आर्सेनिक, पानी में मिले इस जहर से बिहार के 5 करोड़ लोगों को कैंसर का खतरा है। जमीन के नीचे मौजूद पानी में घुले आर्सेनिक की काट दो भाइयों के स्कूल प्रोजेक्ट से निकली है। इन्होंने ऐसी मशीन बनाई है जो हजारों लोगों की जान बचा रही है। बिना बिजली और मोटे खर्च के कैसे पानी से आर्सेनिक हटाने वाली मशीन काम कर रही है? इस मशीन को बनाने के पीछे की क्या कहानी है? आर्सेनिक क्यों खतरनाक है? आइए अर्पित की जुबानी समझते हैं…। सवाल-1: कौन हैं दो भाई जिनके स्कूल प्रोजेक्ट से बच रही हजारों जानें जवाब: मेरा नाम अर्पित और मेरे भाई का नाम और अभिजीत है। दोनों मूल रूप से बिहार के लखीसराय जिले के बड़हिया गांव के रहने वाले हैं। 2010 में हमारा परिवार गांव से पटना आ गया। पिताजी उपेंद्र कुमार एक प्राइवेट अस्पताल में ओटी असिस्टेंट हैं। उस समय उनकी तनख्वाह 6,000 रुपए महीना थी। मां रीता कुमारी साइंस बैकग्राउंड से हैं। आर्थिक स्थिति खराब होने के चलते वह आगे पढ़ न सकीं। उनकी एक ही जिद थी कि बच्चे अच्छी पढ़ाई कर सकें। पांचवीं तक मैंने दिल्ली में संत निरंकारी मिशन के स्कूल में पढ़ाई की। इस स्कूल में मेरी मां को नौकरी मिल गई थी। फिर पटना लौटकर छठी से आठवीं तक सरकारी मिडिल स्कूल में पढ़ा। पिताजी की तनख्वाह करीब 20 हजार रुपए हुई तब मेरा दाखिला होली मिशन सेकेंडरी स्कूल में हुआ। आगे मैंने MAHE मणिपाल से फिजिक्स (ऑनर्स) में बी.एससी. की। आज मैं नवमार्ग रिसर्च एंड इनोवेशन प्राइवेट लिमिटेड का फाउंडर और CEO हूं। मेरा छोटा भाई अभिजीत कुमार को-फाउंडर और CTO है। वह IIT पटना से कंप्यूटर साइंस पढ़ रहा है। सवाल- 2: क्लास 9 में आर्सेनिक हटाने वाली मशीन बनाने की क्या कहानी है? जवाब: उस समय मैं पटना के होली मिशन सेकेंडरी स्कूल में नौवीं क्लास में पढ़ रहा था। अभिजीत सातवीं क्लास में था। पानी से आर्सेनिक हटाने वाली मशीन से जुड़ा प्रोजेक्ट स्कूल में नहीं, बल्कि बिहार बाल भवन किलकारी में बना। हम 2017-18 बैच के छात्र थे। स्कूल के बाद रोज दोपहर 2 बजे के बाद और शनिवार-रविवार पूरे दिन वहीं रहते थे। किलकारी में हर बच्चे को दो-तीन महीने का एक प्रोजेक्ट मिलता है, जिस पर काम करके रिपोर्ट देनी होती है। जून 2018 में साइंस इंस्ट्रक्टर ने टॉपिक दिया, ‘बिहार में आर्सेनिक प्रदूषण कितना फैला है और बढ़ क्यों रहा है।’ सर्वे के साथ हमने रिसर्च पेपर पढ़ने शुरू किए। उसी दौरान टोक्यो यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर यामागुची का एक पेपर मिला, जिसमें धातुओं के मैग्नेटिक गुणों पर काम था। वहीं से हमारे मन में सवाल उठा कि क्या चुंबक की मदद से पानी से आर्सेनिक अलग किया जा सकता है। हमने पहले इलेक्ट्रोमैग्नेट और अलग-अलग आकार के चुंबक आजमाए, लेकिन जरूरत जितना तेज मैग्नेटिक फील्ड नहीं बन पाया। फिर हमने नियोडिमियम-आयरन-बोरॉन (NdFeB) के स्थायी चुंबक इस्तेमाल किए। ये 15-20 साल तक अपनी ताकत बनाए रखते हैं। असली काम चुंबकों को ऐसी बनावट में लगाने का था कि पानी के दबाव में भी आर्सेनिक के कण अलग हो जाएं। आर्सेनिक हटाने के लिए इसमें न बिजली लगती