Navratri : राजस्थान का एकमात्र धाम, जहां नवरात्र में बंद रहते हैं माता घटारानी के गर्भगृह के द्वार, क्यों

Navratri : राजस्थान का एकमात्र धाम, जहां नवरात्र में बंद रहते हैं माता घटारानी के गर्भगृह के द्वार, क्यों

Navratri : भीलवाड़ा. अमूमन नवरात्र के 9 दिनों में देशभर के शक्तिपीठों और देवी मंदिरों में माता के दिव्य स्वरूपों के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का हुजूम उमड़ता है, लेकिन भीलवाड़ा जिले में स्थित एक धाम ऐसा भी है जहां नवरात्र की शुरुआत होते ही माता रानी के गर्भगृह के किवाड़ बंद कर दिए जाते हैं। मेवाड़ क्षेत्र की प्रगाढ़ आस्था का प्रमुख केंद्र प्राचीन माता घटारानी मंदिर अपनी इस अनोखी परंपरा के कारण पूरे प्रदेश में अनूठा स्थान रखता है। आज 11 अक्टूबर से शरदीय नवरात्र शुरू हो गए हैं।

भीलवाड़ा से करीब 140 किलोमीटर दूर जहाजपुर की सुरम्य पहाड़ी पर स्थित इस मंदिर में चैत्र और शारदीय, दोनों ही नवरात्रों में अमावस्या को घट स्थापना के साथ ही गर्भगृह के पट पूरे आठ दिनों के लिए बंद कर दिए जाते हैं। श्रद्धालु गर्भगृह के बाहर बंद द्वारों के सम्मुख ही शीश नवाकर पूजा-अर्चना करते हैं। महाअष्टमी के दिन पूर्व राजपरिवार की ओर से माता घटारानी को विशेष भोग अर्पित किया जाता है।

मान्यताओं के अनुसार, राजपरिवार के भोग अर्पण के बाद जब माता रानी की आज्ञा प्राप्त होती है, तब भव्य महाआरती का आयोजन होता है। आरती संपन्न होते ही जैसे ही गर्भगृह के पट खोले जाते हैं, माता के अलौकिक दर्शन के लिए भक्तों का सैलाब उमड़ता है।

Mata Ghatarani Temple
Bhilwara : घटारानी मंदिर में माता की प्रतिमा। फोटो पत्रिका

यह है पौराणिक मान्यता

पौराणिक मान्यता के अनुसार, माता रानी बालिका रूप में पहाड़ी से नीचे आकर गायों का दूध पीती थीं। एक दिन ग्वाले ने उन्हें देख लिया और आवाज लगाई। बालिका पहाड़ी की ओर भागीं तो ग्वाले के हाथ में उनकी चोटी आ गई। मान्यता है कि उनका शरीर धरती में समा गया और सिर पाषाण बन गया।

क्यों बंद रहते हैं आठ दिन पट?

मंदिर के पुजारी शक्ति सिंह तंवर के अनुसार, नवरात्र के पावन दिनों में गर्भगृह के द्वार बंद रखने के पीछे गहरी आध्यात्मिक मान्यता है। माना जाता है कि इन आठ दिनों में माता स्वयं एकांत में गहन आराधना में लीन रहती हैं। इसके साथ ही गर्भगृह की पवित्रता और स्वच्छता बनाए रखने के लिए भक्तों का प्रवेश पूरी तरह वर्जित रहता है। मंदिर के ऐतिहासिक स्वरूप की बात करें तो संवत 1986 में चंपा बाई की ओर से प्रथम बार मंदिर का निर्माण करवाने के साक्ष्य मिलते हैं।

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