बांका के प्रसिद्ध तिलडीहा दुर्गा मंदिर में शारदीय नवरात्र की पहली पूजा पर रविवार को आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा। इस दौरान 1.5 लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने माता का जलाभिषेक किया। अहले सुबह से ही मंदिर परिसर में भक्तों की भीड़ जुटने लगी थी। सुल्तानगंज के अजगैबीनाथ धाम से गंगाजल लेकर डाक बम और अन्य कांवरिया 18 किलोमीटर पैदल चलकर तिलडीहा पहुंचे। पूरा मंदिर परिसर और कांवरिया पथ ‘जय दुर्गा’ और ‘जय माता दी’ के जयघोष से गूंज उठा। श्रद्धालुओं की बढ़ती भीड़ को देखते हुए जिला प्रशासन ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए थे। भीड़ को नियंत्रित करने और सुचारू रूप से जलार्पण कराने के लिए नियंत्रण कक्ष बनाया गया था और पर्याप्त पुलिस बल तैनात था। जलाभिषेक के बाद श्रद्धालुओं ने मंदिर परिसर में स्थित पीपल के पेड़ पर रक्षा सूत्र और लाल वस्त्र बांधकर मन्नतें मांगीं। भक्तों का मानना है कि तिलडीहा महारानी के दरबार में सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद पूरी होती है। इसी आस्था के कारण प्रत्येक वर्ष नवरात्र के दौरान यहां श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती जा रही है। बिहार के विभिन्न जिलों के अलावा पश्चिम बंगाल और झारखंड से भी बड़ी संख्या में भक्त माता के दर्शन करने पहुंचते हैं। 423 साल पुराना है तिलडीहा दुर्गा मंदिर का इतिहास
बांका जिले के छत्रहार पंचायत स्थित तिलडीहा दुर्गा मंदिर को क्षेत्र के प्रमुख शक्तिपीठों में गिना जाता है। मान्यता और प्रचलित ऐतिहासिक विवरण के अनुसार, मंदिर की स्थापना वर्ष 1603 ईस्वी में राढ़ी कायस्थ परिवार के हरबल्लव दास ने कराई थी। वे पश्चिम बंगाल के दालपोलसा गांव, नदिया क्षेत्र के निवासी बताए जाते हैं। कहा जाता है कि उन्हें स्वप्न में मंदिर की स्थापना करने की प्रेरणा मिली थी। उस समय मंदिर के आसपास घना जंगल था। आज इस क्षेत्र को हरिवंशपुर के नाम से जाना जाता है। मंदिर की एक खास पहचान यह भी है कि करीब 423 पुरानी परंपरा के अनुसार यहां मां की प्रतिमा के स्वरूप में बदलाव नहीं किया जाता। मंदिर में प्रतिमा निर्माण की परंपरा भी विशिष्ट है। प्रतिमा का धड़ कलाकार तैयार करते हैं, जबकि मुख का निर्माण हरबल्लव दास के वंशज करते हैं। वर्तमान में शंभूनाथ दास मेढ़पति की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। मंदिर में पूजा तांत्रिक विधि-विधान और बंगाली रीति-रिवाज के अनुसार संपन्न कराई जाती है।
एक ही मेढ़ पर विराजती हैं 13 प्रतिमाएं तिलडीहा दुर्गा मंदिर की विशेषता यह है कि यहां एक ही मेढ़ पर भगवान श्रीकृष्ण, मां काली, मां दुर्गा, महिषासुर, भगवान शिव-पार्वती, गणेश और कार्तिकेय सहित कुल 13 प्रतिमाएं बनाई जाती हैं। इसी विशेषता के कारण मंदिर को श्रीकृष्ण काली भगवती के नाम से भी जाना जाता है। मंदिर में बलि की प्राचीन परंपरा भी प्रचलित है। पूजा के विभिन्न चरणों में निर्धारित विधि के अनुसार धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। प्रथम पूजा पर 108 बेलपत्रों से आहुति देने के साथ पाठा बलि की परंपरा है। चतुर्थ पूजा पर केला वृक्ष और पान के पत्तों की माला से पूजा की जाती है। सप्तमी को मंडप में प्रतिमा का श्रृंगार होता है। परंपरा के अनुसार, रात में मेढ़पति और पुरोहित मां की आंखों की पुतली बनाते हैं। अष्टमी को डलिया चढ़ाने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है, जबकि नवमी को कन्या पूजन और अन्य धार्मिक अनुष्ठान होते हैं। विजयादशमी पर समीप की बदुआ नदी में प्रतिमा विसर्जन किया जाता है। मां की महिमा अपरंपार : मेढ़पति
मेढ़पति शंभूनाथ दास ने बताया कि तिलडीहा दुर्गा मां की महिमा अपरंपार है। माता की कृपा से परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। परिवार के जो सदस्य दूसरे प्रदेशों में रहते हैं, वे भी दुर्गा पूजा के अवसर पर घर लौटकर माता की सेवा में शामिल होते हैं। वहीं, मंदिर के मुख्य पुजारी श्याम आचार्य ने बताया कि मां के दरबार में आने वाले श्रद्धालुओं की आस्था लगातार बढ़ रही है। भक्त अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति की उम्मीद लेकर यहां पहुंचते हैं। इसी वजह से हर साल जलाभिषेक करने वालों की संख्या में वृद्धि हो रही है। पहली पूजा पर उमड़ी भारी भीड़ ने एक बार फिर तिलडीहा दुर्गा मंदिर की धार्मिक महत्ता और श्रद्धालुओं की अटूट आस्था को प्रदर्शित किया। प्रशासन की निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था के बीच भक्तों ने माता के दर्शन और जलाभिषेक कर नवरात्र की शुरुआत