Sale Deed और Agreement of Sale में क्या फर्क होता है? साइन करने से पहले इन बातों का रखें ध्यान

Sale Deed और Agreement of Sale में क्या फर्क होता है? साइन करने से पहले इन बातों का रखें ध्यान

Agreement of Sale Vs Sale Deed: घर, फ्लैट या जमीन खरीदते समय सिर्फ पैसे का लेन-देन ही नहीं होता, कई कानूनी दस्तावेज भी तैयार किए जाते हैं। इनमें एग्रीमेंट ऑफ सेल और सेल डीड सबसे अहम दस्तावेजों में शामिल हैं। दोनों के नाम एक जैसे लगते हैं, लेकिन इनका काम बिल्कुल अलग है। सबसे जरूरी बात यह है कि एग्रीमेंट ऑफ सेल पर साइन करने या एडवांस रकम देने भर से खरीदार उस प्रॉपर्टी का कानूनी मालिक नहीं बन जाता। मालिकाना हक का कानूनी ट्रांसफर सेल डीड के जरिए होता है, जिसे संबंधित कानूनी और रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया पूरी करके दर्ज कराना जरूरी होता है।

एग्रीमेंट ऑफ सेल क्या होता है?

एग्रीमेंट ऑफ सेल यानी बिक्री समझौता खरीदार और विक्रेता के बीच होने वाला एक करार है। इसमें दोनों पक्ष इस बात पर सहमत होते हैं कि तय शर्तों के मुताबिक प्रॉपर्टी की बिक्री की जाएगी। इस दस्तावेज में प्रॉपर्टी का पूरा विवरण, बिक्री की कुल कीमत, एडवांस या बयाना राशि और बाकी रकम चुकाने की शर्तें लिखी होती हैं। साथ ही सेल डीड कराने की तारीख या उससे जुड़ी शर्तें, प्रॉपर्टी का कब्जा कब मिलेगा समेत बिक्री से जुड़ी दूसरी शर्तें भी इसी दस्तावेज में होती हैं। यानी इसे आसान भाषा में समझें तो एग्रीमेंट ऑफ सेल भविष्य में होने वाली बिक्री का समझौता है। लेकिन यहां एक बात गांठ बांध लें। इस समझौते पर साइन करने से अपने आप प्रॉपर्टी का मालिकाना हक खरीदार के नाम नहीं हो जाता।

सेल डीड क्या होती है?

सेल डीड वह डॉक्यूमेंट है जिसके जरिए विक्रेता प्रॉपर्टी के अपने अधिकार और मालिकाना हक को खरीदार को ट्रांसफर करता है। सामान्य तौर पर यह प्रॉपर्टी की बिक्री पूरी होने का मुख्य दस्तावेज होता है। सेल डीड में आमतौर पर खरीदार और विक्रेता की जानकारी, प्रॉपर्टी का पूरा विवरण, बिक्री की कुल रकम, भुगतान से जुड़ी जानकारी, प्रॉपर्टी के अधिकारों का ट्रांसफर और कब्जे से जुड़ी जानकारी शामिल होती है। अचल संपत्ति की सामान्य बिक्री में मालिकाना हक का कानूनी ट्रांसफर पूरा करने के लिए सेल डीड को सही तरीके से तैयार और रजिस्टर कराना जरूरी होता है।

दोनों दस्तावेजों में सबसे बड़ा फर्क क्या है?

दोनों के बीच अंतर को एक उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है। एग्रीमेंट ऑफ सेल में खरीदार और विक्रेता यह तय करते हैं कि प्रॉपर्टी को किन शर्तों पर बेचा और खरीदा जाएगा। यह आमतौर पर अंतिम बिक्री से पहले किया जाता है और इसमें एडवांस पेमेंट भी हो सकता है। वहीं, सेल डीड वह दस्तावेज है जिसके जरिए बिक्री पूरी होने पर प्रॉपर्टी का मालिकाना हक खरीदार को ट्रांसफर किया जाता है।

ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट की धारा 54 के मुताबिक, अचल संपत्ति की बिक्री का कॉन्ट्रैक्ट अपने आप प्रॉपर्टी में कोई मालिकाना हक या चार्ज पैदा नहीं करता। इसका मतलब यह है कि अगर खरीदार ने एडवांस पैसा दे दिया और एग्रीमेंट ऑफ सेल पर साइन भी कर दिए, तब भी इसे कानूनी मालिकाना हक मिलने के बराबर नहीं माना जा सकता। मालिकाना हक के ट्रांसफर के लिए सेल डीड और उससे जुड़ी जरूरी रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया अहम है।

Agreement of Sale साइन करने से पहले किन बातों की जांच करें?

  • प्रॉपर्टी का सही विवरण और उसकी सीमाएं
  • विक्रेता के मालिकाना हक और टाइटल के दस्तावेज
  • प्रॉपर्टी पर कोई लोन या अन्य बकाया तो नहीं है
  • भुगतान कब और कितनी किस्तों में करना है
  • सेल डीड कब रजिस्टर होगी
  • प्रॉपर्टी का कब्जा कब मिलेगा
  • समझौता रद्द होने या पैसा वापस मिलने की शर्तें
  • स्टांप ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन फीस कौन देगा
  • प्रॉपर्टी के लिए जरूरी अप्रूवल या परमिशन लिए गए हैं या नहीं

विक्रेता अगर जल्दी से एडवांस देने का दबाव बना रहा है, तो सिर्फ दबाव में आकर पैसा देने से बचना चाहिए।

सेल डीड रजिस्टर कराने से पहले भी करें ये जांच

सेल डीड पर साइन और रजिस्ट्रेशन से पहले प्रॉपर्टी के दस्तावेजों और पूरी डील की दोबारा जांच करना जरूरी है। खरीदार को खास तौर पर ये चीजें देखनी चाहिए:

  • विक्रेता का टाइटल और मालिकाना हक
  • पिछली सेल डीड और लिंक डॉक्यूमेंट
  • Encumbrance यानी प्रॉपर्टी पर किसी तरह का बकाया लोन या कानूनी भार तो नहीं है
  • प्रॉपर्टी और जमीन से जुड़े रिकॉर्ड
  • जहां जरूरी हो, वहां अप्रूव्ड प्लान और परमिशन
  • प्रॉपर्टी टैक्स या दूसरे बकाया
  • विक्रेता की पहचान और प्रॉपर्टी बेचने का अधिकार
  • सेल डीड में वही शर्तें और जानकारी दर्ज हैं या नहीं, जिन पर पहले सहमति बनी थी।

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