आदिवासी बोले-जान दे देंगे, लेकिन परमाणु प्लांट नहीं लगने देंगे:रीवा में 28 हजार करोड़ के प्रस्तावित संयंत्र का विरोध; ग्रामीण बोले-100 गांव होंगे प्रभावित

आदिवासी बोले-जान दे देंगे, लेकिन परमाणु प्लांट नहीं लगने देंगे:रीवा में 28 हजार करोड़ के प्रस्तावित संयंत्र का विरोध; ग्रामीण बोले-100 गांव होंगे प्रभावित

सरकार लाड़ली बहना बंद कर दे, राशन नहीं दे, वृद्धावस्था पेंशन भी रोक दे… हमें मंजूर है, लेकिन जमीन पर परमाणु प्लांट नहीं लगना चाहिए। यह कहना है रीवा में रोझौही के ग्रामीण विशंभर कोल का। उन्होंने कहा-सरकारी योजनाएं बंद हो जाएं तो भी मंजूर है, लेकिन जमीन और गांव चला गया तो आने वाली पीढ़ियों के पास कुछ नहीं बचेगा। ग्रामीणों ने चेतावनी देते हुए कहा कि जान दे देंगे, लेकिन प्लांट नहीं लगने देंगे। रीवा के सिरमौर क्षेत्र में प्रस्तावित टाटा पावर परमाणु ऊर्जा संयंत्र को लेकर रोझौही, सरई कला समेत आसपास के गांवों के ग्रामीण विरोध कर रहे हैं। ग्रामीणों का दावा है कि परियोजना का असर करीब 100 गांवों तक हो सकता है। विरोध सिर्फ जमीन का नहीं है। खेती, पानी, घर और आने वाली पीढ़ियों का है। इसलिए प्रस्तावित परियोजना से जुड़ी शुरुआती गतिविधियों के बाद ग्रामीणों ने विरोध शुरू कर दिया है। इस मामले को लेकर भास्कर टीम रोझौही गांव पहुंची और ग्रामीणों से बात की। जानिए, ग्रामीणों की क्या चिंता है और वे परमाणु प्लांट का विरोध क्यों कर रहे हैं… 200 एकड़ जमीन का प्रस्ताव, ड्रिलिंग के बाद विरोध प्रस्तावित परियोजना के लिए करीब 200 एकड़ जमीन की बात सामने आई है। अभी परियोजना शुरुआती प्रक्रिया में है और प्लांट का निर्माण शुरू नहीं हुआ है। इसी दौरान रोझौही और सरई कला में जमीन की जांच के लिए ड्रिलिंग मशीनें पहुंचीं। ग्रामीणों के विरोध के बाद मशीनें वापस लौट गईं। स्थानीय जानकारी के मुताबिक करीब आठ जगहों पर ड्रिलिंग की तैयारी थी। इनमें चार स्थानों पर करीब 100 मीटर और चार स्थानों पर करीब 50 मीटर तक ड्रिलिंग की बात कही गई। ड्रिलिंग जमीन की जांच की प्रक्रिया का हिस्सा है। इसे प्लांट का निर्माण शुरू होना नहीं माना जाता। परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट, पर्यावरणीय मंजूरी, वन संबंधी अनुमति और परमाणु क्षेत्र से जुड़ी नियामकीय प्रक्रियाओं से गुजरना होगा। ग्रामीणों की आपत्ति इस बात को लेकर है कि जमीन की जांच के बाद अब टैगिंग की बात सामने आ रही है। उनका कहना है कि पहले यह स्पष्ट किया जाए कि कितनी जमीन ली जाएगी और किन गांवों के परिवार इससे प्रभावित होंगे। ग्रामसभा में आपत्ति, फिर जमीन पर गतिविधियों से नाराजगी रोझौही के सरपंच कोमल सिंह के मुताबिक परियोजना को लेकर ग्रामसभा में आपत्ति दर्ज की गई और ग्रामसभा ने प्रस्ताव का विरोध किया। ग्रामीणों का कहना है कि ग्रामसभा में विरोध के बाद भी जमीन से जुड़ी गतिविधियां होने से उनकी नाराजगी बढ़ी है। ग्रामीण अमित वैश्य का आरोप है कि परियोजना से जुड़ी गतिविधियां उनकी जमीन पर उनकी सहमति के बिना शुरू की गईं। उनका कहना है कि यदि जमीन पर कोई जांच या दूसरी गतिविधि होनी है तो संबंधित जमीन मालिकों को इसकी जानकारी दी जानी चाहिए। ग्रामीणों का सवाल है कि जब ग्रामसभा में प्रस्ताव का विरोध किया जा चुका है तो जमीन की जांच और टैगिंग क्यों की जा रही है। वे यह भी जानना चाहते हैं कि परियोजना के लिए कितनी जमीन की जरूरत होगी, किन गांवों की जमीन आएगी और कितने परिवार प्रभावित होंगे। छह साल में बनाया घर, अब फिर चिंता परियोजना की चर्चा के बीच ग्रामीणों को अपने घरों की भी चिंता है। कुछ परिवारों के घर प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बने हैं। कई परिवारों ने मजदूरी और बचत से वर्षों में अपने मकान तैयार किए हैं। ग्रामीण ममता प्रजापति बताती हैं कि कच्चे घर में बारिश के दौरान रहना मुश्किल होता था। परिवार की रोज की मजदूरी करीब 500 रुपए थी। इसी में से पैसा बचाकर करीब छह साल में घर बनाया। अब जमीन की टैगिंग और परियोजना की चर्चा के बाद उन्हें फिर अपने घर को लेकर चिंता होने लगी है। ग्रामीणों का कहना है कि घर बनाने में उनकी