झारखंड में डीजीपी की नियुक्ति से जुड़े नियम पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने कहा कि ऐसा नियम, जिसके तहत छह महीने से कम समय की सेवा वाले अधिकारी को भी डीजीपी नियुक्त किया जा सकता है, प्रथमदृष्टया सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह फैसले में तय कानून से सीधे टकराता हुआ दिखाई देता है। कोर्ट ने झारखंड सरकार को इस प्रावधान पर पुनर्विचार करने के लिए एक सप्ताह का समय दिया है। साथ ही राज्य से कहा है कि यदि वह नियम में बदलाव नहीं करना चाहता है, तो उसे अदालत के समक्ष इसका बचाव करना होगा। मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने स्पष्ट किया कि डीजीपी की नियुक्ति के लिए बनाए गए नियमों को उस कानून के अनुरूप होना चाहिए, जो सुप्रीम कोर्ट पहले ही तय कर चुका है। मौजूदा डीजीपी तदाशा मिश्रा को नोटिस सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड की मौजूदा डीजीपी तदाशा मिश्रा को भी नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने यह कदम इसलिए उठाया है, क्योंकि यदि छह महीने से कम समय की सेवा वाले अधिकारी की नियुक्ति की अनुमति देने वाले झारखंड के नियम को अदालत ने रद्द किया, तो इसका असर तदाशा मिश्रा की नियुक्ति पर भी पड़ सकता है। कोर्ट ने इस संभावित परिणाम को रिकॉर्ड पर लेते हुए उन्हें मामले में पक्ष रखने का अवसर दिया है। अदालत ने यह भी कहा कि नियम को बरकरार रखने की स्थिति में राज्य को यह बताना होगा कि वह सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहले से निर्धारित कानूनी व्यवस्था के अनुरूप कैसे है। इस तरह मामला केवल नियम की वैधता तक सीमित नहीं है, बल्कि मौजूदा डीजीपी की नियुक्ति पर भी इसके संभावित प्रभाव को लेकर महत्वपूर्ण हो गया है। हमारा सरोकार सत्ता में कौन है, इससे नहीं सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि अदालत की चिंता यह नहीं है कि केंद्र या राज्य में सत्ता में कौन है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट का बाध्यकारी कर्तव्य यह सुनिश्चित करना है कि इस अदालत द्वारा घोषित कानून को कमजोर या निष्प्रभावी न किया जाए। अदालत ने इसी संदर्भ में झारखंड को नियम पर एक सप्ताह के भीतर दोबारा विचार करने या उसे उचित ठहराने का निर्देश दिया है। इसके अलावा कोर्ट ने मामले में नियुक्त एमिकस क्यूरी को अन्य राज्यों में डीजीपी की नियुक्ति से संबंधित कानूनों और नियमों का भी अध्ययन करने को कहा है। इससे अदालत विभिन्न राज्यों में लागू व्यवस्थाओं की तुलना कर यह देखने की कोशिश करेगी कि डीजीपी नियुक्ति के लिए निर्धारित प्रावधान सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप हैं या नहीं। झारखंड में डीजीपी की नियुक्ति से जुड़े नियम पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने कहा कि ऐसा नियम, जिसके तहत छह महीने से कम समय की सेवा वाले अधिकारी को भी डीजीपी नियुक्त किया जा सकता है, प्रथमदृष्टया सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह फैसले में तय कानून से सीधे टकराता हुआ दिखाई देता है। कोर्ट ने झारखंड सरकार को इस प्रावधान पर पुनर्विचार करने के लिए एक सप्ताह का समय दिया है। साथ ही राज्य से कहा है कि यदि वह नियम में बदलाव नहीं करना चाहता है, तो उसे अदालत के समक्ष इसका बचाव करना होगा। मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने स्पष्ट किया कि डीजीपी की नियुक्ति के लिए बनाए गए नियमों को उस कानून के अनुरूप होना चाहिए, जो सुप्रीम कोर्ट पहले ही तय कर चुका है। मौजूदा डीजीपी तदाशा मिश्रा को नोटिस सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड की मौजूदा डीजीपी तदाशा मिश्रा को भी नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने यह कदम इसलिए उठाया है, क्योंकि यदि छह महीने से कम समय की सेवा वाले अधिकारी की नियुक्ति की अनुमति देने वाले झारखंड के नियम को अदालत ने रद्द किया, तो इसका असर तदाशा मिश्रा की नियुक्ति पर भी पड़ सकता है। कोर्ट ने इस संभावित परिणाम को रिकॉर्ड पर लेते हुए उन्हें मामले में पक्ष रखने का अवसर दिया है। अदालत ने यह भी कहा कि नियम को बरकरार रखने की स्थिति में राज्य को यह बताना होगा कि वह सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहले से निर्धारित कानूनी व्यवस्था के अनुरूप कैसे है। इस तरह मामला केवल नियम की वैधता तक सीमित नहीं है, बल्कि मौजूदा डीजीपी की नियुक्ति पर भी इसके संभावित प्रभाव को लेकर महत्वपूर्ण हो गया है। हमारा सरोकार सत्ता में कौन है, इससे नहीं सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि अदालत की चिंता यह नहीं है कि केंद्र या राज्य में सत्ता में कौन है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट का बाध्यकारी कर्तव्य यह सुनिश्चित करना है कि इस अदालत द्वारा घोषित कानून को कमजोर या निष्प्रभावी न किया जाए। अदालत ने इसी संदर्भ में झारखंड को नियम पर एक सप्ताह के भीतर दोबारा विचार करने या उसे उचित ठहराने का निर्देश दिया है। इसके अलावा कोर्ट ने मामले में नियुक्त एमिकस क्यूरी को अन्य राज्यों में डीजीपी की नियुक्ति से संबंधित कानूनों और नियमों का भी अध्ययन करने को कहा है। इससे अदालत विभिन्न राज्यों में लागू व्यवस्थाओं की तुलना कर यह देखने की कोशिश करेगी कि डीजीपी नियुक्ति के लिए निर्धारित प्रावधान सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप हैं या नहीं।

