जेपीएससी 11वीं-13वीं सिविल सेवा, फूड इंस्पेक्टर और सीडीपीओ नियुक्ति परीक्षा रद्द करने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर शुक्रवार को हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। जस्टिस दीपक रौशन की कोर्ट में सुनवाई के दौरान राज्य सरकार और याचिकाकर्ताओं के वकीलों के बीच तीखी बहस हुई। सरकार की ओर से अधिवक्ता अच्युत केशव ने दलील दी कि परीक्षा प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी हुई, गोपनीयता भंग हुई है। इसके काफी साक्ष्य मिले हैं। ऐसे में यह पता लगाना संभव नहीं है कि चयनित अभ्यर्थियों में कौन दोषी है और कौन निर्दोष। जब पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता प्रभावित हो गई तो अलग-अलग अभ्यर्थियों के आधार पर नियुक्तियों को बचाए रखना न्यायसंगत नहीं होगा। इन्हीं अनियमितताओं को देखते हुए नियुक्ति प्रक्रिया रद्द करने का फैसला लिया गया। याचिकाकर्ताओं का तर्क-न पेपर लीक का मामला सामने आया, न अभ्यर्थियों पर केस
याचिकाकर्ताओं की ओर से बताया गया कि सरकार ने जेपीएससी की 11वीं-13वीं सिविल सेवा परीक्षा, बाल विकास परियोजना पदाधिकारी (सीडीपीओ) और फूड इंस्पेक्टर की नियुक्ति प्रक्रिया को टीडीपीएल से जोड़ते हुए रद्द किया है। जबकि इनकी चयन प्रक्रिया लगभग पूरी हो चुकी थी। दस्तावेज सत्यापन का काम चल रहा था, तब जुलाई 2025 में टीडीपीएल की भूमिका सामने आई। न तो इन परीक्षाओं के पेपर लीक का ठोस मामला सामने आया, न अभ्यर्थियों पर एफआईआर ही हुई। कोई ठोस साक्ष्य नहीं मिले। केवल एजेंसी की संलिप्तता की आशंका के आधार पर नियुक्ति रद्द करना उचित नहीं है। सीआईडी जांच जारी, इसलिए राहत भी जारी रहेगी
सरकार ने बड़े पैमाने पर गड़बड़ी होने और सीआईडी जांच जारी रहने का हवाला दिया है। सीआईडी जांच कब तक पूरी होगी, यह स्पष्ट नहीं है। ऐसे में जब तक जांच पूरी नहीं होती, तब तक सरकार कोई ठोस सबूत कोर्ट में पेश नहीं कर सकती। यही नहीं, परीक्षा रद्द करने से पहले अधिकारियों को पक्ष रखने का मौका भी नहीं दिया गया था। याचिकाकर्ताओं ने इसे नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत के खिलाफ बताया है। ऐसे में याचिकाकर्ताओं को मिली राहत जारी रहने की उम्मीद है। जेपीएससी 11वीं-13वीं सिविल सेवा, फूड इंस्पेक्टर और सीडीपीओ नियुक्ति परीक्षा रद्द करने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर शुक्रवार को हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। जस्टिस दीपक रौशन की कोर्ट में सुनवाई के दौरान राज्य सरकार और याचिकाकर्ताओं के वकीलों के बीच तीखी बहस हुई। सरकार की ओर से अधिवक्ता अच्युत केशव ने दलील दी कि परीक्षा प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी हुई, गोपनीयता भंग हुई है। इसके काफी साक्ष्य मिले हैं। ऐसे में यह पता लगाना संभव नहीं है कि चयनित अभ्यर्थियों में कौन दोषी है और कौन निर्दोष। जब पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता प्रभावित हो गई तो अलग-अलग अभ्यर्थियों के आधार पर नियुक्तियों को बचाए रखना न्यायसंगत नहीं होगा। इन्हीं अनियमितताओं को देखते हुए नियुक्ति प्रक्रिया रद्द करने का फैसला लिया गया। याचिकाकर्ताओं का तर्क-न पेपर लीक का मामला सामने आया, न अभ्यर्थियों पर केस
याचिकाकर्ताओं की ओर से बताया गया कि सरकार ने जेपीएससी की 11वीं-13वीं सिविल सेवा परीक्षा, बाल विकास परियोजना पदाधिकारी (सीडीपीओ) और फूड इंस्पेक्टर की नियुक्ति प्रक्रिया को टीडीपीएल से जोड़ते हुए रद्द किया है। जबकि इनकी चयन प्रक्रिया लगभग पूरी हो चुकी थी। दस्तावेज सत्यापन का काम चल रहा था, तब जुलाई 2025 में टीडीपीएल की भूमिका सामने आई। न तो इन परीक्षाओं के पेपर लीक का ठोस मामला सामने आया, न अभ्यर्थियों पर एफआईआर ही हुई। कोई ठोस साक्ष्य नहीं मिले। केवल एजेंसी की संलिप्तता की आशंका के आधार पर नियुक्ति रद्द करना उचित नहीं है। सीआईडी जांच जारी, इसलिए राहत भी जारी रहेगी
सरकार ने बड़े पैमाने पर गड़बड़ी होने और सीआईडी जांच जारी रहने का हवाला दिया है। सीआईडी जांच कब तक पूरी होगी, यह स्पष्ट नहीं है। ऐसे में जब तक जांच पूरी नहीं होती, तब तक सरकार कोई ठोस सबूत कोर्ट में पेश नहीं कर सकती। यही नहीं, परीक्षा रद्द करने से पहले अधिकारियों को पक्ष रखने का मौका भी नहीं दिया गया था। याचिकाकर्ताओं ने इसे नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत के खिलाफ बताया है। ऐसे में याचिकाकर्ताओं को मिली राहत जारी रहने की उम्मीद है।