की। बांका के प्रसिद्ध तिलडीहा दुर्गा मंदिर में शारदीय नवरात्र की पहली पूजा पर रविवार को आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा। इस दौरान 1.5 लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने माता का जलाभिषेक किया। अहले सुबह से ही मंदिर परिसर में भक्तों की भीड़ जुटने लगी थी। सुल्तानगंज के अजगैबीनाथ धाम से गंगाजल लेकर डाक बम और अन्य कांवरिया 18 किलोमीटर पैदल चलकर तिलडीहा पहुंचे। पूरा मंदिर परिसर और कांवरिया पथ ‘जय दुर्गा’ और ‘जय माता दी’ के जयघोष से गूंज उठा। श्रद्धालुओं की बढ़ती भीड़ को देखते हुए जिला प्रशासन ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए थे। भीड़ को नियंत्रित करने और सुचारू रूप से जलार्पण कराने के लिए नियंत्रण कक्ष बनाया गया था और पर्याप्त पुलिस बल तैनात था। जलाभिषेक के बाद श्रद्धालुओं ने मंदिर परिसर में स्थित पीपल के पेड़ पर रक्षा सूत्र और लाल वस्त्र बांधकर मन्नतें मांगीं। भक्तों का मानना है कि तिलडीहा महारानी के दरबार में सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद पूरी होती है। इसी आस्था के कारण प्रत्येक वर्ष नवरात्र के दौरान यहां श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती जा रही है। बिहार के विभिन्न जिलों के अलावा पश्चिम बंगाल और झारखंड से भी बड़ी संख्या में भक्त माता के दर्शन करने पहुंचते हैं। 423 साल पुराना है तिलडीहा दुर्गा मंदिर का इतिहास
बांका जिले के छत्रहार पंचायत स्थित तिलडीहा दुर्गा मंदिर को क्षेत्र के प्रमुख शक्तिपीठों में गिना जाता है। मान्यता और प्रचलित ऐतिहासिक विवरण के अनुसार, मंदिर की स्थापना वर्ष 1603 ईस्वी में राढ़ी कायस्थ परिवार के हरबल्लव दास ने कराई थी। वे पश्चिम बंगाल के दालपोलसा गांव, नदिया क्षेत्र के निवासी बताए जाते हैं। कहा जाता है कि उन्हें स्वप्न में मंदिर की स्थापना करने की प्रेरणा मिली थी। उस समय मंदिर के आसपास घना जंगल था। आज इस क्षेत्र को हरिवंशपुर के नाम से जाना जाता है। मंदिर की एक खास पहचान यह भी है कि करीब 423 पुरानी परंपरा के अनुसार यहां मां की प्रतिमा के स्वरूप में बदलाव नहीं किया जाता। मंदिर में प्रतिमा निर्माण की परंपरा भी विशिष्ट है। प्रतिमा का धड़ कलाकार तैयार करते हैं, जबकि मुख का निर्माण हरबल्लव दास के वंशज करते हैं। वर्तमान में शंभूनाथ दास मेढ़पति की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। मंदिर में पूजा तांत्रिक विधि-विधान और बंगाली रीति-रिवाज के अनुसार संपन्न कराई जाती है।
एक ही मेढ़ पर विराजती हैं 13 प्रतिमाएं तिलडीहा दुर्गा मंदिर की विशेषता यह है कि यहां एक ही मेढ़ पर भगवान श्रीकृष्ण, मां काली, मां दुर्गा, महिषासुर, भगवान शिव-पार्वती, गणेश और कार्तिकेय सहित कुल 13 प्रतिमाएं बनाई जाती हैं। इसी विशेषता के कारण मंदिर को श्रीकृष्ण काली भगवती के नाम से भी जाना जाता है। मंदिर में बलि की प्राचीन परंपरा भी प्रचलित है। पूजा के विभिन्न चरणों में निर्धारित विधि के अनुसार धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। प्रथम पूजा पर 108 बेलपत्रों से आहुति देने के साथ पाठा बलि की परंपरा है। चतुर्थ पूजा पर केला वृक्ष और पान के पत्तों की माला से पूजा की जाती है। सप्तमी को मंडप में प्रतिमा का श्रृंगार होता है। परंपरा के अनुसार, रात में मेढ़पति और पुरोहित मां की आंखों की पुतली बनाते हैं। अष्टमी को डलिया चढ़ाने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है, जबकि नवमी को कन्या पूजन और अन्य धार्मिक अनुष्ठान होते हैं। विजयादशमी पर समीप की बदुआ नदी में प्रतिमा विसर्जन किया जाता है। मां की महिमा अपरंपार : मेढ़पति
मेढ़पति शंभूनाथ दास ने बताया कि तिलडीहा दुर्गा मां की महिमा अपरंपार है। माता की कृपा से परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। परिवार के जो सदस्य दूसरे प्रदेशों में रहते हैं, वे भी दुर्गा पूजा के अवसर पर घर लौटकर माता की सेवा में शामिल होते हैं। वहीं, मंदिर के मुख्य पुजारी श्याम आचार्य ने बताया कि मां के दरबार में आने वाले श्रद्धालुओं की आस्था लगातार बढ़ रही है। भक्त अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति की उम्मीद लेकर यहां पहुंचते हैं। इसी वजह से हर साल जलाभिषेक करने वालों की संख्या में वृद्धि हो रही है। पहली पूजा पर उमड़ी भारी भीड़ ने एक बार फिर तिलडीहा दुर्गा मंदिर की धार्मिक महत्ता और श्रद्धालुओं की अटूट आस्था को प्रदर्शित किया। प्रशासन की निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था के बीच भक्तों ने माता के दर्शन और जलाभिषेक कर नवरात्र की शुरुआत की।

