राजस्थानी फिल्म निर्देशक-निर्माता राधेश्याम पीपलवा की कोंकणी फिल्म ‘मोग आसुम’ को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला है। गुजरात में हुए 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में ‘मोग आसुम’ को सर्वश्रेष्ठ कोंकणी फिल्म चुना गया है। फिल्म का निर्देशन राधेश्याम पीपलवा और एंजेलो एग्नेलो ब्रागांजा ने किया है। राजस्थान के सीकर से ताल्लुक रखने वाले और मुंबई में रहकर फिल्म निर्माण करने वाले पीपलवा दैनिक भास्कर कार्यालय पहुंचे। राधेश्याम पीपलवा ने बातचीत में अपनी फिल्म की कहानी, पांच राष्ट्रीय पुरस्कारों तक पहुंची अपनी यात्रा, गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर से मिले सम्मान, राजस्थान की लोकभाषा-संगीत और सांस्कृतिक विरासत को लेकर बात की।
सवाल: जिस कोंकणी फिल्म के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला, उसके बारे में बताइए। राधेश्याम पीपलवा: इस फिल्म का शीर्षक ‘मोग आसुम’ है, जिसका अंग्रेजी में अर्थ ‘लेट देयर बी लव’ होता है। यह ऐसी कहानी है, जिसमें एक महिला की मृत्यु हो चुकी है, लेकिन वह वापस आती है। मेरे लिए यह कहानी हमारे शास्त्रों में सुनाई जाने वाली सती-सावित्री की कथा से भी कहीं न कहीं जुड़ती है। सावित्री का प्रेम और स्नेह कितना पवित्र रहा होगा कि उसे अपने पति को वापस ले जाने का अवसर मिला। मेरे लिए इस फिल्म में प्यार का अर्थ सिर्फ किसी को अपने पास रखना नहीं है। प्यार का एक अर्थ यह भी है कि आप सामने वाले को जाने दें, उसे मुक्त करें। मैं इसे हीलिंग वाली फिल्म मानता हूं। मैं राजस्थान से हूं और मुंबई में रहता हूं। बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं, जो दुनिया के दूसरे हिस्सों में जाकर बस गए। जब लोग बाहर चले जाते हैं तो पीछे उनकी कला, संस्कृति, म्यूजिक, विरासत और भाषा को संभालने वाला कौन रहता है। यह सवाल खड़ा होता है। यह तकलीफ मैंने राजस्थान में भी हमेशा महसूस की है, इसलिए कहीं न कहीं यह फिल्म उन लोगों और उनकी विरासत के लिए भी एक तरह की श्रद्धांजलि है। सवाल: आपको पांच राष्ट्रीय पुरस्कार मिले हैं। यह यात्रा कहां से शुरू हुई? राधेश्याम पीपलवा: मैं कभी फिल्म इंडस्ट्री में जाना नहीं चाहता था। मैं बैडमिंटन का नेशनल प्लेयर रहा हूं। पहली बार बैडमिंटन खेलने के लिए ही एक कैंप में मुंबई गया था। फिर ऐसा मोड़ आया कि मैं विज्ञापन की दुनिया में चला गया। इसके बाद फिल्में करने लगा। अब तक 300 से ज्यादा एड फिल्म्स बनाई हैं। कई साल पहले मेरे एक दोस्त ने मुझसे वादा लिया कि वे गोवा के लिए भाषा और संस्कृति क्षेत्र में काम करना चाहते हैं और एक फिल्म बनाना चाहते हैं। उन्होंने कहा तुम्हारी मदद के बिना मैं यह फिल्म नहीं बना पाऊंगा। मैंने वह वादा पूरा किया। उस फिल्म का विषय मुझे बहुत अच्छा लगा। सवाल था कि हिंदी सिनेमा में संगीत की यात्रा कैसे बनी और क्षेत्रीय भाषाओं के संगीतकारों, गायकों और रचनाकारों के साथ क्या हुआ। हमने उन अनसुने संगीतकारों को श्रद्धांजलि देने के उद्देश्य से फिल्म बनाई। फिल्म को तीन राष्ट्रीय पुरस्कार मिले और वह ऑस्कर की दौड़ तक भी पहुंची। हमारे राजस्थान का भी संगीत लोगों ने यहां से लिया और फिल्मों में इस्तेमाल किया। हालांकि उसके मूल रचनाकारों को पहचान नहीं मिली। उदाहरण के तौर पर ‘निंबूड़ा’ को ही देखिए। यह आज का बनाया हुआ गीत नहीं है। इसकी जड़ें