केस-1: सूर्यमणि कुमार पटना जिला शिक्षा पदाधिकारी कार्यालय में कर्मचारी हैं। इनकी पकड़ अधिक है। पिछले डेढ़ दशक से इसी ऑफिस में तैनात हैं। यहां का हर व्यक्ति और हर काम उनसे परिचित है। इस दफ्तर में पोस्टिंग पाने वाले अधिकारियों के नजदीकी बन जाते हैं। केस-2: कमलेश 10 साल से अधिक समय से पटना के RDEO ऑफिस में तैनात हैं। कार्यालय के लगभग हर काम में माहिर हैं। हर अधिकारी के पसंदीदा बनने में उन्हें अधिक समय नहीं लगता। दरअसल, बिहार के लगभग हर क्षेत्रीय कार्यालय की स्थिति ऐसी ही है। शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य विभागों के रिजनल ऑफिस में कई कर्मचारी नौकरी शुरू करने के बाद वहीं से रिटायर हो जाते हैं। लंबे समय तक एक ही जगह तैनात रहने के कारण वे ऑफिस में प्रभावशाली स्थिति बना लेते हैं। स्पेशल रिपोर्ट में जानिए ऐसे करीब 10,000 कर्मचारियों के साथ क्या होने वाला है? राज्य सरकार की क्या तैयारी है? बदलेंगे कर्मचारियों के कैडर और ट्रांसफर-पोस्टिंग के नियम बिहार के शिक्षा विभाग के क्षेत्रीय और जिला कार्यालयों में वर्षों से एक ही जगह जमे कर्मचारियों को लेकर सरकार नई व्यवस्था लागू करने की तैयारी में है। अभी कई स्तरों पर कर्मचारियों का कैडर जिला या प्रमंडल आधारित है। ऐसे में कर्मचारी उसी कैडर क्षेत्र में ट्रांसफर होते हैं, जिससे लंबे समय तक एक क्षेत्र में रहने की स्थिति बनती है। विभाग के स्तर पर अब इस व्यवस्था में बदलाव पर काम चल रहा है। क्षेत्रीय कार्यालयों में क्यों वर्षों से जमे हैं कर्मचारी? बिहार के सरकारी कार्यालयों में अलग-अलग पदों के लिए अलग कैडर व्यवस्था है। किसी कर्मचारी का कैडर राज्य स्तर का है तो किसी का प्रमंडल या जिला स्तर का। यही वजह है कि हर कर्मचारी का ट्रांसफर पूरे बिहार में नहीं हो सकता। संबंधित संवर्ग की नियमावली यह तय करती है कि कर्मचारी का तबादला किस क्षेत्र तक किया जा सकता है। बिहार में किस स्तर पर कैडर की व्यवस्था है? बिहार के सरकारी कार्यालयों में मोटे तौर पर अलग-अलग स्तरों पर संवर्ग बनाए गए हैं। इनमें राज्य स्तर, प्रमंडल स्तर और जिला स्तर की व्यवस्थाएं शामिल हैं। 1. राज्य स्तर का कैडर राज्य स्तर के कैडर में आने वाले कर्मचारियों की सेवा और तबादला व्यवस्था पूरे राज्य के दायरे में हो सकती है। ऐसे संवर्गों में संबंधित विभाग की जरूरत के अनुसार पोस्टिंग किया जाता है। इस स्तर पर विभिन्न विभागों के अधिकारी और कर्मचारी काम करते हैं। प्रशासनिक व्यवस्था में एसडीओ, डीएसपी, बीडीओ, कल्याण पदाधिकारी, शिक्षा पदाधिकारी जैसे पदों की अलग-अलग सेवा नियमावलियां हैं। वहीं, सचिवालय और विभागीय कार्यालयों में सहायक, यूडीसी और एलडीसी जैसे पद भी हैं। 2. प्रमंडलीय स्तर का कैडर दूसरा स्तर प्रमंडल का है। इस व्यवस्था में कर्मचारी एक प्रमंडल के भीतर अलग-अलग कार्यालयों में तैनात किए जा सकते हैं। शिक्षा विभाग के कुछ अधीनस्थ कार्यालयों के लिपिकीय संवर्ग है। इसका असर यह होता है कि कर्मचारी का ट्रांसफर प्रमंडल के बाहर आसानी से नहीं हो पाता। यानी प्रमंडल के संवर्ग का कर्मचारी लंबे समय तक इसी प्रमंडल में अलग-अलग कार्यालयों में काम करता रहता है। 