है, न केमिकल। सवाल- 3: आर्सेनिक और इसके असर के बारे में कैसे पता चला? जवाब: शुरुआत उसी सर्वे से हुई। गंगा के मैदानी इलाकों में जमीन के नीचे के पानी में आर्सेनिक प्राकृतिक रूप से घुला रहता है। WHO की सुरक्षित सीमा 10 माइक्रोग्राम प्रति लीटर है, जबकि बिहार में हमें कई जगह इससे दस-बीस गुना ज्यादा आर्सेनिक मिला। महावीर कैंसर संस्थान पटना के डॉ. अरुण कुमार की टीम आर्सेनिक और कैंसर पर रिसर्च करती है। वे हमारे मेंटर हैं। जिन इलाकों में हमने यूनिट लगाई वहां के मरीजों के खून, बाल, नाखून और मां के दूध तक में आर्सेनिक मिला। सवाल- 4: कब लगा कि पानी में घुले आर्सेनिक को हटाने के लिए काम करना ही होगा? जवाब: बात 2018 की है। किलकारी में मुझे और अभिजीत को आर्सेनिक पर सर्वे का काम मिला था। हमें लगा था कि लोग पहले से इस पर काम कर रहे हैं। हम क्या नया करेंगे। सोचा कि चलकर देखते हैं, आर्सेनिक हटाने वाले जो प्लांट लगे हैं, उनका क्या हाल है। मैं बक्सर जिले के दुल्लहपुर गांव गया। यहां आर्सेनिक हटाने वाले प्लांट लगे तो थे, लेकिन टूटे और बंद पड़े थे। मैं गांव के सरकारी स्कूल में गया। देखा कि शिक्षक खरीदा हुआ पानी और बच्चे हैंडपंप का पानी पी रहे हैं। मैंने कई बच्चों के शरीर पर छोटे-छोटे दाग देखे। करीब 7 साल के एक बच्चे का शरीर बदरंग हो गया था। मैंने हेडमास्टर से पूछा, बच्चों की ऐसी हालत कैसे हो गई। उन्होंने बेबसी में कहा, ‘हम क्या करें?’ उस बच्चे का घर पास में ही था। स्कूल से निकलकर मैं उसके घर गया। उसके माता-पिता से बात की। टूटी-फूटी झोपड़ीनुमा घर। बच्चे के पिता ने अपने हाथ पांव पर मौजूद दाग दिखाए। बोले, ‘डॉक्टर बोलते हैं कि पानी में जहर है। चापाकल का पानी पीते हैं। इसमें जहर है तो साफ पानी कहां से लाए। दो टाइम खाना तो किसी तरह जुटाते हैं पानी कैसे खरीदें।’ हमने पटना के महावीर कैंसर संस्थान के डॉ. अरुण कुमार से इसके बारे में बात की। उन्होंने बताया कि हाथों और शरीर पर बारिश की बूंदों जैसे दाग आर्सेनिक जहर के शुरुआती लक्षण हैं। लंबे समय तक इसके संपर्क से त्वचा, मूत्राशय और फेफड़ों का कैंसर हो सकता है। त्वचा के ये दाग आगे चलकर त्वचा के कैंसर में बदल सकते हैं। गर्भ में और बचपन में आर्सेनिक के संपर्क का असर बच्चों के दिमागी विकास, बुद्धि और याददाश्त पर भी पड़ता है। इसे ठीक करने की कोई दवा नहीं है। एकमात्र उपाय ऐसा पानी पीना बंद करना है। सवाल- 5: वाटर फिल्टर के आइडिया को हकीकत में बदलने तक का सफर कैसा रहा? जवाब: यह लंबा और मुश्किल रहा है। सबसे बड़ी दिक्कत भरोसे की थी। एक स्कूली बच्चा कहे कि उसने आर्सेनिक हटाने की तकनीक बनाई है तो कोई आसानी से नहीं मानता। दिसंबर 2018 में हमारा प्रोजेक्ट भुवनेश्वर में आयोजित 26वीं राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस के लिए चुना गया। वहां हमें A+ ग्रेड मिला। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग ने अपने प्रशस्ति-पत्र में लिखा कि इस प्रोजेक्ट में आगे की संभावना है। इसके बाद किलकारी के निदेशक की पहल पर हम बिहार सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग पहुंचे। वहां से हमें पेटेंट फाइल करने और आगे रिसर्च के लिए 3 लाख रुपए मिले। हमारा लैब मॉडल PHED (लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग) की लैब में जांचा गया। 1,000 माइक्रोग्राम प्रति लीटर जैसे बहुत ज्यादा प्रदूषित पानी पर भी उसने काम किया। उसके बाद अफसरों का भरोसा बना। 2019 में मैंने CSIR-IICT हैदराबाद के तत्कालीन निदेशक को बिना किसी पहचान के एक ईमेल लिखा। अगले ही दिन जवाब आया कि आइए, हमारे वैज्ञानिक जांच करेंगे। वहां डॉ. एस. श्रीधर से मुलाकात हुई। वह 2019 से आज तक हमारे मेंटर हैं। दिसंबर 2020 में पटना के पास मनेर में PHED के साथ एक हैंडपंप पर पहली 3D-प्रिंटेड यूनिट लगी। एक महीने में करीब 29 हजार लीटर पानी साफ हुआ। कच्चे पानी में आर्सेनिक 141 माइक्रोग्राम प्रति लीटर था, जो घटकर 5 से भी नीचे आ गया। प्रोटोटाइप बनाने में BIT मेसरा से पढ़े इंजीनियर डॉ. जय मंगल सिंह और CIPET पटना ने बहुत मदद की। PHED ने 4.36 लाख रुपए देकर स्कूलों में पायलट शुरू करवाया। 2023 में यूनिसेफ बिहार ने 13 लाख रुपए दिए, जिससे हमने तकनीक को मॉलिक्यूलर स्तर पर समझा। उसी साल नवमार्ग कंपनी बनी। जल शक्ति मंत्रालय (राष्ट्रीय जल जीवन मिशन) ने हमारी तकनीक को इनोवेटिव टेक्नोलॉजी के रूप में पैनल में शामिल किया। आज भोजपुर के उदवंतनगर में एक बड़ा प्लांट चल रहा है जो घंटे में 4,500 लीटर पानी साफ करता है। अब तक कुल करीब 29 लाख लीटर आर्सेनिक-मुक्त पानी लोगों तक पहुंचा है। कर्नाटक में ग्रामीण पेयजल विभाग के साथ रायचूर और यादगीर जिलों में यूनिट लग रही हैं। साथ में हम µSENSE नाम के IoT सेंसर पर काम कर रहे हैं जो पानी में आर्सेनिक और बैक्टीरिया पकड़ेगा और JalJyoti नाम का GIS डेटाबेस बना रहे हैं जिससे पता चलेगा कि किस इलाके का पानी कैसा है। सवाल-6: किस मशीन से पानी से अलग किया जा रहा आर्सेनिक? जवाब: हमने नवमार्ग नाम की मैग्नेटिक फिल्टर बनाई है। यह आर्सेनिक हटाने के लिए मैग्नेटिक सेपरेशन टेक्नोलॉजी इस्तेमाल करती है। इसे आर्सेनिक से प्रभावित घरों, स्कूलों, कम्युनिटी पॉइंट्स और सार्वजनिक संस्थानों में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके फिल्टर को बार-बार बदलने का झंझट नहीं है। यह पानी से आर्सेनिक और दूसरी भारी धातुओं को अलग कर देती है। सवाल-7: पानी से आर्सेनिक हटाने में कितना खर्च आता है? जवाब: हमारी मैग्नेटिक वाटर फिल्टर से 8 रुपए में 1000 लीटर पानी आर्सेनिक मुक्त किया जा सकता है। एक बार मैग्नेट डालने के बाद इसकी लाइफटाइम 10 साल से ज्यादा है। यह फिल्टर 3 स्टेज में काम करता है। सबसे पहले पानी कार्बन फिल्टर से छनता है, जिसमें डस्ट पार्टिकल अलग हो जाते हैं। इसके बाद पानी मैग्नेट में जाता है। यहां पानी से आर्सेनिक अलग होता है। तीसरा स्टेज ऑप्शनल है। यह तब अप्लाई होता है जब पानी में मिट्टी की मात्रा बहुत हो। हमने मैग्नेटिक आर्सेनिक फिल्टर का दो मॉडल तैयार किया है। इस फिल्टर का मार्केट कॉस्ट कम्युनिटी के लिए लगभग 50 हजार रुपए और वार्ड स्तर के लिए लगभग 5-6 लाख रुपए