Crude Oil के मामले में भारत अब किसी एक देश या सीमित सप्लायर्स पर ज्यादा निर्भर नहीं रहना चाहता। वैश्विक तनाव, युद्ध और तेल की कीमतों में अचानक उछाल के बीच भारत ने कच्चे तेल की खरीद का दायरा बढ़ाया है। प्रधानमंत्री के मुख्य सचिव पीके मिश्रा के मुताबिक, भारत अब 27 के बजाय 43 देशों से कच्चा तेल मंगा रहा है। मिश्रा ने 3 अक्टूबर को नई दिल्ली में आयोजित Kautilya Economic Conclave 2026 में आर्थिक सुरक्षा और वैश्विक अनिश्चितता पर बात करते हुए यह जानकारी दी।
किसी एक पर निर्भर रहना नहीं चाहते
पीके मिश्रा के मुताबिक, आत्मनिर्भरता का मतलब दुनिया से कट जाना नहीं है। भारत को वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़े रहना है, लेकिन किसी एक देश, क्षेत्र या सप्लायर पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता से बचना है। यानी भारत जोखिम को बांटने की रणनीति पर काम कर रहा है। अगर किसी एक देश से सप्लाई रुकती है या किसी खास समुद्री रास्ते में परेशानी आती है, तो दूसरे स्रोतों से जरूरत पूरी की जा सके।
कच्चे तेल के मामले में यह रणनीति इसलिए अहम है, क्योंकि भारत अपनी घरेलू जरूरत का करीब 90 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में दुनिया के किसी हिस्से में युद्ध या सप्लाई संकट का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। हाल की रिपोर्टों में भी मिडिल ईस्ट के तनाव और कच्चे तेल की कीमतों के बीच संबंध साफ दिखाई दिया है।
महंगा तेल भारत की जेब पर डालता है असर
कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल भारत के लिए चिंता बढ़ाता है। तेल महंगा होने पर देश का इंपोर्ट बिल बढ़ता है और डॉलर की मांग पर भी दबाव आता है। इसका असर रुपये की चाल से लेकर महंगाई और व्यापार घाटे तक पर पड़ सकता है।
FY26 में भारत का कच्चे तेल का आयात बिल करीब 123.37 अरब डॉलर रहा। PPAC के आंकड़ों के मुताबिक इस दौरान भारत ने करीब 245.77 मिलियन टन कच्चे तेल का आयात किया। हालिया महीनों में भी तेल की कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। सितंबर के अंत में ब्रेंट क्रूड करीब 108 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था, जिसका असर भारतीय रुपये पर भी पड़ा।
आत्मनिर्भरता का मतलब अकेले चलना नहीं
पीके मिश्रा ने आत्मनिर्भर भारत की परिभाषा को भी व्यापक तरीके से समझाया। उनके मुताबिक, इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत को किसी दूसरे देश की जरूरत ही न पड़े। असली लक्ष्य ऐसी अर्थव्यवस्था बनाना है, जो किसी बड़े झटके के बाद भी खुद को संभाल सके और परिस्थितियों के मुताबिक तेजी से बदलाव कर सके।
युद्ध, व्यापार में रुकावट, एनर्जी प्राइसेस में अस्थिरता और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे तकनीकी बदलावों ने आर्थिक अनिश्चितता के नए रास्ते खोल दिए हैं। ऐसे माहौल में किसी एक सप्लायर या बाजार पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता जोखिम बढ़ा सकती है।
सिर्फ तेल नहीं, इन क्षेत्रों में भी यही रणनीति
भारत की यही रणनीति क्रिटिकल मिनरल्स, ऊर्जा और मैन्युफैक्चरिंग जैसे सेक्टर्स में भी दिखाई दे रही है। क्रिटिकल मिनरल्स का इस्तेमाल बैटरी, इलेक्ट्रिक व्हीकल, रिन्यूएबल एनर्जी और दूसरी आधुनिक तकनीकों में होता है। इनमें से कई जरूरी खनिजों की सप्लाई कुछ ही देशों या कंपनियों के हाथ में केंद्रित हैं। ऐसे में भारत घरेलू क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ अलग-अलग देशों से सप्लाई के रास्ते बनाने पर जोर दे रहा है।
सरकार ने नेशनल क्रिटिकल मिनरल्स मिशन के जरिए देश में खोज, प्रोसेसिंग और रीसाइक्लिंग की क्षमता बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए हैं। भारत ने अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी और नीदरलैंड जैसे देशों के साथ भी इस क्षेत्र में सहयोग बढ़ाया है।
घरेलू उत्पादन बढ़ाया जाए, लेकिन दुनिया से दूरी नहीं
पीके मिश्रा के मुताबिक, रणनीतिक क्षेत्रों में घरेलू क्षमता बढ़ाना जरूरी है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर चीज देश के भीतर ही बनाई जाए। जहां वैश्विक सप्लाई चेन से लागत कम होती है और प्रतिस्पर्धा बढ़ती है, वहां अंतरराष्ट्रीय बाजार से जुड़े रहना भी जरूरी है। यही वजह है कि भारत की रणनीति तीन हिस्सों पर टिकी दिखाई देती है। जहां जोखिम ज्यादा है वहां घरेलू क्षमता बढ़ाना, जहां किसी एक स्रोत पर निर्भरता ज्यादा है वहां सप्लायर बढ़ाना और जहां वैश्विक जुड़ाव से फायदा मिलता है वहां खुले बाजार के साथ आगे बढ़ना।
इलेक्ट्रॉनिक्स में दिखी बड़ी छलांग
इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर इसका एक उदाहरण है। भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स का उत्पादन FY15 के करीब 2 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर FY26 में लगभग 13 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया। इसी अवधि में इलेक्ट्रॉनिक्स का निर्यात करीब 38,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 4.24 लाख करोड़ रुपये हो गया। अब फोकस सिर्फ असेंबली पर नहीं है। सरकार सेमीकंडक्टर, कंपोनेंट्स, फार्मास्युटिकल्स और दूसरे रणनीतिक क्षेत्रों में भी पूरी मैन्युफैक्चरिंग चेन विकसित करने की कोशिश कर रही है।