3. जिला स्तर का कैडर तीसरा स्तर जिला आधारित कैडर है। इस व्यवस्था में कर्मचारी का कार्यक्षेत्र मुख्य रूप से संबंधित जिले तक सीमित रहता है। जिला, अनुमंडल और प्रखंड स्तर के कार्यालयों में ऐसे कर्मचारियों की तैनाती होती है। इससे किसी जिले में लंबे समय से काम कर रहा कर्मचारी उसी जिले के अलग-अलग ऑफिस में घूमता रहता है। कैडर बदलने तक उसका कार्यक्षेत्र मूल रूप से उसी सीमा में रहता है। जमे-जमाए कर्मचारियों पर नई पॉलिसी से क्या असर होगा? शिक्षा विभाग के स्तर पर लंबे समय से एक ही कार्यालय या क्षेत्र में काम कर रहे कर्मचारियों की भूमिका को लेकर सवाल उठते रहे हैं। विभाग का मानना है कि किसी ऑफिस में कर्मचारी का लंबे समय तक बने रहना प्रशासनिक दृष्टि से हमेशा उचित नहीं है। खासकर उन कार्यालयों में जहां विभागीय काम से रोजाना बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। लंबे समय तक एक ही जगह रहने से कर्मचारी को कार्यालय की पूरी कार्यप्रणाली की जानकारी हो जाती है। जैसे, कौन सा काम किस स्तर पर होता है, कौन सी फाइल कहां जाती है और किस प्रक्रिया में कितना समय लगता है। यहीं से समानांतर व्यवस्था बनने की आशंका पैदा होती है। किसी अधिकारी का तबादला होने के बाद भी यदि कार्यालय का पुराना सिस्टम जस का तस बना रहता है तो अधिकारी के लिए व्यवस्था में बदलाव करना मुश्किल हो सकता है। इसी वजह से अब सिर्फ अधिकारियों के ट्रांसफर के बजाय कार्यालय के कर्मचारियों की तैनाती को भी व्यवस्थित करने पर जोर दिया जा रहा है। अधिकारी बदलते हैं, लेकिन सिस्टम वही रहता है शिक्षा विभाग में अधिकारियों की पोस्टिंग और तबादला होता रहता है, लेकिन ऑफिस में काम करने वाले कई कर्मचारी लंबे समय तक वहीं बने रहते हैं। ऐसे में नया अधिकारी जब कार्यालय संभालता है तो उसे कामकाज समझने के लिए उन्हीं पुराने कर्मचारियों पर निर्भर रहना पड़ता है। यही निर्भरता विभाग के लिए चिंता का विषय है। ट्रांसफर सुधार पर जोर शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी के स्तर से शिक्षा विभाग में ट्रांसफर-पोस्टिंग व्यवस्था को लेकर लगातार बदलाव किए जा रहे हैं। शिक्षकों के लिए 2026 में नई ट्रांसफर व्यवस्था लागू की गई है। इसमें ऑनलाइन आवेदन और तय प्रक्रिया के माध्यम से स्थानांतरण की व्यवस्था की गई है। मंत्री ने शिक्षकों के ट्रांसफर में पारदर्शिता और ऑनलाइन प्रक्रिया पर जोर दिया है। अगस्त 2026 में भी विभाग की ओर से कहा गया था कि बिना ऑनलाइन आवेदन के शिक्षक का तबादला नहीं किया जाएगा। अब इसी तरह कर्मचारियों की तैनाती व्यवस्था को भी अधिक व्यापक और जरूरत आधारित बनाने की तैयारी की जा रही है। यहीं से रेशनलाइजेशन का आइडिया लिया गया है। किस स्तर पर बदलाव की तैयारी है? विभागीय सूत्रों के अनुसार नियमावली में संशोधन का प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है। इसका पहला लक्ष्य कैडर की सीमा को लेकर है। अभी जहां संबंधित कर्मचारी का कैडर जिला या प्रमंडल स्तर तक सीमित है। नई व्यवस्था में इसे राज्य स्तर तक ले जाने का प्रस्ताव है। इसका मतलब यह होगा कि शिक्षा विभाग के संबंधित संवर्ग के कर्मचारी को जरूरत के अनुसार बिहार के किसी भी जिले में तैनात किया जा सकेगा। पांच साल का अंतराल तय होने के आसार प्रस्ताव में दूसरा अहम बिंदु कर्मचारियों के एक स्थान पर रहने की अवधि को लेकर है। सूत्रों के अनुसार पांच साल का अंतराल तय किए जाने पर विचार किया जा रहा है। कर्मचारियों की संख्या के अनुसार होगा ट्रांसफर नई व्यवस्था का दूसरा बड़ा हिस्सा रेशनलाइजेशन होगा। सरल भाषा में इसका मतलब है, जहां जितने कर्मचारियों की जरूरत है, वहां उतने ही कर्मचारी रहें। अभी किसी ऑफिस में कर्मचारियों की संख्या जरूरत से ज्यादा हो सकती है, जबकि दूसरे कार्यालय में काम के मुकाबले कर्मचारी कम हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में ज्यादा कर्मचारी वाले कार्यालय से कर्मचारियों को कम कर्मचारी वाले कार्यालय में भेजा जा सकता है। शिक्षा विभाग में यह मॉडल शिक्षकों की तैनाती में भी चर्चा में रहा है। विभाग ने जरूरत से अधिक शिक्षकों को कमी वाले जिलों में भेजने की योजना पर काम किया जा रहा है। 1 लाख 6 हजार से अधिक शिक्षक को रेसलाइजेंशन के जरिए ट्रांसफर किया जा रहा है। अब कर्मचारियों के मामले में भी इसी तरह की जरूरत आधारित तैनाती का प्रस्ताव सामने आ रहा है। पटना, गया और मुजफ्फरपुर जैसे जिलों पर क्या असर होगा? रेशनलाइजेशन लागू होने की स्थिति में सबसे पहले कर्मचारियों की वास्तविक जरूरत का आकलन करना होगा। पटना, गया या मुजफ्फरपुर जैसे जिलों के जिला शिक्षा कार्यालयों में कर्मचारी अधिक हैं। नियमावली में सिर्फ एक लाइन जोड़कर हो सकता है बदलाव सूत्रों के अनुसार मौजूदा नियमावली में संशोधन के लिए बड़े पैमाने पर नई नियमावली बनाने के बजाय मौजूदा प्रावधान में संशोधन किए जाने की तैयारी है। सबसे बड़ा बदलाव क्या होगा? केस-1: सूर्यमणि कुमार पटना जिला शिक्षा पदाधिकारी कार्यालय में कर्मचारी हैं। इनकी पकड़ अधिक है। पिछले डेढ़ दशक से इसी ऑफिस में तैनात हैं। यहां का हर व्यक्ति और हर काम उनसे परिचित है। इस दफ्तर में पोस्टिंग पाने वाले अधिकारियों के नजदीकी बन जाते हैं। केस-2: कमलेश 10 साल से अधिक समय से पटना के RDEO ऑफिस में तैनात हैं। कार्यालय के लगभग हर काम में माहिर हैं। हर अधिकारी के पसंदीदा बनने में उन्हें अधिक समय नहीं लगता। दरअसल, बिहार के लगभग हर क्षेत्रीय कार्यालय की स्थिति ऐसी ही है। शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य विभागों के रिजनल ऑफिस में कई कर्मचारी नौकरी शुरू करने के बाद वहीं से रिटायर हो जाते हैं। लंबे समय तक एक ही जगह तैनात रहने के कारण वे ऑफिस में प्रभावशाली स्थिति बना लेते हैं। स्पेशल रिपोर्ट में जानिए ऐसे करीब 10,000 कर्मचारियों के साथ क्या होने वाला है? राज्य सरकार की क्या तैयारी है? बदलेंगे कर्मचारियों के कैडर और ट्रांसफर-पोस्टिंग के नियम बिहार के शिक्षा विभाग के क्षेत्रीय और जिला कार्यालयों में वर्षों से एक ही जगह जमे कर्मचारियों को लेकर सरकार नई व्यवस्था लागू करने की तैयारी में है। अभी कई स्तरों पर कर्मचारियों का कैडर जिला या प्रमंडल आधारित है। ऐसे में कर्मचारी उसी कैडर क्षेत्र में ट्रांसफर होते हैं, जिससे लंबे समय तक एक क्षेत्र में रहने की स्थिति बनती है। विभाग के स्तर पर अब इस व्यवस्था में बदलाव पर काम चल रहा है। क्षेत्रीय कार्यालयों में क्यों वर्षों से जमे हैं कर्मचारी? बिहार के सरकारी कार्यालयों में अलग-अलग पदों के लिए