वर्षों की मेहनत लगी है। यदि परियोजना के लिए जमीन ली जाती है तो सिर्फ जमीन का सवाल नहीं होगा, बल्कि उन परिवारों के घर और खेती भी प्रभावित होगी। जमीन के साथ पानी की भी चिंता परमाणु परियोजना को लेकर ग्रामीणों की एक बड़ी चिंता पानी को लेकर है। क्षेत्र में तमसा और महाना नदियों समेत आसपास के जलस्रोत हैं। गांवों में खेती और घरेलू जरूरतों के लिए स्थानीय जलस्रोतों का इस्तेमाल होता है। ग्रामीणों की मांग है कि परियोजना का पूरा दायरा स्पष्ट किया जाए। कितनी जमीन चाहिए, कौन-कौन से गांव प्रभावित होंगे, कितने परिवारों की जमीन और घर आएंगे और प्रभावित लोगों के लिए क्या व्यवस्था होगी, इसकी जानकारी दी जाए। उनका कहना है कि जमीन की टैगिंग से पहले इन सवालों के जवाब दिए जाने चाहिए। ग्रामीण प्रेमलाल कोल का कहना है कि विकास के नाम पर गांव की जमीन और पानी नहीं लिया जाना चाहिए। जरूरत पड़ने पर वे सड़क से लेकर अदालत तक लड़ाई लड़ेंगे। परमाणु प्लांट को लेकर ग्रामीणों की आशंका परमाणु ऊर्जा संयंत्र में यूरेनियम जैसे ईंधन के परमाणु विखंडन से गर्मी पैदा की जाती है। इस गर्मी से पानी भाप में बदलता है। भाप टर्बाइन को घुमाती है और जनरेटर के जरिए बिजली पैदा होती है। सामान्य संचालन में परमाणु संयंत्र कोयले से चलने वाले बिजलीघर की तरह धुआं नहीं छोड़ता। हालांकि इसमें रेडियोधर्मी पदार्थ और परमाणु कचरा मौजूद होता है। इसलिए इसके संचालन में सुरक्षा, निगरानी और रेडियोधर्मी पदार्थों के प्रबंधन के लिए कड़े मानक जरूरी होते हैं। यूरेनियम एक रेडियोधर्मी धातु है। अत्यधिक या लंबे समय तक संपर्क स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है। कुछ रासायनिक रूपों में इसका असर किडनी पर भी पड़ सकता है। परमाणु संयंत्र में इसका इस्तेमाल नियंत्रित परिस्थितियों में किया जाता है और सामान्य संचालन में आम लोगों का सीधे रेडियोधर्मी पदार्थों के संपर्क में आना अपेक्षित नहीं होता। ग्रामीण इसी वजह से परियोजना से जुड़े सुरक्षा, पानी और पर्यावरण संबंधी सवालों के जवाब चाहते हैं। एक्सपर्ट प्रोफेसर विवेक वर्मा ने बताया कि परमाणु बिजलीघर में यूरेनियम का इस्तेमाल ईंधन के तौर पर किया जाता है। प्राकृतिक यूरेनियम में यूरेनियम-235 की मात्रा करीब 0.7 प्रतिशत होती है, जबकि कई प्रकार के परमाणु रिएक्टरों में ईंधन के लिए इसकी मात्रा बढ़ाई जाती है। रिएक्टर में यूरेनियम के परमाणु विखंडन से बड़ी मात्रा में ऊष्मा निकलती है, इसी ऊष्मा से पानी को भाप में बदला जाता है और भाप टरबाइन चलाकर बिजली पैदा करती है। उन्होंने बताया कि यूरेनियम की ऊर्जा घनत्व बहुत अधिक होती है, इसलिए बेहद कम मात्रा के ईंधन से भी बड़ी मात्रा में ऊर्जा पैदा की जा सकती है। हालांकि, अगर इसके उपयोग, भंडारण या परमाणु कचरे के प्रबंधन में लापरवाही होती है तो इसका मनुष्य, पशु, पक्षी और पर्यावरण पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है। हाईकोर्ट जाने की तैयारी, सुप्रीम कोर्ट भी जाएंगे सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी इस मामले में हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर करने की तैयारी कर रहे हैं। जरूरत पड़ने पर सुप्रीम कोर्ट जाने की बात भी कही है। उनका कहना है कि परियोजना को लेकर रेडिएशन, पानी और पर्यावरण से जुड़े पहलुओं पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। वे इसे आने वाली पीढ़ियों से जुड़े मुद्दे के तौर पर देखते हैं और स्थानीय लोगों की आपत्तियों को सामने रखने की बात कह रहे हैं। मध्यप्रदेश में अभी कोई चालू परमाणु बिजलीघर नहीं मध्यप्रदेश में फिलहाल कोई संचालित परमाणु बिजलीघर नहीं है। मंडला जिले में चुटका न्यूक्लियर पावर प्रोजेक्ट प्रस्तावित है, जिसमें 700-700 मेगावाट की दो इकाइयों की योजना है। यह परियोजना भी अलग-अलग प्रक्रियाओं से गुजर रही है। रीवा में प्रस्तावित परियोजना भी अभी शुरुआती प्रक्रिया में है। इसलिए वर्तमान स्थिति में प्लांट निर्माण शुरू होने की बात नहीं है। अभी जमीन की जांच और उससे जुड़ी गतिविधियां सामने आई हैं।

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