भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक परम्परा का केन्द्रीय तत्त्व श्रद्धा है। सत्य को हृदय में धारण करने की शक्ति को श्रद्धा कहा जाता है। श्रद्धाभाव ही जीवन में स्थिरता, दिशा और समर्पण का मूल है—श्रद्धावान् लभते ज्ञानम्। शास्त्रों में श्रद्धा वै आप: कहा जाता है। ब्रह्माण्ड में पानी चार प्रकार का होता है। परमेष्ठीलोक में ‘अम्भ’ कहलाता है। सूर्यलोक में ‘मरीचि’, चन्द्रमा पर ‘श्रद्धा’ तथा पार्थिव जल ‘मर’ कहलाता है। श्रद्धा रूप पानी सोम की प्रथम अवस्था है। श्रद्धा ही सोम बनती है। आप:-वायु-सोम तीन अवस्थाएं सोम की होती हैं। अग्नि जहां विशकलन (खण्डन) करता है, वहीं सोम स्नेहगुण युक्त है। मनुष्य का श्रद्धा भाग (चान्द्ररस) जिस ओर झुक जाता है, वह उसी से जुड़ जाता है। गुरु की ओर शिष्य का झुकाव है, श्रद्धा के कारण शिष्य ने गुरु को पकड़ लिया है। श्रद्धा के प्रभाव से वह स्वयं गुरु से बंध गया। अब गुरु की कोई भी निंदा करे, शिष्य इससे कभी प्रभावित नहीं होगा। पुरुष का स्वरूप उसी श्रद्धा से बना हुआ है। जिस पर वह श्रद्धा करता है, उसका मन वैसा ही बन जाता है। दोनों के आत्मा अभिन्न हो जाते हैं—तं यथायथोपासते, तथैव भवति (मुद्गल उप. 3.3)। गीता भी इसी को स्पष्ट करती है—
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत!
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्ध: स एव स: ॥ (17/3)
इसी श्रद्धा से सोम, सोम से वर्षा, वर्षा से अन्न, अन्न से शुक्र, शुक्र से सन्तान होती है। चन्द्रमा पर संचित इसी जल से पितर तृप्त होते हैं। ऋग्वेद में कहा है कि पितर सौम्य है—पितर: सौम्यास:। पितरों का सम्बन्ध सोम से है, देवताओं का सम्बन्ध अग्नि से है। स्वयंभू में ऋषि प्राण रहता है। इस ऋषि प्राण से परमेष्ठी के आप: तत्त्व का विकास होता है। इस आप: के दो भाग हैं-भृगु और अंगिरा। भृगु स्नेह का वाचक है, अंगिरा तेज का। भृगु की भी तीन अवस्थाएं हैं—आप:, वायु और सोम। इनमें से आप: तत्त्व के आधार पर असुर सृष्टि बनती है, सोम के आधार पर पितर सृष्टि का विकास होता है और वायु के आधार पर गन्धर्व सृष्टि का विकास होता है। अग्नि और सोम को सत्य और ऋत भी कहा जाता है। इस प्रकार पितरों का सम्बन्ध ऋत से जुड़ जाता है। पितर प्राणों से देवप्राणों का विकास होता है।
हमारे शरीर के निर्माण में ऋषि, पितर और देवता तीनों का योगदान है। स्वयंभू से ऋषि तत्त्व, परमेष्ठी से पितृतत्त्व और सूर्य से देवतत्त्व लेकर ही हम उत्पन्न होते हैं। इसलिये इन तीनों के प्रति हमारा ऋण है। ऋषिऋण ब्रह्मचर्य द्वारा अर्थात् ज्ञान द्वारा, देवऋण यज्ञ द्वारा और पितृऋण पुत्रोत्पत्ति द्वारा चुकाया जाता है। जायमानो वै ब्राह्मणस्त्रिभि: ऋणवान् जायते ब्रह्मचर्येण ऋषिभ्यो यज्ञेन देवेभ्य: प्रजया पितृभ्य:। एष वा अनृणी य: पुत्री यज्वा ब्रह्मचारी च। (तै.सं. 6.3.10.5)
मनुष्य का आत्मा सोमप्रधान होने से सत्यभाव से च्युत रहता है। देवताओं का आत्मा सत्य अग्नि के कारण सत्यभाव से युक्त रहता है। पितरों और देवों के अनुग्रह से जीवनयात्रा यथावत् चलती है, अतएव उनके प्राकृतिक कार्यों के अनुरूप मनुष्य भी देव—पितरों की तृप्ति हेतु तथा अग्नि और सोम के संतुलन के लिये विभिन्न ऋतुओं में श्राद्ध-यज्ञादि करते हैं- यह देवों तथा मनुष्यों का परस्पर भावन है, सहयोग है।
प्राकृतिक नियम है कि जो वस्तु जिस स्थान की होती है, अपने प्रभाव से आकर्षित होकर उसी में लीन हो जाती है। पार्थिव देह का त्यागकर प्रेतात्मा पार्थिव आकर्षण से निकलते ही प्रतिसंचर क्रम से अपने जनक चन्द्रमा में चले जाते हैं।
ये वै के चास्माल्लौकात् प्रयन्ति, चन्द्रमसमेव ते सर्वे गच्छन्ति॥ (कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषत् 1/2)
सूक्ष्म शरीर धारण कर जो पुरुष चन्द्रलोक में चला जाता है, उसका सम्बन्ध अपने पुत्र से बना रहता है। पुत्र में पिता का ही श्रद्धारस आता है। इसी श्रद्धा-सूत्र से, चन्द्रलोक जाते हुए प्राणी को, सोममय तन्दुलों (चावल) से बने पिण्डदान से, अन्न पहुंचा देता है। अत: इस कर्म को श्राद्ध कहते हैं।
