब चार महीने लगे थे। अब जबकि पंचायतों में यह ट्रिपल टेस्ट होना है, तब यह अवधि दोगुनी हो सकती है। ट्रिपल टेस्ट के बाद ही राज्य निर्वाचन आयोग को आगे की चुनावी प्रक्रिया शुरू करेगा। अन्यथा, 2022 की तरह एक बार फिर पंचायत चुनाव में देरी होगी। विकास कार्यों पर असर : यदि मई 2027 तक पंचायत चुनाव नहीं हो पाते हैं, तो पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होते ही ग्रामीण क्षेत्रों में विकास कार्य प्रभावित हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में सरकार को या तो प्रशासकों की नियुक्ति करनी होगी या वैकल्पिक व्यवस्था लागू करनी होगी, जिससे सीधे तौर पर त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था का मूल उद्देश्य ‘सत्ता का विकेंद्रीकरण’ कमजोर पड़ेगा। आरक्षण निर्धारण में देरी व लंबी बूथ मैपिंग प्रक्रिया से फंसा मामला झारखंड में मई 2027 में प्रस्तावित त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव एक बार फिर अनिश्चितता के भंवर में फंस सकता है। ट्रिपल टेस्ट के पेंच और मतदाता सूची पुनरीक्षण (एसआईआर) की धीमी रफ्तार को देखते हुए समय पर पंचायत चुनाव होने पर संशय है। मई 2022 में चार चरणों में संपन्न हुए त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के बाद नियमानुसार अगला चुनाव मई 2027 तक हो जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार निकाय और पंचायत चुनावों में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण तय करने के लिए ‘ट्रिपल टेस्ट’ अनिवार्य है।
राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग ट्रिपल टेस्ट के लिए तैयार है। बावजूद राज्य कैबिनेट की ओर से अब तक इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है। दूसरी ओर एसआईआर और उसके बाद बूथवार विखंडन की प्रक्रिया में लगनेवाले समय ने 2027 में समय पर चुनाव कराने के दावों पर सवाल खड़ा कर दिया है। मतदाता सूची के अंतिम प्रकाशन के बाद बूथवार नाम छांटने का काम शुरू होगा, जो जटिल व समय लगनेवाली प्रक्रिया अभी राज्य में एसआईआर का काम चल रहा है। मतदाता सूची के अंतिम प्रकाशन के बाद ही राज्य चुनाव आयोग मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी कार्यालय से पूरे राज्य के मतदाताओं की सूची मांगेगा। उसके बाद पंचायतों के वार्ड और बूथों के अनुसार मतदाताओं के नाम अलग-अलग करने (विखंडन) का काम शुरू होगा। राज्य की 4,345 ग्राम पंचायतों, 264 पंचायत समितियों और 24 जिला परिषदों में लाखों मतदाताओं की बूथ-वार मैपिंग अपने आप में जटिल और समय लेनेवाली प्रक्रिया है। इसमें प्रशासनिक मशीनरी को कम से कम 6 से 8 महीने का समय लगता है। क्या है ट्रिपल टेस्ट का पेंच
जब तक ट्रिपल टेस्ट के आधार पर सीटों का आरक्षण तय नहीं होता, तब तक राज्य निर्वाचन आयोग चुनावी प्रक्रिया का प्रारूप तैयार नहीं कर सकता। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार स्थानीय निकायों में ओबीसी आरक्षण देने से पहले तीन चरणों की प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
स्वतंत्र आयोग का गठन : स्थानीय निकायों में पिछड़ेपन की प्रकृति और प्रभाव की जांच के लिए एक स्वतंत्र आयोग को इसकी जिम्मेवारी देना होगा।
आंकड़ों का संग्रह : आयोग द्वारा स्थानीय निकायों के अनुसार पिछड़ेपन के ठोस और वैज्ञानिक आंकड़े जुटाना।
50% की सीमा : कुल आरक्षण (अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी मिलाकर) किसी भी स्थिति में 50 प्रतिशत की सीमा को पार न करे।
प्रशासनिक ढिलाई : वर्ष 2015 में हुए पंचायत चुनावों के बाद अगला चुनाव 2020 में होना था, लेकिन पहले प्रशासनिक देरी और फिर कोविड-19 महामारी का हवाला देकर इसे टाला जाता रहा। नतीजतन, चुनाव मई 2022 में जाकर कराया जा सका था । अब एक बार फिर वही स्थिति बनती दिख रही है। कैबिनेट को जल्द लेना होगा ट्रिपल टेस्ट पर फैसला
प्रशासनिक जानकारों का मानना है कि यदि सरकार वाकई समय पर चुनाव कराना चाहती है, तो कैबिनेट को तुरंत ट्रिपल टेस्ट पर फैसला लेना होगा। चूंकि राज्य की सभी पंचायतों में ओबीसी -1, ओबीसी -2, एससी और एसटी के वोटरों की गणना करनी होगी, ऐसे में इसमें काफी समय लगेगा। नगर निकाय चुनाव के दौरान पूर्व में हुए ट्रिपल टेस्ट के दौरान इसकी जटिलता सामने आई थी। उस समय करीब चार महीने लगे थे। अब जबकि पंचायतों में यह ट्रिपल टेस्ट होना है, तब यह अवधि दोगुनी हो सकती है। ट्रिपल टेस्ट के बाद ही राज्य निर्वाचन आयोग को आगे की चुनावी प्रक्रिया शुरू करेगा। अन्यथा, 2022 की तरह एक बार फिर पंचायत चुनाव में देरी होगी। विकास कार्यों पर असर : यदि मई 2027 तक पंचायत चुनाव नहीं हो पाते हैं, तो पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होते ही ग्रामीण क्षेत्रों में विकास कार्य प्रभावित हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में सरकार को या तो प्रशासकों की नियुक्ति करनी होगी या वैकल्पिक व्यवस्था लागू करनी होगी, जिससे सीधे तौर पर त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था का मूल उद्देश्य ‘सत्ता का विकेंद्रीकरण’ कमजोर पड़ेगा।  

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