ग्वालियर में पारंपरिक बुनकरों के हाथों तैयार होने वाली महीन मलमल खादी अब खाड़ी देशों तक पहुंच रही है। दुबई, संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत में इस मस्लिन कॉटन से नवजात बच्चों के कपड़े और उन्हें लपेटने वाले रैप तैयार किए जा रहे हैं। हल्का, मुलायम और तापमान के अनुकूल होने के कारण इसकी मांग खासतौर पर नवजातों के लिए बढ़ी है। फिलहाल यह कपड़ा थर्ड पार्टी एक्सपोर्टर के जरिए विदेश भेजा जा रहा है और कारोबार करीब 2 से 3 करोड़ रुपए तक पहुंच गया है। 150 से 400 थ्रेड काउंट तक मलमल मध्य भारत खादी संघ के मुताबिक, अलग-अलग क्वालिटी में मस्लिन कॉटन 150 से 400 थ्रेड काउंट तक तैयार किया जा रहा है। महीन धागों की बुनाई से तैयार यह कपड़ा सामान्य कॉटन की तुलना में हल्का और ज्यादा मुलायम होता है। इसकी कीमत गुणवत्ता और थ्रेड काउंट के अनुसार करीब 400 से 750 रुपए मीटर तक है, जबकि प्रीमियम क्वालिटी की कीमत 2400 रुपए मीटर तक पहुंचती है। नवजातों के रैप में ज्यादा इस्तेमाल खाड़ी देशों में मस्लिन कॉटन का इस्तेमाल खास तौर पर नवजात बच्चों के कपड़ों और रैप में किया जा रहा है। कपड़े की बुनावट से हवा आसानी से आर-पार होती है, इसलिए इसे बच्चों के लिए आरामदायक माना जाता है। इसका इस्तेमाल चादर, रजाई, गद्दे और सामान्य पहनावे में भी किया जाता है। एक मीटर कपड़ा बनाने में लगते हैं करीब 2 घंटे मध्य भारत खादी संघ के सुपरवाइजर ढोंगर सिंह के मुताबिक, मस्लिन कॉटन तैयार करना सामान्य कपड़े से ज्यादा मेहनत वाला काम है। महीन कॉटन धागे की सफाई, धुलाई और कताई के बाद उसे बुनाई के लिए तैयार किया जाता है। सिर्फ ताना तैयार करने में करीब 8 दिन लगते हैं। शुरुआती स्थिति में एक मीटर कपड़ा तैयार करने में करीब 2 घंटे लग सकते हैं। बुनकर की गति बढ़ने के बाद भी 10 मीटर कपड़ा तैयार करने में करीब 8 से 10 घंटे लगते हैं। ग्वालियर के आसपास के गांवों में तैयार हो रहा कपड़ा मध्य भारत खादी संघ से जुड़े पारंपरिक बुनकर ग्वालियर के आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में हाथ से संचालित लूम पर मस्लिन कॉटन तैयार कर रहे हैं। संघ के सचिव रमाकांत शर्मा के अनुसार चचौड़ा, हरसौद, हसलपुर और निवाड़ी के तरीचरकलां सहित आसपास के क्षेत्रों के बुनकर इससे जुड़े हैं। तैयार कपड़ा ग्वालियर स्थित संघ के मुख्यालय पहुंचता है, जहां से इसकी बिक्री और आगे की सप्लाई होती है। 96 साल पुराना संघ, अब विदेशी बाजार पर नजर मध्य भारत खादी संघ करीब 96 वर्षों से खादी और हस्तनिर्मित कपड़ों के क्षेत्र में काम कर रहा है। हाल के वर्षों में मस्लिन खादी को प्रमुख उत्पादों में शामिल किया गया है। संघ के मुताबिक, शुद्ध ऑर्गेनिक कॉटन और हाथ से संचालित लूम पर तैयार होने के कारण इसकी अलग पहचान बनी है। अभी थर्ड पार्टी के जरिए निर्यात फिलहाल संघ सीधे विदेशी बाजार में निर्यात नहीं कर रहा है। थर्ड पार्टी एक्सपोर्टर के जरिए दुबई, यूएई और कुवैत तक कपड़ा भेजा जा रहा है। इससे अभी कारोबार करीब 2 से 3 करोड़ रुपए का है। संघ ने खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग को पत्र लिखकर सीधे निर्यात के लिए सहयोग और अनुमति मांगी है। अनुमति मिलने पर विदेशी आयातकों तक सीधे पहुंच बनाने की योजना है। इससे बिचौलिया कमीशन कम होने के साथ ग्वालियर और आसपास के क्षेत्रों में बुनकरों के लिए काम और रोजगार बढ़ने की उम्मीद है।