अलग कैडर व्यवस्था है। किसी कर्मचारी का कैडर राज्य स्तर का है तो किसी का प्रमंडल या जिला स्तर का। यही वजह है कि हर कर्मचारी का ट्रांसफर पूरे बिहार में नहीं हो सकता। संबंधित संवर्ग की नियमावली यह तय करती है कि कर्मचारी का तबादला किस क्षेत्र तक किया जा सकता है। बिहार में किस स्तर पर कैडर की व्यवस्था है? बिहार के सरकारी कार्यालयों में मोटे तौर पर अलग-अलग स्तरों पर संवर्ग बनाए गए हैं। इनमें राज्य स्तर, प्रमंडल स्तर और जिला स्तर की व्यवस्थाएं शामिल हैं। 1. राज्य स्तर का कैडर राज्य स्तर के कैडर में आने वाले कर्मचारियों की सेवा और तबादला व्यवस्था पूरे राज्य के दायरे में हो सकती है। ऐसे संवर्गों में संबंधित विभाग की जरूरत के अनुसार पोस्टिंग किया जाता है। इस स्तर पर विभिन्न विभागों के अधिकारी और कर्मचारी काम करते हैं। प्रशासनिक व्यवस्था में एसडीओ, डीएसपी, बीडीओ, कल्याण पदाधिकारी, शिक्षा पदाधिकारी जैसे पदों की अलग-अलग सेवा नियमावलियां हैं। वहीं, सचिवालय और विभागीय कार्यालयों में सहायक, यूडीसी और एलडीसी जैसे पद भी हैं। 2. प्रमंडलीय स्तर का कैडर दूसरा स्तर प्रमंडल का है। इस व्यवस्था में कर्मचारी एक प्रमंडल के भीतर अलग-अलग कार्यालयों में तैनात किए जा सकते हैं। शिक्षा विभाग के कुछ अधीनस्थ कार्यालयों के लिपिकीय संवर्ग है। इसका असर यह होता है कि कर्मचारी का ट्रांसफर प्रमंडल के बाहर आसानी से नहीं हो पाता। यानी प्रमंडल के संवर्ग का कर्मचारी लंबे समय तक इसी प्रमंडल में अलग-अलग कार्यालयों में काम करता रहता है। 3. जिला स्तर का कैडर तीसरा स्तर जिला आधारित कैडर है। इस व्यवस्था में कर्मचारी का कार्यक्षेत्र मुख्य रूप से संबंधित जिले तक सीमित रहता है। जिला, अनुमंडल और प्रखंड स्तर के कार्यालयों में ऐसे कर्मचारियों की तैनाती होती है। इससे किसी जिले में लंबे समय से काम कर रहा कर्मचारी उसी जिले के अलग-अलग ऑफिस में घूमता रहता है। कैडर बदलने तक उसका कार्यक्षेत्र मूल रूप से उसी सीमा में रहता है। जमे-जमाए कर्मचारियों पर नई पॉलिसी से क्या असर होगा? शिक्षा विभाग के स्तर पर लंबे समय से एक ही कार्यालय या क्षेत्र में काम कर रहे कर्मचारियों की भूमिका को लेकर सवाल उठते रहे हैं। विभाग का मानना है कि किसी ऑफिस में कर्मचारी का लंबे समय तक बने रहना प्रशासनिक दृष्टि से हमेशा उचित नहीं है। खासकर उन कार्यालयों में जहां विभागीय काम से रोजाना बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। लंबे समय तक एक ही जगह रहने से कर्मचारी को कार्यालय की पूरी कार्यप्रणाली की जानकारी हो जाती है। जैसे, कौन सा काम किस स्तर पर होता है, कौन सी फाइल कहां जाती है और किस प्रक्रिया में कितना समय लगता है। यहीं से समानांतर व्यवस्था बनने की आशंका पैदा होती है। किसी अधिकारी का तबादला होने के बाद भी यदि कार्यालय का पुराना सिस्टम जस का तस बना रहता है तो अधिकारी के लिए व्यवस्था में बदलाव करना मुश्किल हो सकता है। इसी वजह से अब सिर्फ अधिकारियों के ट्रांसफर के बजाय कार्यालय के कर्मचारियों की तैनाती को भी व्यवस्थित करने पर जोर दिया जा रहा है। अधिकारी बदलते हैं, लेकिन सिस्टम वही रहता है शिक्षा विभाग में अधिकारियों की पोस्टिंग और तबादला होता रहता है, लेकिन ऑफिस