है। वार्ड स्तर वाले मशीन से 1 घंटे में 1.5 लाख लीटर पानी साफ कर सकते हैं। सवाल-8: क्यों चर्चा में आई आर्सेनिक हटाने वाली मशीन? जवाब: हमने अपने इनोवेशन को स्टार्टअप का रूप दिया है। हमें अडानी ग्रुप से वंदे विंग्स मेंटरशिप मिला है। देश-विदेश के करीब 26 हजार आवेदनों में से टॉप 54 को चुना गया। इसमें पानी से आर्सेनिक हटाने वाली मशीन भी थी। अडानी ग्रुप की मदद से हम दोनों भाई आर्सेनिक साफ करने वाली मशीन को बड़े पैमाने पर बनाने और घर-घर पहुंचाने की दिशा में काम कर रहे हैं। सवाल-9: आर्सेनिक क्या है, क्या नुकसान पहुंचाता है? जवाब: आर्सेनिक पृथ्वी की ऊपरी परत में मिलने वाला प्राकृतिक पदार्थ है। यह बहुत जहरीला होता है। लोग आर्सेनिक से दूषित पानी पीने, खाना बनाने और फसल की सिंचाई में इस्तेमाल करने पर संपर्क में आते हैं। पेयजल, भोजन एवं वायु के माध्यम से इंसान के शरीर में एक निर्धारित मात्रा (0.05 मिग्रा./ली.) से अधिक पहुंच जाने पर यह जहरीला हो जाता है। WHO के अनुसार, लंबे समय तक आर्सेनिक से दूषित पानी पीने से गंभीर विषाक्तता हो सकती है। आर्सेनिक प्वाइजनिंग के शुरुआती लक्षण त्वचा सम्बन्धी समस्याओं के रूप में सामने आते हैं। त्वचा के रंग में परिवर्तन तथा गहरे या हल्के धब्बे शरीर पर दिखाई देते हैं। हथेली और तलवों की त्वचा कठोर, खुरदरी तथा कटी-फटी हो जाती है। यदि आर्सेनिक प्रदूषित जल लेना बंद कर दिया जाए तो ऐसे लक्षणों का बढ़ना रुक सकता है तथा ये लक्षण खत्म हो सकते हैं। अधिक लंबे समय तक आर्सेनिक प्रदूषित जल पीने से त्वचा का कैंसर तथा अन्य आन्तरिक अंगों तथा फेफड़े, आमाशय तथा गुर्दे का कैंसर हो सकता है। सवाल- 10: बिहार के कितने लोग पी रहे आर्सेनिक मिला पानी? जवाब: भारत सरकार के जल संसाधन मंत्रालय के अनुसार, बिहार के 18 जिलों के लोगों को आर्सेनिक मिला पानी पीना पड़ता है। बिहार सरकार के लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग (PHED) की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार 4,709 ग्रामीण वार्ड के ग्राउंड वाटर में आर्सेनिक की मात्रा तय मानक से अधिक है। गंगा किनारे के 54 प्रखंड में आर्सेनिक की मात्रा अधिक है। केंद्र सरकार ने 22 मार्च, 2021 को संसद में एक सवाल के जवाब में माना कि देश के 21 राज्यों के कुल 150 जिलों में कई जगह आर्सेनिक सुरक्षित सीमा से अधिक है। यूपी के 75 में से 28 जिले, बिहार के 38 में से 22 जिले, असम के 33 में से 18 और पश्चिम बंगाल के 23 में से 9 जिलों में आर्सेनिक तय मानक से से अधिक है। जमीन के नीचे के पानी में आर्सेनिक की मात्रा अधिक है तो इसे वाटर फिल्टर से कम किया जा सकता है। वाटर प्यूरीफायर कई तरह के होते हैं। आपको खरीदने से पहले इस बात का ध्यान रखना होगा कि कौन सा वाटर प्यूरीफायर आर्सेनिक कंट्रोल कर सकता है और कौन नहीं। आर्सेनिक हटाने वाले सिस्टम (सेंट्रलाइज्ड या घरेलू) लगाएं। हटाए गए आर्सेनिक का सही तरीके से निपटान करें। आर्सेनिक हटाने की तकनीकों में ऑक्सीडेशन, कोएगुलेशन-प्रेसिपिटेशन, अब्जॉर्प्शन, आयन एक्सचेंज और मेम्ब्रेन तकनीक शामिल हैं। आर्सेनिक, पानी में मिले इस जहर से बिहार के 5 करोड़ लोगों को कैंसर का खतरा है। जमीन के नीचे मौजूद पानी में घुले आर्सेनिक की काट दो भाइयों के स्कूल प्रोजेक्ट से निकली है। इन्होंने ऐसी मशीन बनाई है जो हजारों लोगों की जान बचा रही है। बिना बिजली और मोटे खर्च के कैसे पानी से आर्सेनिक हटाने वाली मशीन काम कर रही है? इस मशीन को बनाने के पीछे की क्या कहानी है? आर्सेनिक क्यों खतरनाक है? आइए अर्पित की जुबानी समझते हैं…। सवाल-1: कौन हैं दो भाई जिनके स्कूल प्रोजेक्ट से बच रही हजारों जानें जवाब: मेरा नाम अर्पित और मेरे भाई का नाम और अभिजीत है। दोनों मूल रूप से बिहार के लखीसराय जिले के बड़हिया गांव के रहने वाले हैं। 2010 में हमारा परिवार गांव से पटना आ गया। पिताजी उपेंद्र कुमार एक प्राइवेट अस्पताल में ओटी असिस्टेंट हैं। उस समय उनकी तनख्वाह 6,000 रुपए महीना थी। मां रीता कुमारी साइंस बैकग्राउंड से हैं। आर्थिक स्थिति खराब होने के चलते वह आगे पढ़ न सकीं। उनकी एक ही जिद थी कि बच्चे अच्छी पढ़ाई कर सकें। पांचवीं तक मैंने दिल्ली में संत निरंकारी मिशन के स्कूल में पढ़ाई की। इस स्कूल में मेरी मां को नौकरी मिल गई थी। फिर पटना लौटकर छठी से आठवीं तक सरकारी मिडिल स्कूल में पढ़ा। पिताजी की तनख्वाह करीब 20 हजार रुपए हुई तब मेरा दाखिला होली मिशन सेकेंडरी स्कूल में हुआ। आगे मैंने MAHE मणिपाल से फिजिक्स (ऑनर्स) में बी.एससी. की। आज मैं नवमार्ग रिसर्च एंड इनोवेशन प्राइवेट लिमिटेड का फाउंडर और CEO हूं। मेरा छोटा भाई अभिजीत कुमार को-फाउंडर और CTO है। वह IIT पटना से कंप्यूटर साइंस पढ़ रहा है। सवाल- 2: क्लास 9 में आर्सेनिक हटाने वाली मशीन बनाने की क्या कहानी है? जवाब: उस समय मैं पटना के होली मिशन सेकेंडरी स्कूल में नौवीं क्लास में पढ़ रहा था। अभिजीत सातवीं क्लास में था। पानी से आर्सेनिक हटाने वाली मशीन से जुड़ा प्रोजेक्ट स्कूल में नहीं, बल्कि बिहार बाल भवन किलकारी में बना। हम 2017-18 बैच के छात्र थे। स्कूल के बाद रोज दोपहर 2 बजे के बाद और शनिवार-रविवार पूरे दिन वहीं रहते थे। किलकारी में हर बच्चे को दो-तीन महीने का एक प्रोजेक्ट मिलता है, जिस पर काम करके रिपोर्ट देनी होती है। जून 2018 में साइंस इंस्ट्रक्टर ने टॉपिक दिया, ‘बिहार में आर्सेनिक प्रदूषण कितना फैला है और बढ़ क्यों रहा है।’ सर्वे के साथ हमने रिसर्च पेपर पढ़ने शुरू किए। उसी दौरान टोक्यो यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर यामागुची का एक पेपर मिला, जिसमें धातुओं के मैग्नेटिक गुणों पर काम था। वहीं से हमारे मन में सवाल उठा कि क्या चुंबक की मदद से पानी से आर्सेनिक अलग किया जा सकता है। हमने पहले इलेक्ट्रोमैग्नेट और अलग-अलग आकार के चुंबक आजमाए, लेकिन जरूरत जितना तेज मैग्नेटिक फील्ड नहीं बन पाया। फिर हमने नियोडिमियम-आयरन-बोरॉन (NdFeB) के स्थायी चुंबक इस्तेमाल किए। ये 15-20 साल तक अपनी ताकत बनाए रखते हैं। असली काम चुंबकों को ऐसी बनावट में लगाने का था कि पानी के दबाव में भी आर्सेनिक के कण अलग हो जाएं। आर्सेनिक हटाने के लिए इसमें न बिजली लगती