दूसरी शादी पर सिपाही पर बड़ी विभागीय कार्यवाही करना सही:हाईकोर्ट ने कहा- न्यूनतम सजा का प्रावधान नहीं, महिला सिपाही की याचिका खारिज

दूसरी शादी पर सिपाही पर बड़ी विभागीय कार्यवाही करना सही:हाईकोर्ट ने कहा- न्यूनतम सजा का प्रावधान नहीं, महिला सिपाही की याचिका खारिज

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक आचरण नियमावली, 1956 के नियम 29 के उल्लंघन पर केवल लघु दंड ही नहीं, बल्कि बड़ा दंड भी दिया जा सकता है।
न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम ने महिला सिपाही विनीता कुमारी की याचिका खारिज कर दी है। जानिये क्या है मामला याचिकाकर्ता यूपी पुलिस में कांस्टेबल हैं। 22 मार्च 2025 को उनके खिलाफ उत्तर प्रदेश पुलिस अधीनस्थ श्रेणी के अधिकारी (दंड एवं अपील) नियमावली, 1991 के नियम 14(1) के तहत आरोप-पत्र जारी हुआ। आरोप था कि पुलिस सेवा में आने के बाद उन्होंने पहले पति को तलाक दिए बिना दुर्गेश कुमार गौतम से विवाह कर लिया, जो आचरण नियमावली के नियम 29 का उल्लंघन है। उन्होंने इस आरोप-पत्र को रद्द करने और आगे की कार्यवाही पर रोक लगाने की मांग की थी। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने कहा कि नियम 29(3) के अनुसार इस उल्लंघन पर न्यूनतम सजा तीन वर्ष की वेतन-वृद्धि रोकना है, जो लघु दंड है। इसलिए बड़े दंड की प्रक्रिया वाले नियम 14(1) के बजाय कार्यवाही अधिकतम नियम 14(2) के तहत होनी चाहिए थी। सरकार के वकीन विरोध किया राज्य की ओर से स्थायी अधिवक्ता ने कहा कि नियम 29 का उप-नियम (3) 1976 में उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक आचरण (चतुर्थ संशोधन) नियमावली, 1976 द्वारा हटा दिया गया था और बाद में दोबारा नहीं जोड़ा गया। इसलिए नियुक्ति प्राधिकारी परिस्थितियों के अनुसार लघु या बड़ा, कोई भी दंड दे सकता है। कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता द्वारा उद्धृत सभी फैसले नियम 29 के असंशोधित रूप पर आधारित थे और उनमें 1976 के संशोधन पर विचार नहीं किया गया था। इसलिए वे मिसाल के रूप में बाध्यकारी नहीं हैं। कुछ मामले दूसरे आधारों पर तय हुए थे, जैसे दूसरी शादी साबित न होना, और तथ्य भिन्न थे। दंड तय करना तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर कोर्ट ने कहा उप-नियम (3) हटने के बाद यह नहीं कहा जा सकता कि इस उल्लंघन पर केवल तीन वेतन-वृद्धि रोकने जैसा लघु दंड ही दिया जा सकता है। दंड तय करना तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर अनुशासनात्मक प्राधिकारी का विवेक है। नियम 14(1) के तहत जांच शुरू होने का अर्थ यह नहीं कि बड़ा दंड देना ही होगा।
जांच के बाद प्राधिकारी चाहे तो लघु दंड भी दे सकता है। कोर्ट ने कहा कि दंड की मात्रा साक्ष्य और परिस्थितियों से तय होती है, इस बात से नहीं कि जांच किस उप-नियम के तहत हुई। नियम 14(2) के तहत जांच में बड़े दंड की आवश्यकता दिखे तो प्राधिकारी को नियम 14(1) की प्रक्रिया अपनानी होगी, लेकिन इसका उलटा आवश्यक नहीं है।

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