नालंदा यूनिवर्सिटी और CSIR-TKDL के बीच MoU साइन:शोध, क्षमता निर्माण और छात्र जुड़ाव पर जोर; भारत की पारंपरिक ज्ञान विरासत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर मिलेगी पहचान

नालंदा यूनिवर्सिटी और CSIR-TKDL के बीच MoU साइन:शोध, क्षमता निर्माण और छात्र जुड़ाव पर जोर; भारत की पारंपरिक ज्ञान विरासत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर मिलेगी पहचान

भारत की समृद्ध और प्राचीन ज्ञान परंपराओं को आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ सहेजने की दिशा में नालंदा विश्वविद्यालय और वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद की पारंपरिक ज्ञान डिजिटल लाइब्रेरी (CSIR-TKDL) इकाई, नई दिल्ली ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। दोनों प्रतिष्ठित संस्थानों ने पारस्परिक सहयोग को औपचारिक रूप देते हुए एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं। इस समझौते का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक ज्ञान के व्यवस्थित दस्तावेजीकरण, संरक्षण और इससे जुड़े बौद्धिक संपदा अधिकारों को सशक्त बनाना है। समारोह में शीर्ष नेतृत्व की मौजूदगी नालंदा विश्वविद्यालय के गोलमेज सम्मेलन कक्ष में आयोजित एक गरिमामय समारोह के दौरान इस ऐतिहासिक समझौते पर नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी और सीएसआईआर-टीकेडीएल की प्रमुख डॉ. विश्वजननी जे. सत्तीगेरी ने हस्ताक्षर किए। इस अवसर पर दोनों संस्थानों के कई वरिष्ठ अधिकारी, शोधकर्ता और गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे, जिन्होंने इस साझेदारी को भारतीय विरासत के वैज्ञानिक संरक्षण में एक युगांतरकारी कदम बताया। शोध, क्षमता निर्माण और छात्र जुड़ाव पर जोर यह रणनीतिक साझेदारी पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों के संरक्षण के साथ-साथ व्यापक अकादमिक आदान-प्रदान और क्षमता निर्माण के नए अवसर पैदा करेगी। समझौते के तहत दोनों संस्थान मिलकर छात्रों के लिए विशेष इंटर्नशिप, व्यावहारिक प्रशिक्षण और संयुक्त अनुसंधान परियोजनाओं की रूपरेखा तैयार करेंगे। इसके अलावा भारत की सांस्कृतिक धरोहर, विशेषकर देश के सुदूर क्षेत्रों में मौजूद मूल्यवान जनजातीय ज्ञान के दस्तावेजीकरण और नीतिगत विकास पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। वैश्विक स्तर पर ज्ञान विरासत की सुरक्षा यह सहभागिता अंतर-विषयक अनुसंधान और संबंधित हितधारकों की व्यापक भागीदारी के माध्यम से भारत की विविध ज्ञान संपदा को सुरक्षित रखने के प्रयासों को गति देगी। आधुनिक तकनीकी टूल्स और अकादमिक विशेषज्ञता के समन्वय से न केवल भारतीय पारंपरिक चिकित्सा, विज्ञान और जीवन मूल्यों का संरक्षण सुनिश्चित होगा, बल्कि इसके दुरुपयोग और गलत पेटेंट को रोकने में भी मदद मिलेगी। यह पहल राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की पारंपरिक ज्ञान विरासत को एक प्रामाणिक पहचान दिलाएगी। भारत की समृद्ध और प्राचीन ज्ञान परंपराओं को आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ सहेजने की दिशा में नालंदा विश्वविद्यालय और वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद की पारंपरिक ज्ञान डिजिटल लाइब्रेरी (CSIR-TKDL) इकाई, नई दिल्ली ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। दोनों प्रतिष्ठित संस्थानों ने पारस्परिक सहयोग को औपचारिक रूप देते हुए एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं। इस समझौते का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक ज्ञान के व्यवस्थित दस्तावेजीकरण, संरक्षण और इससे जुड़े बौद्धिक संपदा अधिकारों को सशक्त बनाना है। समारोह में शीर्ष नेतृत्व की मौजूदगी नालंदा विश्वविद्यालय के गोलमेज सम्मेलन कक्ष में आयोजित एक गरिमामय समारोह के दौरान इस ऐतिहासिक समझौते पर नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी और सीएसआईआर-टीकेडीएल की प्रमुख डॉ. विश्वजननी जे. सत्तीगेरी ने हस्ताक्षर किए। इस अवसर पर दोनों संस्थानों के कई वरिष्ठ अधिकारी, शोधकर्ता और गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे, जिन्होंने इस साझेदारी को भारतीय विरासत के वैज्ञानिक संरक्षण में एक युगांतरकारी कदम बताया। शोध, क्षमता निर्माण और छात्र जुड़ाव पर जोर यह रणनीतिक साझेदारी पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों के संरक्षण के साथ-साथ व्यापक अकादमिक आदान-प्रदान और क्षमता निर्माण के नए अवसर पैदा करेगी। समझौते के तहत दोनों संस्थान मिलकर छात्रों के लिए विशेष इंटर्नशिप, व्यावहारिक प्रशिक्षण और संयुक्त अनुसंधान परियोजनाओं की रूपरेखा तैयार करेंगे। इसके अलावा भारत की सांस्कृतिक धरोहर, विशेषकर देश के सुदूर क्षेत्रों में मौजूद मूल्यवान जनजातीय ज्ञान के दस्तावेजीकरण और नीतिगत विकास पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। वैश्विक स्तर पर ज्ञान विरासत की सुरक्षा यह सहभागिता अंतर-विषयक अनुसंधान और संबंधित हितधारकों की व्यापक भागीदारी के माध्यम से भारत की विविध ज्ञान संपदा को सुरक्षित रखने के प्रयासों को गति देगी। आधुनिक तकनीकी टूल्स और अकादमिक विशेषज्ञता के समन्वय से न केवल भारतीय पारंपरिक चिकित्सा, विज्ञान और जीवन मूल्यों का संरक्षण सुनिश्चित होगा, बल्कि इसके दुरुपयोग और गलत पेटेंट को रोकने में भी मदद मिलेगी। यह पहल राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की पारंपरिक ज्ञान विरासत को एक प्रामाणिक पहचान दिलाएगी।  

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