समाज और संसद दोनों जब तीखी बहसों और त्वरित प्रतिक्रियाओं की गिरफ्त में हों, तब संवाद के वास्तविक मायने क्या हैं? रांची के ‘कांके टॉक्स’ में राज्यसभा के उप सभापति हरिवंश ने भारतीय ज्ञान परंपरा, आदिवासी जीवन-दर्शन, बुद्ध और गांधी के विचारों से लेकर संसदीय मर्यादाओं तक पर खुलकर बात की। उन्होंने बताया कि कैसे असहमति का सम्मान, आत्म-मंथन और सामूहिकता ही किसी भी जीवंत समाज की असली ताकत होती है। हरिवंश ने कहा- “जब मैं संताल, मुंडा, उरांव, गोंड या भील समाजों की समृद्ध परंपराओं को देखता हूं, तो एक बात स्पष्ट दिखाई देती है कि इन समाजों में ‘मैं’ की नहीं, बल्कि ‘हम’ की परंपरा है। संताल समाज की मांझी परिषद हो या मुंडा समुदाय की निर्णय प्रक्रिया, वहां केंद्र में व्यक्ति नहीं, पूरा समाज और समूह होता है।’ कांके टॉक्स के संवाद कार्यक्रम में अन्य अतिथियों पद्मश्री बलबीर दत्त, पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा, आईपीएस प्रशांत आनंद, अरुण ऋषि ने भी अपने विचार रखे। अमित मोदी ने संचालन किया। भारतीय ज्ञान परंपरा का उल्लेख करते उप सभापति बोले -वाद-विवाद का उद्देश्य सामने वाले को परास्त करना या नीचा दिखाना नहीं भारतीय ज्ञान परंपरा पर हरिवंश ने कहा कि वाद-विवाद का उद्देश्य कभी भी सामने वाले को परास्त करना या नीचा दिखाना नहीं रहा, बल्कि संवाद के जरिए सत्य और निष्कर्ष तक पहुंचना रहा है। हमारे उपनिषदों की परंपरा संवाद की ही श्रेष्ठ मिसाल है। बौद्ध दर्शन की नींव में भी तर्क और संवाद है। बुद्ध ने कहा था— ‘अप्प दीपो भव’ यानी अपना प्रकाश स्वयं बनो। वज्जि गणराज्य के प्रसंग का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि जब तक समाज सामूहिक निर्णय लेगा और परंपराओं का पालन करेगा, तब तक कोई पराजित नहीं कर सकता। गांधी जी के प्रसंग का उदाहरण देते हुए बोले – नीतियों की आलोचना करें, लेकिन कभी भी भाषा की मर्यादा न खोएं डॉ. आंबेडकर के 25 नवंबर 1949 के भाषण को याद करते हुए हरिवंश ने कहा कि यदि दलों ने देशहित से ऊपर अपने स्वार्थ रखे, तो स्वतंत्रता खतरे में पड़ जाएगी। उन्होंने गांधी जी का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि भवानी दयाल संन्यासी के लेख पर गांधी जी ने कहा था कि नीतियों की आलोचना पूरी दृढ़ता से करो, लेकिन भाषा की मर्यादा और सामने वाले के प्रति आदर कभी मत खोओ। बिना पूरी बात समझे, तुरंत प्रतिक्रिया देना संवाद नहीं आज के सोशल मीडिया दौर पर उन्होंने कहा कि बिना पूरी बात समझे तुरंत प्रतिक्रिया देना संवाद नहीं है। संसदीय मर्यादाओं पर उन्होंने कहा कि नियम अचानक नहीं बने हैं। अंत में उन्होंने जेपी का उदाहरण देते हुए कहा कि जब इतने बड़े व्यक्तित्व अपनी भूल स्वीकार कर सकते हैं, तो हमें भी अहंकार छोड़कर सत्य और सामूहिकता के रास्ते पर चलना चाहिए।

