आणंद में आधुनिकता के दौर में भी मिट्टी के गरबों का महत्व बरकरार

आणंद में आधुनिकता के दौर में भी मिट्टी के गरबों का महत्व बरकरार

बुरहान पठाण

आणंद. शक्ति की आराधना और आस्था का महापर्व नवरात्रि रविवार से आरंभ होगा। समय के साथ गरबा आयोजनों का स्वरूप भले ही बदल गया हो, लेकिन मां दुर्गा की आराधना में मिट्टी के गरबों का महत्व आज भी बरकरार है। मिट्टी के इन पारंपरिक गरबों को आकर्षक रूप देने के लिए आणंद के प्रजापति परिवार करीब दो महीने पहले से ही दिन-रात मेहनत से जुटे हैं।
शहर में आजाद मैदान के समीप रहने वाले प्रजापति परिवार नवरात्रि से पहले विभिन्न आकारों, रंगों और कलात्मक डिजाइनों वाले मिट्टी के गरबे तैयार करते हैं। त्योहार नजदीक आते ही बाजार में गरबे की बिक्री बढ़ने लगती है। इन परिवारों के लिए नवरात्रि धार्मिक आस्था के साथ आजीविका का भी महत्वपूर्ण अवसर है।

मिट्टी से आकर्षक गरबा बनाने तक लंबी प्रक्रिया

मिट्टी के गरबे बनाना मेहनत और कौशल का काम है। सबसे पहले मिट्टी एकत्र कर उसे तैयार किया जाता है। इसके बाद चाक पर गरबे बनाए जाते हैं। तैयार गरबों को भट्ठी में पकाकर मजबूत किया जाता है। अंत में उन पर रंग-रोगन, चित्रकारी और सजावट की जाती है, जिससे साधारण मिट्टी के बर्तन आकर्षक स्वरूप धारण कर लेते हैं।

परिवार के सभी सदस्य देते हैं योगदान

गरबा बनाने वाले शनाभाई प्रजापति के अनुसार, इस काम की तैयारी लगभग दो महीने पहले शुरू होती है। परिवार के सभी सदस्य इसमें योगदान देते हैं।

पारिवारिक विरासत को आगे बढ़ाने का भी माध्यम

छोटे बच्चे भी गरबों पर रंग लगाने और सजावट करने में सहयोग करते हैं। इस तरह यह कला रोजगार के साथ पारिवारिक विरासत को आगे बढ़ाने का माध्यम भी बनी हुई है।

बदलती पसंद के अनुरूप नए डिजाइन

समय के साथ ग्राहकों की पसंद में बदलाव आया है। अब साधारण गरबों के साथ रंग-बिरंगे, आकर्षक डिजाइन और विशेष सजावट वाले गरबों की भी मांग है। इसे ध्यान में रखकर कारीगर पारंपरिक कला में नए रंग और डिजाइन जोड़ रहे हैं। आधुनिकता के बीच मिट्टी के गरबे आज भी आस्था और परंपरा के प्रतीक हैं। इनकी खरीदारी से स्थानीय कुम्हार परिवारों की आजीविका को सहारा मिलता है और पीढ़ियों से चली आ रही पारंपरिक कला को संरक्षित रखने में मदद मिलती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *