भागलपुर के राघोपुर में में गंगा के कटाव से तबाही मची है। गंगा की तेज धारा ने 125 मीटर से ज्यादा तटबंध को बहा दिया। छह से ज्यादा पक्के मकान और कई झोपड़ीनुमा घर गंगा में समा गए। कई और मकानों पर भी खतरा बना हुआ है। लोग अपने घरों को छोड़कर सुरक्षित जगहों पर जा रहे हैं। गंगा का जलस्तर घटने के बावजूद कटाव तेजी से हुआ, जिससे लोगों को संभलने का मौका नहीं मिला। करोड़ों रुपए खर्च होने के बावजूद तटबंध इतनी जल्दी कैसे टूट गया, इस पर जल संसाधन विभाग पर सवाल उठ रहे हैं। राघोपुर में ही बिहार सरकार के ऊर्जा मंत्री शैलेश कुमार उर्फ बुला मंडल का घर है। पथ निर्माण मंत्री इंजीनियर कुमार शैलेंद्र भी इसी इलाके से आते हैं, वर्तमान में बिहपुर विधानसभी सीट से विधायक हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए ऊर्जा मंत्री बुलो मंडल रात से ही घटनास्थल पर मौजूद हैं। इंजीनियरों की टीम की देखरेख में कटावरोधी काम फिर से शुरू किया गया है। प्रशासन खतरे वाले मकानों को खाली करवा रहा है। जिन परिवारों के घर उजड़ गए हैं, उनके सामने रहने की समस्या है। मौके से आई 3 तस्वीरें…. ‘22 साल से गंगा के कटाव से लड़ रहा हूं’ ऊर्जा मंत्री शैलेश कुमार उर्फ बुलो मंडल ने कहा कि गंगा का स्वरूप ऐसा है, जिससे मुकाबला करना आसान नहीं है। गंगा मैया की कृपा और कुदृष्टि, दोनों रूप देखने को मिलते हैं। कोई व्यक्ति इस प्राकृतिक चुनौती से संघर्ष कर सकता है। खुद करीब 22 वर्षों से गंगा के कटाव को झेलने और उससे संघर्ष करने की स्थिति से परिचित हैं। क्षेत्र में साल 2004 से कटाव शुरू हुआ था, जो जीरो प्वॉइंट से लेकर करीब नौ किलोमीटर तक अलग-अलग स्थानों पर जारी रहा। सरकार लगातार कटावरोधी कार्य कराती रही है। साल 2013 के बाद कुछ राहत मिली थी और लगभग दस वर्षों तक लोगों को अपेक्षाकृत राहत महसूस हुई। लेकिन साल 2024 के बाद एक बार फिर गंगा के कटाव ने गंभीर रूप धारण कर लिया। ‘राहत-बचाव कार्य जारी है’ मंत्री के अनुसार, मौजूदा संकट से निपटने के लिए सरकारी महकमा और शासन स्तर की मशीनरी सक्रिय है। कटाव के दौरान जमीन के भीतर से मिट्टी खिसकने यानी अंडरमाइनिंग की समस्या सामने आती है, जिससे पहले किए गए बचाव कार्य भी प्रभावित हो सकते हैं। विभाग इस चुनौती से निपटने के लिए नए प्रयोग कर रहा है। ‘5 से 15 मिनट में उजड़ गई दुनिया’ राघोपुर में कटाव की त्रासदी के बीच एक पीड़ित बयान सामने आया है। मिथलेश कुमार क्रांति ने बताया कि कटाव के खतरे के बीच घरों और झोपड़ियों को गिराए जाने से गरीब मजदूर परिवारों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। बांध कटने की आशंका के बीच अफरा-तफरी मच गई। देखते ही देखते महज 5 से 15 मिनट के भीतर एक के बाद एक घर गिराए जाने लगे। शुक्रवार शाम करीब 5:30 बजे तक इलाके में कई मकान और झोपड़ियां पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी थी। पीड़ित पक्ष का आरोप है कि इस दौरान जल संसाधन विभाग का कोई अधिकारी या कर्मचारी मौके पर मौजूद नहीं था। वहां मौजूद लोग कथित तौर पर बोरे लेकर परेशान थे, लेकिन प्रभावित परिवारों को अपना सामान निकालने तक का समय नहीं मिला। हालांकि, घरों को गिराने की परिस्थितियों और प्रशासनिक कार्रवाई के संबंध में संबंधित अधिकारियों का पक्ष सामने आना अभी बाकी है। दुर्गापूजा के लिए मंगाया था लाखों का कपड़ा, अब दुकान भी नहीं बची कटाव की मार ने केवल लोगों के सिर से छत नहीं छीनी, बल्कि उनकी वर्षों की मेहनत और रोजी-रोटी भी छीन ली। पीड़ित के मुताबिक, दुकान में दुर्गापूजा के कारोबार के लिए करीब 5 से 7 लाख रुपए का कपड़ा मंगाकर रखा गया था। त्योहार में बिक्री से परिवार की आर्थिक स्थिति सुधरने की उम्मीद थी, लेकिन अब वही कपड़ा तबाही की भेंट चढ़ गया। टीवी, फ्रिज, इनवर्टर, बैटरी, गैस सिलेंडर और घर का अन्य जरूरी सामान भी बर्बाद होने की बात कही गई है। पीड़ित ने बताया कि घर में रखे 45 हजार रुपए नकद भी नहीं बच सके। यहां तक कि गाड़ी की चाबी तक नहीं मिल पाई, जिससे सामान निकालने में भी परेशानी हुई। 20 से 25 घर गंगा में समाए पीड़ित का दावा है कि इस घटना में करीब 20 से 25 घर पूरी तरह जमींदोज हो गए। इनमें बड़ी संख्या साधारण मजदूरों और गरीब परिवारों के घरों की बताई जा रही है। आज इन परिवारों के पास न सुरक्षित आशियाना है, न सामान बचा है और न ही भविष्य को लेकर कोई स्पष्ट रास्ता दिखाई दे रहा है। प्रशासन पर गंभीर आरोप, विरोध करने पर धमकी देने का दावा पीड़ित पक्ष ने प्रशासन की कार्यशैली पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। आरोप है कि संकट के समय प्रभावित लोगों की परेशानियों को गंभीरता से नहीं सुना गया। पीड़ित ने यह भी दावा किया कि अपनी बात रखने या विरोध करने पर लोगों के साथ गाली-गलौज की जाती है और झूठे मुकदमे में फंसाने की धमकी दी जाती है। अगर ये आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह केवल आपदा प्रबंधन की विफलता का मामला नहीं होगा, बल्कि संकट में फंसे नागरिकों के साथ व्यवहार का भी गंभीर प्रश्न बनेगा। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों का पक्ष सामने आना बाकी है। 150 मीटर का इलाका दो घंटे में कटने का दावा राघोपुर में कटाव की भयावहता के बीच जिला परिषद अध्यक्ष विपिन मंडल ने भी जल संसाधन विभाग के कामकाज पर सवाल उठाते हुए कटावरोधी और फ्लड फाइटिंग कार्यों पर हुए खर्च को सार्वजनिक करने की मांग की है। उनके मुताबिक, गंगा के कटाव की दिशा लगातार बदल रही है। पहले कटाव एक किलोमीटर पीछे की ओर हो रहा था, लेकिन बाद में इसका स्थान बदल गया। विपिन मंडल का दावा है कि करीब 30 मीटर के क्षेत्र में कटाव शुरू होने के बाद देखते ही देखते दो घंटे के भीतर लगभग 150 मीटर का इलाका प्रभावित हो गया। जल संसाधन विभाग की टीम को देखकर ऐसा नहीं लगता कि कटाव की समस्या का पर्याप्त अध्ययन कर उसके अनुरूप प्रभावी उपाय किए गए हैं। इलाके में करोड़ों रुपए खर्च होने की चर्चा है। ऐसे में यह स्पष्ट होना चाहिए कि किस काम पर कितनी राशि खर्च की गई, कौन-से कार्य कराए गए और उन कार्यों से कितनी सुरक्षा मिली। ‘मैं भी डेढ़-दो महीने से बेघर’ ऊर्जा मंत्री ने कटाव से प्रभावित परिवारों के दर्द का जिक्र करते हुए कहा कि वह खुद भी इस संकट की पीड़ा महसूस कर चुके हैं। उनके मुताबिक, उनके अपने घर में भी पानी प्रवेश कर गया था और वह करीब डेढ़ से दो महीने से बेघर हैं। भरोसा दिलाया कि जिन लोगों के घर कटाव में गिरे हैं, उन्हें राहत दिलाने के लिए सरकार हरसंभव प्रयास करेगी। प्रभावित क्षेत्र में स्थिति सामान्य करने और बचाव कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए रात से ही काम शुरू कर दिया गया है। पटना से लेकर स्थानीय स्तर तक के अधिकारी और पदाधिकारी स्थिति पर नजर रख रहे हैं। पानी घटा, लेकिन खतरा नहीं! फिलहाल राघोपुर में खतरा टला नहीं है। कई मकान अब भी कटाव की जद में बताए जा रहे हैं। एहतियात के तौर पर घर खाली कराए जा रहे हैं और प्रभावित परिवार सुरक्षित स्थानों की तलाश में हैं।
इंजीनियरों की निगरानी में फ्लड फाइटिंग और कटावरोधी कार्य दोबारा शुरू किए गए हैं। लेकिन जब तक कटाव की वास्तविक दिशा और उसके कारणों का आकलन नहीं होता, तब तक इन उपायों की सफलता को लेकर निश्चित दावा करना मुश्किल है। प्रशासन के सामने तत्काल चुनौती है कि लोगों की जान बचाई जाए, खतरे वाले घरों को समय रहते खाली कराया जाए और प्रभावित परिवारों को जरूरी सहायता उपलब्ध कराई जाए। इसके साथ ही कटावरोधी कार्यों की तकनीकी निगरानी और गुणवत्ता की जांच भी आवश्यक है। भागलपुर के राघोपुर में में गंगा के कटाव से तबाही मची है। गंगा की तेज धारा ने 125 मीटर से ज्यादा तटबंध को बहा दिया। छह से ज्यादा पक्के मकान और कई झोपड़ीनुमा घर गंगा में समा गए। कई और मकानों पर भी खतरा बना हुआ है। लोग अपने घरों को छोड़कर सुरक्षित जगहों पर जा रहे हैं। गंगा का जलस्तर घटने के बावजूद कटाव तेजी से हुआ, जिससे लोगों को संभलने का मौका नहीं मिला। करोड़ों रुपए खर्च होने के बावजूद तटबंध इतनी जल्दी कैसे टूट गया, इस पर जल संसाधन विभाग पर सवाल उठ रहे हैं। राघोपुर में ही बिहार सरकार के ऊर्जा मंत्री शैलेश कुमार उर्फ बुला मंडल का घर है। पथ निर्माण मंत्री इंजीनियर कुमार शैलेंद्र भी इसी इलाके से आते हैं, वर्तमान में बिहपुर विधानसभी सीट से विधायक हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए ऊर्जा मंत्री बुलो मंडल रात से ही घटनास्थल पर मौजूद हैं। इंजीनियरों की टीम की देखरेख में कटावरोधी काम फिर से शुरू किया गया है। प्रशासन खतरे वाले मकानों को खाली करवा रहा है। जिन परिवारों के घर उजड़ गए हैं, उनके सामने रहने की समस्या है। मौके से आई 3 तस्वीरें…. ‘22 साल से गंगा के कटाव से लड़ रहा हूं’ ऊर्जा मंत्री शैलेश कुमार उर्फ बुलो मंडल ने कहा कि गंगा का स्वरूप ऐसा है, जिससे मुकाबला करना आसान नहीं है। गंगा मैया की कृपा और कुदृष्टि, दोनों रूप देखने को मिलते हैं। कोई व्यक्ति इस प्राकृतिक चुनौती से संघर्ष कर सकता है। खुद करीब 22 वर्षों से गंगा के कटाव को झेलने और उससे संघर्ष करने की स्थिति से परिचित हैं। क्षेत्र में साल 2004 से कटाव शुरू हुआ था, जो जीरो प्वॉइंट से लेकर करीब नौ किलोमीटर तक अलग-अलग स्थानों पर जारी रहा। सरकार लगातार कटावरोधी कार्य कराती रही है। साल 2013 के बाद कुछ राहत मिली थी और लगभग दस वर्षों तक लोगों को अपेक्षाकृत राहत महसूस हुई। लेकिन साल 2024 के बाद एक बार फिर गंगा के कटाव ने गंभीर रूप धारण कर लिया। ‘राहत-बचाव कार्य जारी है’ मंत्री के अनुसार, मौजूदा संकट से निपटने के लिए सरकारी महकमा और शासन स्तर की मशीनरी सक्रिय है। कटाव के दौरान जमीन के भीतर से मिट्टी खिसकने यानी अंडरमाइनिंग की समस्या सामने आती है, जिससे पहले किए गए बचाव कार्य भी प्रभावित हो सकते हैं। विभाग इस चुनौती से निपटने के लिए नए प्रयोग कर रहा है। ‘5 से 15 मिनट में उजड़ गई दुनिया’ राघोपुर में कटाव की त्रासदी के बीच एक पीड़ित बयान सामने आया है। मिथलेश कुमार क्रांति ने बताया कि कटाव के खतरे के बीच घरों और झोपड़ियों को गिराए जाने से गरीब मजदूर परिवारों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। बांध कटने की आशंका के बीच अफरा-तफरी मच गई। देखते ही देखते महज 5 से 15 मिनट के भीतर एक के बाद एक घर गिराए जाने लगे। शुक्रवार शाम करीब 5:30 बजे तक इलाके में कई मकान और झोपड़ियां पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी थी। पीड़ित पक्ष का आरोप है कि इस दौरान जल संसाधन विभाग का कोई अधिकारी या कर्मचारी मौके पर मौजूद नहीं था। वहां मौजूद लोग कथित तौर पर बोरे लेकर परेशान थे, लेकिन प्रभावित परिवारों को अपना सामान निकालने तक का समय नहीं मिला। हालांकि, घरों को गिराने की परिस्थितियों और प्रशासनिक कार्रवाई के संबंध में संबंधित अधिकारियों का पक्ष सामने आना अभी बाकी है। दुर्गापूजा के लिए मंगाया था लाखों का कपड़ा, अब दुकान भी नहीं बची कटाव की मार ने केवल लोगों के सिर से छत नहीं छीनी, बल्कि उनकी वर्षों की मेहनत और रोजी-रोटी भी छीन ली। पीड़ित के मुताबिक, दुकान में दुर्गापूजा के कारोबार के लिए करीब 5 से 7 लाख रुपए का कपड़ा मंगाकर रखा गया था। त्योहार में बिक्री से परिवार की आर्थिक स्थिति सुधरने की उम्मीद थी, लेकिन अब वही कपड़ा तबाही की भेंट चढ़ गया। टीवी, फ्रिज, इनवर्टर, बैटरी, गैस सिलेंडर और घर का अन्य जरूरी सामान भी बर्बाद होने की बात कही गई है। पीड़ित ने बताया कि घर में रखे 45 हजार रुपए नकद भी नहीं बच सके। यहां तक कि गाड़ी की चाबी तक नहीं मिल पाई, जिससे सामान निकालने में भी परेशानी हुई। 20 से 25 घर गंगा में समाए पीड़ित का दावा है कि इस घटना में करीब 20 से 25 घर पूरी तरह जमींदोज हो गए। इनमें बड़ी संख्या साधारण मजदूरों और गरीब परिवारों के घरों की बताई जा रही है। आज इन परिवारों के पास न सुरक्षित आशियाना है, न सामान बचा है और न ही भविष्य को लेकर कोई स्पष्ट रास्ता दिखाई दे रहा है। प्रशासन पर गंभीर आरोप, विरोध करने पर धमकी देने का दावा पीड़ित पक्ष ने प्रशासन की कार्यशैली पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। आरोप है कि संकट के समय प्रभावित लोगों की परेशानियों को गंभीरता से नहीं सुना गया। पीड़ित ने यह भी दावा किया कि अपनी बात रखने या विरोध करने पर लोगों के साथ गाली-गलौज की जाती है और झूठे मुकदमे में फंसाने की धमकी दी जाती है। अगर ये आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह केवल आपदा प्रबंधन की विफलता का मामला नहीं होगा, बल्कि संकट में फंसे नागरिकों के साथ व्यवहार का भी गंभीर प्रश्न बनेगा। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों का पक्ष सामने आना बाकी है। 150 मीटर का इलाका दो घंटे में कटने का दावा राघोपुर में कटाव की भयावहता के बीच जिला परिषद अध्यक्ष विपिन मंडल ने भी जल संसाधन विभाग के कामकाज पर सवाल उठाते हुए कटावरोधी और फ्लड फाइटिंग कार्यों पर हुए खर्च को सार्वजनिक करने की मांग की है। उनके मुताबिक, गंगा के कटाव की दिशा लगातार बदल रही है। पहले कटाव एक किलोमीटर पीछे की ओर हो रहा था, लेकिन बाद में इसका स्थान बदल गया। विपिन मंडल का दावा है कि करीब 30 मीटर के क्षेत्र में कटाव शुरू होने के बाद देखते ही देखते दो घंटे के भीतर लगभग 150 मीटर का इलाका प्रभावित हो गया। जल संसाधन विभाग की टीम को देखकर ऐसा नहीं लगता कि कटाव की समस्या का पर्याप्त अध्ययन कर उसके अनुरूप प्रभावी उपाय किए गए हैं। इलाके में करोड़ों रुपए खर्च होने की चर्चा है। ऐसे में यह स्पष्ट होना चाहिए कि किस काम पर कितनी राशि खर्च की गई, कौन-से कार्य कराए गए और उन कार्यों से कितनी सुरक्षा मिली। ‘मैं भी डेढ़-दो महीने से बेघर’ ऊर्जा मंत्री ने कटाव से प्रभावित परिवारों के दर्द का जिक्र करते हुए कहा कि वह खुद भी इस संकट की पीड़ा महसूस कर चुके हैं। उनके मुताबिक, उनके अपने घर में भी पानी प्रवेश कर गया था और वह करीब डेढ़ से दो महीने से बेघर हैं। भरोसा दिलाया कि जिन लोगों के घर कटाव में गिरे हैं, उन्हें राहत दिलाने के लिए सरकार हरसंभव प्रयास करेगी। प्रभावित क्षेत्र में स्थिति सामान्य करने और बचाव कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए रात से ही काम शुरू कर दिया गया है। पटना से लेकर स्थानीय स्तर तक के अधिकारी और पदाधिकारी स्थिति पर नजर रख रहे हैं। पानी घटा, लेकिन खतरा नहीं! फिलहाल राघोपुर में खतरा टला नहीं है। कई मकान अब भी कटाव की जद में बताए जा रहे हैं। एहतियात के तौर पर घर खाली कराए जा रहे हैं और प्रभावित परिवार सुरक्षित स्थानों की तलाश में हैं।
इंजीनियरों की निगरानी में फ्लड फाइटिंग और कटावरोधी कार्य दोबारा शुरू किए गए हैं। लेकिन जब तक कटाव की वास्तविक दिशा और उसके कारणों का आकलन नहीं होता, तब तक इन उपायों की सफलता को लेकर निश्चित दावा करना मुश्किल है। प्रशासन के सामने तत्काल चुनौती है कि लोगों की जान बचाई जाए, खतरे वाले घरों को समय रहते खाली कराया जाए और प्रभावित परिवारों को जरूरी सहायता उपलब्ध कराई जाए। इसके साथ ही कटावरोधी कार्यों की तकनीकी निगरानी और गुणवत्ता की जांच भी आवश्यक है।