है, न केमिकल। सवाल- 3: आर्सेनिक और इसके असर के बारे में कैसे पता चला? जवाब: शुरुआत उसी सर्वे से हुई। गंगा के मैदानी इलाकों में जमीन के नीचे के पानी में आर्सेनिक प्राकृतिक रूप से घुला रहता है। WHO की सुरक्षित सीमा 10 माइक्रोग्राम प्रति लीटर है, जबकि बिहार में हमें कई जगह इससे दस-बीस गुना ज्यादा आर्सेनिक मिला। महावीर कैंसर संस्थान पटना के डॉ. अरुण कुमार की टीम आर्सेनिक और कैंसर पर रिसर्च करती है। वे हमारे मेंटर हैं। जिन इलाकों में हमने यूनिट लगाई वहां के मरीजों के खून, बाल, नाखून और मां के दूध तक में आर्सेनिक मिला। सवाल- 4: कब लगा कि पानी में घुले आर्सेनिक को हटाने के लिए काम करना ही होगा? जवाब: बात 2018 की है। किलकारी में मुझे और अभिजीत को आर्सेनिक पर सर्वे का काम मिला था। हमें लगा था कि लोग पहले से इस पर काम कर रहे हैं। हम क्या नया करेंगे। सोचा कि चलकर देखते हैं, आर्सेनिक हटाने वाले जो प्लांट लगे हैं, उनका क्या हाल है। मैं बक्सर जिले के दुल्लहपुर गांव गया। यहां आर्सेनिक हटाने वाले प्लांट लगे तो थे, लेकिन टूटे और बंद पड़े थे। मैं गांव के सरकारी स्कूल में गया। देखा कि शिक्षक खरीदा हुआ पानी और बच्चे हैंडपंप का पानी पी रहे हैं। मैंने कई बच्चों के शरीर पर छोटे-छोटे दाग देखे। करीब 7 साल के एक बच्चे का शरीर बदरंग हो गया था। मैंने हेडमास्टर से पूछा, बच्चों की ऐसी हालत कैसे हो गई। उन्होंने बेबसी में कहा, ‘हम क्या करें?’ उस बच्चे का घर पास में ही था। स्कूल से निकलकर मैं उसके घर गया। उसके माता-पिता से बात की। टूटी-फूटी झोपड़ीनुमा घर। बच्चे के पिता ने अपने हाथ पांव पर मौजूद दाग दिखाए। बोले, ‘डॉक्टर बोलते हैं कि पानी में जहर है। चापाकल का पानी पीते हैं। इसमें जहर है तो साफ पानी कहां से लाए। दो टाइम खाना तो किसी तरह जुटाते हैं पानी कैसे खरीदें।’ हमने पटना के महावीर कैंसर संस्थान के डॉ. अरुण कुमार से इसके बारे में बात की। उन्होंने बताया कि हाथों और शरीर पर बारिश की बूंदों जैसे दाग आर्सेनिक जहर के शुरुआती लक्षण हैं। लंबे समय तक इसके संपर्क से त्वचा, मूत्राशय और फेफड़ों का कैंसर हो सकता है। त्वचा के ये दाग आगे चलकर त्वचा के कैंसर में बदल सकते हैं। गर्भ में और बचपन में आर्सेनिक के संपर्क का असर बच्चों के दिमागी विकास, बुद्धि और याददाश्त पर भी पड़ता है। इसे ठीक करने की कोई दवा नहीं है। एकमात्र उपाय ऐसा पानी पीना बंद करना है। सवाल- 5: वाटर फिल्टर के आइडिया को हकीकत में बदलने तक का सफर कैसा रहा? जवाब: यह लंबा और मुश्किल रहा है। सबसे बड़ी दिक्कत भरोसे की थी। एक स्कूली बच्चा कहे कि उसने आर्सेनिक हटाने की तकनीक बनाई है तो कोई आसानी से नहीं मानता। दिसंबर 2018 में हमारा प्रोजेक्ट भुवनेश्वर में आयोजित 26वीं राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस के लिए चुना गया। वहां हमें A+ ग्रेड मिला। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग ने अपने प्रशस्ति-पत्र में लिखा कि इस प्रोजेक्ट में आगे की संभावना है। इसके बाद किलकारी के निदेशक की पहल पर हम बिहार सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग पहुंचे। वहां से हमें पेटेंट फाइल करने और आगे रिसर्च के लिए 3 लाख रुपए मिले। हमारा लैब मॉडल PHED (लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग) की लैब में जांचा गया। 1,000 माइक्रोग्राम प्रति लीटर जैसे बहुत ज्यादा प्रदूषित पानी पर भी उसने काम किया। उसके बाद अफसरों का भरोसा बना। 2019 में मैंने CSIR-IICT हैदराबाद के तत्कालीन निदेशक को बिना किसी पहचान के एक ईमेल लिखा। अगले ही दिन जवाब आया कि आइए, हमारे वैज्ञानिक जांच करेंगे। वहां डॉ. एस. श्रीधर से मुलाकात हुई। वह 2019 से आज तक हमारे मेंटर हैं। दिसंबर 2020 में पटना के पास मनेर में PHED के साथ एक हैंडपंप पर पहली 3D-प्रिंटेड यूनिट लगी। एक महीने में करीब 29 हजार लीटर पानी साफ हुआ। कच्चे पानी में आर्सेनिक 141 माइक्रोग्राम प्रति लीटर था, जो घटकर 5 से भी नीचे आ गया। प्रोटोटाइप बनाने में BIT मेसरा से पढ़े इंजीनियर डॉ. जय मंगल सिंह और CIPET पटना ने बहुत मदद की। PHED ने 4.36 लाख रुपए देकर स्कूलों में पायलट शुरू करवाया। 2023 में यूनिसेफ बिहार ने 13 लाख रुपए दिए, जिससे हमने तकनीक को मॉलिक्यूलर स्तर पर समझा। उसी साल नवमार्ग कंपनी बनी। जल शक्ति मंत्रालय (राष्ट्रीय जल जीवन मिशन) ने हमारी तकनीक को इनोवेटिव टेक्नोलॉजी के रूप में पैनल में शामिल किया। आज भोजपुर के उदवंतनगर में एक बड़ा प्लांट चल रहा है जो घंटे में 4,500 लीटर पानी साफ करता है। अब तक कुल करीब 29 लाख लीटर आर्सेनिक-मुक्त पानी लोगों तक पहुंचा है। कर्नाटक में ग्रामीण पेयजल विभाग के साथ रायचूर और यादगीर जिलों में यूनिट लग रही हैं। साथ में हम µSENSE नाम के IoT सेंसर पर काम कर रहे हैं जो पानी में आर्सेनिक और बैक्टीरिया पकड़ेगा और JalJyoti नाम का GIS डेटाबेस बना रहे हैं जिससे पता चलेगा कि किस इलाके का पानी कैसा है। सवाल-6: किस मशीन से पानी से अलग किया जा रहा आर्सेनिक? जवाब: हमने नवमार्ग नाम की मैग्नेटिक फिल्टर बनाई है। यह आर्सेनिक हटाने के लिए मैग्नेटिक सेपरेशन टेक्नोलॉजी इस्तेमाल करती है। इसे आर्सेनिक से प्रभावित घरों, स्कूलों, कम्युनिटी पॉइंट्स और सार्वजनिक संस्थानों में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके फिल्टर को बार-बार बदलने का झंझट नहीं है। यह पानी से आर्सेनिक और दूसरी भारी धातुओं को अलग कर देती है। सवाल-7: पानी से आर्सेनिक हटाने में कितना खर्च आता है? जवाब: हमारी मैग्नेटिक वाटर फिल्टर से 8 रुपए में 1000 लीटर पानी आर्सेनिक मुक्त किया जा सकता है। एक बार मैग्नेट डालने के बाद इसकी लाइफटाइम 10 साल से ज्यादा है। यह फिल्टर 3 स्टेज में काम करता है। सबसे पहले पानी कार्बन फिल्टर से छनता है, जिसमें डस्ट पार्टिकल अलग हो जाते हैं। इसके बाद पानी मैग्नेट में जाता है। यहां पानी से आर्सेनिक अलग होता है। तीसरा स्टेज ऑप्शनल है। यह तब अप्लाई होता है जब पानी में मिट्टी की मात्रा बहुत हो। हमने मैग्नेटिक आर्सेनिक फिल्टर का दो मॉडल तैयार किया है। इस फिल्टर का मार्केट कॉस्ट कम्युनिटी के लिए लगभग 50 हजार रुपए और वार्ड स्तर के लिए लगभग 5-6 लाख रुपए