हिमाचल में 8 माह में 237 दवाइयों के सैंपल फेल:इनमें हार्ट-बुखार की मेडिसिन; फिर भी प्रोडक्शन जारी, लाइसेंस सस्पेंड का दावा सवालों के घेरे में

हिमाचल में 8 माह में 237 दवाइयों के सैंपल फेल:इनमें हार्ट-बुखार की मेडिसिन; फिर भी प्रोडक्शन जारी, लाइसेंस सस्पेंड का दावा सवालों के घेरे में

हिमाचल प्रदेश का बद्दी देश के बड़े फार्मा हब में शामिल है। यहां से देश के अलग-अलग हिस्सों में दवाइयों की सप्लाई होती है। लेकिन जनवरी से अगस्त (8 महीने) के बीच 237 मेडिसिन के सैंपल फेल हुए।
CDSCO की ड्रग अलर्ट रिपोर्टों में बद्दी की कई कंपनियों के दवा सैंपल तय गुणवत्ता मानकों पर खरे नहीं उतरे। इनमें हार्ट, बुखार, एंटीबायोटिक, डायबिटीज, कैल्शियम, दर्द निवारक और बीपी की दवाएं शामिल हैं। ‘दैनिक भास्कर एप’ की पड़ताल में सामने आया कि कुछ कंपनियों की दवाओं के सैंपल एक से ज्यादा बार NSQ (नॉट ऑफ स्टैंडर्ड क्वालिटी) पाए गए। मार्टिन एंड ब्राउन के रैबेप्राजोल सोडियम इंजेक्शन, जिसका इस्तेमाल पेट में एसिड की समस्या के इलाज में किया जाता है, के अलग-अलग बैच जांच में फेल मिले। वहीं, हीलर्स लैब के पैरासिटामोल के भी कई बैच सबस्टैंडर्ड पाए गए। स्टेट ड्रग कंट्रोलर डिपार्टमेंट का दावा है कि किसी कंपनी की दवा सबस्टैंडर्ड पाए जाने पर संबंधित बैच को वापस मंगाया जाता है और कंपनी का लाइसेंस परमानेंटली सस्पेंड किया जा सकता है। लेकिन पड़ताल में सवाल यह सामने आया है कि जब कुछ दवाओं के अलग-अलग बैच बार-बार जांच में फेल पाए गए, तो उनका उत्पादन कैसे जारी रहा? साथ ही, अब तक किसी कंपनी का लाइसेंस सस्पेंड क्यों नहीं हुआ? एक ही इंजेक्शन के सैंपल 7 बार फेल हिमाचल में सबसे ज्यादा लगभग 650 फॉर्मा यूनिट अकेले बद्दी-बरोटीवाला-नालागढ़ (BBN) क्षेत्र में हैं। दवा उद्योग का हिमाचल के निर्यात में भी लगभग 15 हजार करोड़ रुपए का योगदान रहता है। ‘दैनिक भास्कर एप’ की पड़ताल में सामने आया कि मार्टिन एंड ब्राउन कंपनी के 8 महीने में करीब 13 सैंपल फेल हुए। जनवरी के ड्रग अलर्ट में रैबेप्राजोल सोडियम इंजेक्शन फेल पाया गया। इसके बाद इसी इंजेक्शन के अलग-अलग बैच फरवरी, मार्च, अप्रैल, मई, जुलाई और अगस्त में भी फेल पाया गया। हीलर्स लैब कंपनी के भी इस साल अब तक करीब 15 सैंपल फेल हुए हैं। इनमें ज्यादातर पैरासिटामोल की दवाएं शामिल हैं। जनवरी में पैरासिटामोल टैबलेट्स IP-500 का सैंपल फेल हुआ। इसके बाद मार्च, मई, जून, जुलाई और अगस्त में भी कंपनी की पैरासिटामोल दवाएं सबस्टैंडर्ड पाई गईं। इन 8 महीनों में हीलर्स लैब की पैरासिटामोल के करीब 13 अलग-अलग बैच के सैंपल फेल पाए गए। इसी तरह, अन्य कंपनियों की दवाओं के सैंपल भी लगातार जांच में ‘नॉट ऑफ स्टैंडर्ड क्वालिटी’ (NSQ) पाए गए। हालांकि दवाओं के सैंपल फेल होने के पीछे कोई एक ही कारण नहीं है। CDSCO की रिपोर्टों में अलग-अलग दवाओं के सैंपल pH, अस्से, डिसॉल्यूशन, क्लैरिटी, पार्टिकुलेट मैटर और अन्य गुणवत्ता मानकों में फेल पाए गए हैं। हार्ट, बुखार और दर्द निवारक दवाएं सबस्टेंडर्ड जिन दवाओं के सैंपल जांच में फेल हो रहे हैं, उनमें हार्ट, बुखार, एंटीबायोटिक, डायबिटीज, कैल्शियम, दर्द निवारक, बीपी और बैक्टीरियल संक्रमण जैसी बीमारियों की दवाएं