में काम करने वाले कई कर्मचारी लंबे समय तक वहीं बने रहते हैं। ऐसे में नया अधिकारी जब कार्यालय संभालता है तो उसे कामकाज समझने के लिए उन्हीं पुराने कर्मचारियों पर निर्भर रहना पड़ता है। यही निर्भरता विभाग के लिए चिंता का विषय है। ट्रांसफर सुधार पर जोर शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी के स्तर से शिक्षा विभाग में ट्रांसफर-पोस्टिंग व्यवस्था को लेकर लगातार बदलाव किए जा रहे हैं। शिक्षकों के लिए 2026 में नई ट्रांसफर व्यवस्था लागू की गई है। इसमें ऑनलाइन आवेदन और तय प्रक्रिया के माध्यम से स्थानांतरण की व्यवस्था की गई है। मंत्री ने शिक्षकों के ट्रांसफर में पारदर्शिता और ऑनलाइन प्रक्रिया पर जोर दिया है। अगस्त 2026 में भी विभाग की ओर से कहा गया था कि बिना ऑनलाइन आवेदन के शिक्षक का तबादला नहीं किया जाएगा। अब इसी तरह कर्मचारियों की तैनाती व्यवस्था को भी अधिक व्यापक और जरूरत आधारित बनाने की तैयारी की जा रही है। यहीं से रेशनलाइजेशन का आइडिया लिया गया है। किस स्तर पर बदलाव की तैयारी है? विभागीय सूत्रों के अनुसार नियमावली में संशोधन का प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है। इसका पहला लक्ष्य कैडर की सीमा को लेकर है। अभी जहां संबंधित कर्मचारी का कैडर जिला या प्रमंडल स्तर तक सीमित है। नई व्यवस्था में इसे राज्य स्तर तक ले जाने का प्रस्ताव है। इसका मतलब यह होगा कि शिक्षा विभाग के संबंधित संवर्ग के कर्मचारी को जरूरत के अनुसार बिहार के किसी भी जिले में तैनात किया जा सकेगा। पांच साल का अंतराल तय होने के आसार प्रस्ताव में दूसरा अहम बिंदु कर्मचारियों के एक स्थान पर रहने की अवधि को लेकर है। सूत्रों के अनुसार पांच साल का अंतराल तय किए जाने पर विचार किया जा रहा है। कर्मचारियों की संख्या के अनुसार होगा ट्रांसफर नई व्यवस्था का दूसरा बड़ा हिस्सा रेशनलाइजेशन होगा। सरल भाषा में इसका मतलब है, जहां जितने कर्मचारियों की जरूरत है, वहां उतने ही कर्मचारी रहें। अभी किसी ऑफिस में कर्मचारियों की संख्या जरूरत से ज्यादा हो सकती है, जबकि दूसरे कार्यालय में काम के मुकाबले कर्मचारी कम हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में ज्यादा कर्मचारी वाले कार्यालय से कर्मचारियों को कम कर्मचारी वाले कार्यालय में भेजा जा सकता है। शिक्षा विभाग में यह मॉडल शिक्षकों की तैनाती में भी चर्चा में रहा है। विभाग ने जरूरत से अधिक शिक्षकों को कमी वाले जिलों में भेजने की योजना पर काम किया जा रहा है। 1 लाख 6 हजार से अधिक शिक्षक को रेसलाइजेंशन के जरिए ट्रांसफर किया जा रहा है। अब कर्मचारियों के मामले में भी इसी तरह की जरूरत आधारित तैनाती का प्रस्ताव सामने आ रहा है। पटना, गया और मुजफ्फरपुर जैसे जिलों पर क्या असर होगा? रेशनलाइजेशन लागू होने की स्थिति में सबसे पहले कर्मचारियों की वास्तविक जरूरत का आकलन करना होगा। पटना, गया या मुजफ्फरपुर जैसे जिलों के जिला शिक्षा कार्यालयों में कर्मचारी अधिक हैं। नियमावली में सिर्फ एक लाइन जोड़कर हो सकता है बदलाव सूत्रों के अनुसार मौजूदा नियमावली में संशोधन के लिए बड़े पैमाने पर नई नियमावली बनाने के बजाय मौजूदा प्रावधान में संशोधन किए जाने की तैयारी है। सबसे बड़ा बदलाव क्या होगा?

