भगवान की पूजा तो सभी करते हैं, लेकिन ज्ञान की देवी मां सरस्वती की आराधना करने वाले कम हैं। ज्ञान ही व्यक्ति को सही और गलत का अंतर समझाता है। इसी संदेश के साथ रविवार को उपाध्याय 108 विहसंत सागर महाराज के सान्निध्य में सरस्वती महाअर्चना का आयोजन किया गया। यह आयोजन का 26वां वर्ष है। इसमें देश के कई राज्यों से पहुंचे करीब पांच हजार श्रद्धालु पहुंचे। उपाध्याय विहसंत सागर महाराज पिछले 25 वर्षों से लगातार मां सरस्वती की आराधना कर रहे हैं। उनके जीवन में इस साधना का विशेष महत्व है। उनकी दीक्षा के समय भी मां सरस्वती से जुड़ा विशेष संयोग रहा था। 1200 वर्ष पुरानी प्रतिमा से जुड़ी है परंपरा आयोजकों के अनुसार, करीब 1200 वर्ष प्राचीन मां सरस्वती की प्रतिमा उत्तर प्रदेश के इटावा के पास हँसेही गांव में जमीन की खुदाई के दौरान मिली थी। यहां करीब साढ़े तीन हजार खंडित प्रतिमाएं मिली थीं। इनमें केवल पांच प्रतिमाएं साबुत थीं। इन्हीं में मां सरस्वती की प्रतिमा उपाध्याय विहसंत सागर महाराज को प्राप्त हुई। इसके बाद उन्होंने सरस्वती आराधना को व्यापक स्वरूप दिया। कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्य अतिथि अमनीश अवस्थी ने मां सरस्वती का आशीर्वाद लिया। इंदौर से आए सपना जैन और मनीष जैन भी शामिल हुए। बाबू कैलाश चंद्र जैन ने मंच का उद्घाटन किया। कुशम और अभिषा ने दीप प्रज्वलित किया। कई राज्यों से पहुंचे श्रद्धालु मीडिया प्रभारी सिद्धार्थ जैन ने बताया कि महाअर्चना में महाराष्ट्र, कर्नाटक, दिल्ली और उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों से श्रद्धालु पहुंचे। आयोजकों ने बताया कि मां सरस्वती की आराधना से एकाग्रता, इच्छाशक्ति और बुद्धि के विकास की प्रेरणा मिलती है। आयोजन का उद्देश्य बच्चों और युवाओं सहित समाज के सभी वर्गों में ज्ञान, संस्कार और आध्यात्मिक चेतना का प्रसार करना है।

