भारतीय बच्चे नेपाल के स्कूलों में पढ़ने को मजबूर:अररिया के सीमावर्ती गांव में सड़क-पुल नहीं, अधिकारी कीचड़ में चलकर पहुंचे

भारतीय बच्चे नेपाल के स्कूलों में पढ़ने को मजबूर:अररिया के सीमावर्ती गांव में सड़क-पुल नहीं, अधिकारी कीचड़ में चलकर पहुंचे

अररिया के नरपतगंज स्थित सोनापुर पंचायत के सीमावर्ती मधुबनी गांव में बच्चों को पढ़ाई के लिए नेपाल के स्कूलों पर निर्भर रहना पड़ रहा है। यहां सड़क, पुल और नजदीकी स्कूल जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं। मीडिया में मुद्दा उठने के करीब एक साल बाद जिला शिक्षा पदाधिकारी साहेब आलम, डीपीआरओ मनीष कुमार, बीडीओ अजीत कुमार समेत प्रशासनिक टीम गांव पहुंची। सड़क नहीं होने से अधिकारियों के वाहन रास्ते में रुक गए। टीम को करीब डेढ़ से दो किलोमीटर तक कीचड़ भरे कच्चे रास्ते पर पैदल चलकर गांव पहुंचना पड़ा। ग्रामीणों ने बताया कि गांव से भारतीय स्कूल दो किलोमीटर दूर हैं। सड़क और पुल नहीं होने से बच्चों का वहां पहुंचना कठिन है। इसी वजह से वे नेपाल के स्कूलों में पढ़ते हैं और भारत के राष्ट्रगान से भी अनजान हैं। इलाज के लिए भी उन्हें नेपाल के विराटनगर जाना पड़ता है। निरीक्षण के बाद डीईओ साहेब आलम ने कहा कि गवारपुछरी में विद्यालय उपलब्ध है, लेकिन संपर्क मार्ग और पुलिया नहीं होने से बच्चे वहां नहीं जा पाते। अररिया के नरपतगंज स्थित सोनापुर पंचायत के सीमावर्ती मधुबनी गांव में बच्चों को पढ़ाई के लिए नेपाल के स्कूलों पर निर्भर रहना पड़ रहा है। यहां सड़क, पुल और नजदीकी स्कूल जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं। मीडिया में मुद्दा उठने के करीब एक साल बाद जिला शिक्षा पदाधिकारी साहेब आलम, डीपीआरओ मनीष कुमार, बीडीओ अजीत कुमार समेत प्रशासनिक टीम गांव पहुंची। सड़क नहीं होने से अधिकारियों के वाहन रास्ते में रुक गए। टीम को करीब डेढ़ से दो किलोमीटर तक कीचड़ भरे कच्चे रास्ते पर पैदल चलकर गांव पहुंचना पड़ा। ग्रामीणों ने बताया कि गांव से भारतीय स्कूल दो किलोमीटर दूर हैं। सड़क और पुल नहीं होने से बच्चों का वहां पहुंचना कठिन है। इसी वजह से वे नेपाल के स्कूलों में पढ़ते हैं और भारत के राष्ट्रगान से भी अनजान हैं। इलाज के लिए भी उन्हें नेपाल के विराटनगर जाना पड़ता है। निरीक्षण के बाद डीईओ साहेब आलम ने कहा कि गवारपुछरी में विद्यालय उपलब्ध है, लेकिन संपर्क मार्ग और पुलिया नहीं होने से बच्चे वहां नहीं जा पाते।  

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