सूर्य पिण्ड में रहने वाले अमृत प्राण को इन्द्र कहते है। अमावस्या को चूंकि चन्द्रमा इन्द्र के साथ रहता है—अस्मिन दिवसे चन्द्रमा इन्द्रेण अमा-सह-वसति। अत: यह दिन अमावस्या कहलाया। सूर्य-चन्द्रमा के योग के कारण इसे दर्श भी कहते हैं।
जिस दिन पृथ्वी सूर्य और चन्द्रमा के बीच आ जाती है, उस दिन चन्द्रमा का प्रकाशित भाग हमारी ओर रहता है। यही पूर्णिमा है। पूर्णिमा में देव प्राण की सत्ता रहती है। शुक्ल पक्ष की अष्टमी देवों का प्रात: काल, पूर्णिमा मध्याह्न, कृष्णाष्टमी (कृष्ण पक्ष की अष्टमी) सायंकाल है। अमावस्या अद्र्धरात्रि है। इसके विपरीत कृष्ण पक्ष की अष्टमी पितरों का प्रात:, अमावस्या मध्याह्न, शुक्लाष्टमी (शुक्ल पक्ष की अष्टमी) सायंकाल, पूर्णिमा अद्र्धरात्रि है। हमारे अनुपात में 30 दिन का समय पितरों का एक दिन है। हमारा अहोरात्र 24 घण्टे का होता है। चन्द्रमा को दक्ष वृत्त के परिभ्रमण में एक मास लगता है, अत: पितरों का अहोरात्र 30 दिन का हुआ किंतु पितरों के अनुपात से तो वह एक ही अहोरात्र है। अत: हर माह श्राद्ध उनके लिए तो दैनिक हो जाता है।
हमारा निर्माण आधिदैविक अग्नि-रुद्र-विष्णु-आदित्य-अश्विनीकुमार, मित्रावरुण, इन्द्र, त्वष्टा, पूषा आदि प्राणदेवताओं से होता है। सब में देवता रहते हैं—मात्रा और क्रम भेद से। इसी कारण पदार्थों में भिन्नता रहती है। शरीर का जो देवता कम हो जाता है, वह उसी देवता-प्रधान औषधि से स्वस्थ होता है। यदि किसी देवता की मात्रा बढ़ जाती है तो प्रतिद्वन्द्वी औषधि से समभाव किया जाता है। उपवास के माध्यम से कई प्राण देवताओं की कमी पूरी की जाती है। उपवास से प्राण सीधा आत्मा में पहुंचकर एक प्रकार का अतिशय पैदा कर देता है। अतिशयाधान के लिए ही उपवास किया जाता है।
वनस्पति व ओषधियों में सोम की प्रचुर मात्रा रहती है। यही कारण है कि वनस्पति और ओषधियां देवताओं को आकृष्ट करती हैं। सोम देवताओं का अन्न है। अमावस्या को यजमान अनशन व्रत करेगा, तो अशनाया सूत्र से आकर्षित पितर प्राण इसके आत्मा में प्रविष्ट हो जाएगा। यदि कुछ भी नहीं खाया जाता तो शरीर का वैश्वानर अग्नि मंद पड़ जाता है। अग्नि मन्द होते ही हृदय से भूख (अशनाया) पैदा होती है। इसी बल के द्वारा अन्न लाया जाता है। शरीर की अग्नि में आहुत होता है। अन्न के अभाव में यह बल प्रकृति में व्याप्त प्राण को खींचकर आत्मा से जोड़ देता है। शिवरात्रि में साम्बसदाशिव प्राण, एकादशी को विष्णु प्राण, शरद पूर्णिमा को अश्विनी नक्षत्र का प्राण व्याप्त रहता है, सम्पूर्ण प्रकृति में। गणेश चतुर्थी को रुद्र पुत्र की सत्ता रहती है। इन प्राणों को आत्मसात करने के लिए ही इन दिनों में उपवास किया जाता है। वे प्राण देवता आकर्षित होकर आत्मा में बस जाते हैं।
अमावस्या को पितर प्राण पूर्ण रूप से पृथ्वी पर व्याप्त रहते हैं। यदि अमावस्या में व्यक्ति कुछ नहीं खाता है, तो सर्वत्र व्याप्त पितर प्राण इसके आत्मा से सम्बन्ध बना लेता है। उसका अनशन कर्म पितृदैवत्य हो जाता है। भोजन करने से आग्नेय प्राण बढ़कर सोम-प्राणों की सत्ता को रोक देते हैं—पितर प्राणों की सत्ता को। अत: व्यक्ति को वही वस्तु खानी चाहिए जो देवता न खाते हों—अर्थात् वनौषधि और फल। इनमें सोम अल्प मात्रा में रहता है। अत: उनका देवताओं से (पार्थिव) सम्बन्ध भी नहीं रहता।
प्रत्येक माह की अमावस्या को नित्य श्राद्ध काल के रूप में माना जाता है। इस श्राद्ध को पार्वण श्राद्ध कहा जाता है। आश्विन कृष्ण अमावस्या सर्वपितृ अमावस्या कहलाती है। यही श्राद्ध पक्ष पितरों के तर्पण का मुख्य काल माना गया है। मान्यता है कि इस दिन पितृ अपने वंशजों के समीप आते हैं। अन्न और जल से तृप्त होकर वे वंशजों को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देकर लौट जाते हैं। श्रद्धा श्राद्ध की आत्मा है। श्राद्ध का सम्पूर्ण विधान अर्थात् पिण्डदान, तर्पण, ब्राह्मण भोजन तभी सार्थक होता है जब वह श्रद्धा, स्नेह, संकल्प और कृतज्ञता से अनुप्राणित होता है।
क्रमश:
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