है। वार्ड स्तर वाले मशीन से 1 घंटे में 1.5 लाख लीटर पानी साफ कर सकते हैं। सवाल-8: क्यों चर्चा में आई आर्सेनिक हटाने वाली मशीन? जवाब: हमने अपने इनोवेशन को स्टार्टअप का रूप दिया है। हमें अडानी ग्रुप से वंदे विंग्स मेंटरशिप मिला है। देश-विदेश के करीब 26 हजार आवेदनों में से टॉप 54 को चुना गया। इसमें पानी से आर्सेनिक हटाने वाली मशीन भी थी। अडानी ग्रुप की मदद से हम दोनों भाई आर्सेनिक साफ करने वाली मशीन को बड़े पैमाने पर बनाने और घर-घर पहुंचाने की दिशा में काम कर रहे हैं। सवाल-9: आर्सेनिक क्या है, क्या नुकसान पहुंचाता है? जवाब: आर्सेनिक पृथ्वी की ऊपरी परत में मिलने वाला प्राकृतिक पदार्थ है। यह बहुत जहरीला होता है। लोग आर्सेनिक से दूषित पानी पीने, खाना बनाने और फसल की सिंचाई में इस्तेमाल करने पर संपर्क में आते हैं। पेयजल, भोजन एवं वायु के माध्यम से इंसान के शरीर में एक निर्धारित मात्रा (0.05 मिग्रा./ली.) से अधिक पहुंच जाने पर यह जहरीला हो जाता है। WHO के अनुसार, लंबे समय तक आर्सेनिक से दूषित पानी पीने से गंभीर विषाक्तता हो सकती है। आर्सेनिक प्वाइजनिंग के शुरुआती लक्षण त्वचा सम्बन्धी समस्याओं के रूप में सामने आते हैं। त्वचा के रंग में परिवर्तन तथा गहरे या हल्के धब्बे शरीर पर दिखाई देते हैं। हथेली और तलवों की त्वचा कठोर, खुरदरी तथा कटी-फटी हो जाती है। यदि आर्सेनिक प्रदूषित जल लेना बंद कर दिया जाए तो ऐसे लक्षणों का बढ़ना रुक सकता है तथा ये लक्षण खत्म हो सकते हैं। अधिक लंबे समय तक आर्सेनिक प्रदूषित जल पीने से त्वचा का कैंसर तथा अन्य आन्तरिक अंगों तथा फेफड़े, आमाशय तथा गुर्दे का कैंसर हो सकता है। सवाल- 10: बिहार के कितने लोग पी रहे आर्सेनिक मिला पानी? जवाब: भारत सरकार के जल संसाधन मंत्रालय के अनुसार, बिहार के 18 जिलों के लोगों को आर्सेनिक मिला पानी पीना पड़ता है। बिहार सरकार के लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग (PHED) की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार 4,709 ग्रामीण वार्ड के ग्राउंड वाटर में आर्सेनिक की मात्रा तय मानक से अधिक है। गंगा किनारे के 54 प्रखंड में आर्सेनिक की मात्रा अधिक है। केंद्र सरकार ने 22 मार्च, 2021 को संसद में एक सवाल के जवाब में माना कि देश के 21 राज्यों के कुल 150 जिलों में कई जगह आर्सेनिक सुरक्षित सीमा से अधिक है। यूपी के 75 में से 28 जिले, बिहार के 38 में से 22 जिले, असम के 33 में से 18 और पश्चिम बंगाल के 23 में से 9 जिलों में आर्सेनिक तय मानक से से अधिक है। जमीन के नीचे के पानी में आर्सेनिक की मात्रा अधिक है तो इसे वाटर फिल्टर से कम किया जा सकता है। वाटर प्यूरीफायर कई तरह के होते हैं। आपको खरीदने से पहले इस बात का ध्यान रखना होगा कि कौन सा वाटर प्यूरीफायर आर्सेनिक कंट्रोल कर सकता है और कौन नहीं। आर्सेनिक हटाने वाले सिस्टम (सेंट्रलाइज्ड या घरेलू) लगाएं। हटाए गए आर्सेनिक का सही तरीके से निपटान करें। आर्सेनिक हटाने की तकनीकों में ऑक्सीडेशन, कोएगुलेशन-प्रेसिपिटेशन, अब्जॉर्प्शन, आयन एक्सचेंज और मेम्ब्रेन तकनीक शामिल हैं।