राजस्थान की पुरानी लोक परंपरा में हैं। जब किसी फिल्म में इसे इस्तेमाल किया जाता है तो उसकी कॉमर्शियल वेल्यू बढ़ जाती है। जिसने मूल रूप से इसे बनाया या गाया होगा, उसकी अगली पीढ़ी शायद यह भी नहीं जानती कि उसके परिवार की रचना कहीं और किस बड़े रूप में पहुंच गई। यह दर्द हमेशा रहा है। इसके बाद मैंने राजस्थानी और हिंदी में फिल्म ‘चिड़ी बल्ला’ बनाई। फिल्म को कई जगह सराहना मिली। फिर कोविड आ गया। यहां देखिए फोटोज… सवाल: गोवा के तत्कालीन मुख्यमंत्री से बातचीत का किस्सा बताइए? राधेश्याम पीपलवा: गोवा के तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर बहुत सरल व्यक्तित्व के थे। एक बार हम शूटिंग कर रहे थे। हमारी टीम के चार-पांच लोग जा रहे थे और उनके बीच एक व्यक्ति मुस्कुराते हुए निकल रहा था। मैंने पूछा कि यह कौन हैं? टीम के लोगों ने कहा कि मुख्यमंत्री साहब हैं- पर्रिकर साहब। मैंने सोचा कि मुख्यमंत्री होते हुए भी वे इतने सहज तरीके से लोगों के बीच से निकल रहे हैं कि पता ही नहीं चल रहा। हमारे यहां कभी-कभी एक पार्षद को भी लगता है कि वह कितना बड़ा आदमी है। उन्होंने हमें बुलाया और राज्य स्तर पर सम्मान दिया। उनका कहना था कि दूसरे राज्यों से आकर लोग गोवा के लिए काम कर रहे हैं तो उनका सम्मान होना चाहिए। सवाल: ‘चिड़ी बल्ला’ कई फिल्म समारोहों में गई। अब तक रिलीज नहीं होने की वजह? राधेश्याम पीपलवा: मैंने राजस्थान सरकार से फिल्म बनाते समय मदद नहीं मांगी। मैं राजस्थान से हूं और मेरे मन में था कि अपने राज्य और अपने लोगों के लिए, आने वाली पीढ़ी के लिए कुछ किया जाए। मेरा मानना है कि जहां संस्कृति, भाषा, संगीत और विरासत कमजोर पड़ने लगते हैं या खत्म हो जाती है। वहां आने वाली पीढ़ी सांस्कृतिक रूप से लावारिस हो जाती है। मुझे लगता है कि हम उसी कगार पर हैं। ‘चिड़ी बल्ला’ बनाते समय मेरे मन में यही था कि राजस्थान की भाषा, संगीत और संस्कृति को लेकर चल रहे प्रयासों में यह फिल्म भी छोटी-सी आहुति बने। आज हर घर में मोबाइल है और मोबाइल ही एक तरह से सिनेमा भी बन चुका है। ऐसे में हम अच्छा कंटेंट क्यों नहीं देते? आज दर्शक पहले से ज्यादा समझदार और विकसित हुआ है। अगर अच्छा सिनेमा आएगा तो वह उसे देखेगा। अब केवल स्टार वैल्यू या बड़े बजट के आधार पर फिल्म नहीं चलती। दर्शक कहानी और कंटेंट को भी महत्व देता है। मुझे विश्वास है कि जब ‘चिड़ी बल्ला’ रिलीज होगी तो राजस्थान के लोग इसे देखेंगे और पसंद करेंगे। सवाल: राजस्थानी सिनेमा को प्रोत्साहन देने के लिए क्या किया जाना चाहिए? राधेश्याम पीपलवा: सरकार और व्यवस्था के स्तर पर कला और संस्कृति को कितना समझा जाता है। इस पर मैं टिप्पणी नहीं करना चाहूंगा। मैं लेखक-निर्देशक हूं और राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त कर चुका हूं, इसलिए किसी तरह का विवादित बयान देना नहीं चाहता। इतना जरूर है कि कलाकारों और उनकी कोशिशों को पहचान मिलना जरूरी है। जो लोग अच्छा कंटेंट बनाना चाहते हैं। अच्छा साहित्य जानते हैं। अच्छी कहानियां कहना चाहते हैं, उन्हें एक मंच पर जोड़ा जाए। सरकार में अलग-अलग विषयों के लिए समितियां बनती हैं। सिनेमा, साहित्य, संगीत और संस्कृति के लिए भी समिति बनाई जानी चाहिए। जिसमें वास्तव में इन विषयों की समझ रखने वाले लोगों को शामिल किया जाना चाहिए। केवल कार्यक्रम करने या फोटो खिंचवाने से काम नहीं होगा।