शामिल हैं। यानी अलग-अलग बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं के सैंपल गुणवत्ता जांच में मानकों पर खरे नहीं उतर रहे हैं। इसके बाद भी इन कंपनियों ये दवाइयां बना जा रही हैं। सबस्टैंडर्ड दवाओं के इस्तेमाल से शरीर पर क्या असर पड़ सकता है, इसे लेकर IGMC शिमला के पूर्व MS डॉ. रमेश कुमार से बात की गई। उन्होंने बताया कि सबस्टैंडर्ड दवा के साइड इफेक्ट हो सकते हैं। हालांकि, किस दवा से किस तरह का साइड इफेक्ट होगा, यह उस दवा में मौजूद सॉल्ट पर निर्भर करता है। डॉ. रमेश कुमार के मुताबिक, अलग-अलग दवाओं में अलग सॉल्ट होते हैं। इसलिए किसी सबस्टैंडर्ड दवा के इस्तेमाल से होने वाला असर भी उसकी दवा और उसमें मौजूद सॉल्ट के आधार पर अलग-अलग हो सकता है। कंपनी का लाइसेंस सस्पेंड किया जा सकता स्टेट ड्रग कंट्रोलर मनीष कपूर ने बताया कि दवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए नियमित रूप से उनके सैंपल लिए जाते हैं। जांच में जो सैंपल फेल पाए जाते हैं, उनकी रिपोर्ट सार्वजनिक की जाती है। इससे लोगों को पता चल सके कि किस बैच की कौन सी दवा गुणवत्ता जांच में फेल हुई है। उन्होंने बताया कि किसी दवा का सैंपल फेल होने के बाद संबंधित बैच का पूरा स्टॉक वापस मंगवाया जाता है, ताकि लोग सबस्टैंडर्ड दवा का इस्तेमाल न करें। निम्न गुणवत्ता की दवाएं बनाने वाली कंपनियों के खिलाफ कानून के प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जाती है। मनीष कपूर के मुताबिक, अगर किसी कंपनी के दवाओं के सैंपल बार-बार फेल होते हैं तो उसका लाइसेंस परमानेंटली सस्पेंड किया जाता है। उन्होंने यह भी बताया कि हिमाचल के दवा नियंत्रक विभाग के बेहतर काम को देखते हुए केंद्र सरकार की ओर से विभाग को सम्मानित किया गया है। NSQ मिलने का मतलब क्या है? NSQ का मतलब है कि जांच के लिए लिए गए सैंपल ने निर्धारित फार्माकोपियल या निर्माता के तय गुणवत्ता मानकों में से किसी एक या अधिक टेस्ट को पूरा नहीं किया। इसका मतलब यह नहीं है कि कंपनी की हर दवा खराब है। मामला संबंधित दवा के उस बैच और उसमें मिली कमी से जुड़ा होता है। CDSCO अपनी NSQ व्यवस्था में अलग-अलग साल, महीने और रिपोर्टिंग स्रोत के आधार पर ऐसे मामलों का रिकॉर्ड रखता है। CDSCO के बारे में जानिए CDSCO (केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन) भारत सरकार का केंद्रीय संगठन है। यह दवाओं की जांच और गुणवत्ता नियंत्रण करता है। जांच में मानकों पर खरा नहीं उतरने वाली दवाएं NSQ (नॉट ऑफ स्टैंडर्ड क्वालिटी) घोषित करता है। CDSCO हर महीने दवाओं के सैंपलों की जांच करता है। ऐसे सैंपलों की जानकारी ड्रग अलर्ट के जरिए सार्वजनिक की जाती है। ************** ये खबर भी पढ़ें: बद्दी में बनी 82 दवाओं के सैंपल फेल: इनमें हृदय रोग, दर्द-बुखार की मेडिसिन भी हिमाचल प्रदेश में बनी 82 दवाओं और देशभर की 240 मेडिसिन के सैंपल फेल हुए हैं। केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) की जांच में ये दवाएं गुणवत्ता मानकों पर खरी नहीं उतरीं। देशभर में फेल हुए कुल सैंपलों में करीब एक तिहाई हिस्सेदारी हिमाचल में बनी दवाओं की है। (पढ़ें पूरी खबर)

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