सिरसा जिले के बुजुर्ग लालचंद गोदारा ने 85 वर्ष की उम्र में एमए की मास्टर डिग्री पूरी की है। इससे पहले वे सेना और रोडवेज में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। खास बात है कि इग्नू से ही एमए में 1200 में से 965 अंक प्राप्त किए हैं। यह वाक्या हर किसी के लिए चौंकाने वाला है। इसके पीछे कारण है कि पोते-पोतियों द्वारा पढाई को लेकर ताना मारना और बेटों से कम पढ़े-लिखे होना। इन्हीं तानों को बुजुर्ग लालचंद ने अपना हौंसला बनाया और पहले 2012 में मैट्रिक की और बाद में 2023 में इग्नू से बीए और 2026 में एमए पास की। अब वे अपने बेटों से ज्यादा पढ़े-लिखे बन गए। लालचंद गोदारा ने दैनिक भास्कर एप की टीम से बातचीत में बताया, इससे नौजवान पढाई को लेकर मोटिवेट हो सकेंगे कि पढाई की कोई उम्र नहीं होती। मेरी पोती-पोतियां अक्सर मुझे पढाई को लेकर ताना मारती थी कि दादा जी, आप आगे क्यों नहीं पढ़े और अपने बेटों से ही कम पढ़े-लिखे हो। आप आगे पढ़िए और बेटों से भी ज्यादा। दोबारा पढाई शुरू कर करते हो। उनके कहने पर यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन के लिए फॉर्म भरवा दिया। अब आगे पीएचडी या लॉ करने का सपना है। इसके लिए तैयारी शुरू कर दी है। नुहियांवाली में छोटे बेटे के पास रहते हैं लालचंद गोदारा मूलरूप से नुहियांवाली गांव में रहते हैं। उनके तीन बेटे, जिनमें साहिब राम गोदारा (पब्लिक रिलेशन विभाग चंडीगढ में कार्यरत), अमर सिंह ( नहरी विभाग में सिग्नेलर के पद पर कार्यरत) और दलबीर, जम्मू में एनजीओ में काम करता है। वे सबसे छोटे बेटे दलबीर के पास गांव में रहते हैं, जिनकी दो बेटियां (नव्या 12वीं) और सान्या (एमबीबीएस) की पढाई कर रही है। अमर सिंह के दो बेटे, जिनमें लक्ष्य (बीटेक) एवं दूसरा 12वीं में पढ़ता है। साहिब राम का इकलौता बेटा इंजिनियरिंग की पढाई करके कनाडा में निजी कंपनी में कार्यरत है। सीने पर गोली खाने से अनपढ़ता का ताना ज्यादा दर्दनाक: लालचंद लालचंद गोदारा ने बताया, जब तक यह बात समझ आई तो उनकी उम्र 76 साल की हो चुकी थी। बेशक उन्होंने सैनिक रहते हुए देश की सुरक्षा के लिए सीने पर गोली खाने की हिम्मत रखी, लेकिन अनपढ़ता का ताना गोली खाने से भी ज्यादा दर्द देने जैसा था। फिर ठान लिया कि पढ़ लिख कर शिक्षित समाज का हिस्सा बनूंगा। मजबूत जज्बे के भरोसे 81 साल की उम्र में ग्रेजुएशन की डिग्री ली। जीवन में कोई भी मंजिल पाने के लिए शिक्षा रोशनी का काम करती है। सेना में 1962 से 71 की लड़ाइयां लड़ी लालचंद गोदारा ने बताया, वर्ष 1962 में सेना में भर्ती होने के बाद 1962, 1965 और 1971 की लड़ाइयों में सैनिक के रूप में हिस्सा लिया। सेना में सेवाएं देने के बाद वे वर्ष 1972 में रोडवेज विभाग में बतौर ड्राइवर भर्ती हुए और 2002 तक यार्ड मास्टर के रूप में सेवाएं देने के बाद रिटायर्ड हुए। सेवानिवृत्त होने के बाद आमतौर पर 200 से ज्यादा पदक नाम किए, परेड में लेते भाग
लालचंद गोदारा ने बताया, उनके नाम राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में करीब 200 पदक दर्ज हैं। इनमें करीब 150 स्वर्ण पदक हैं, जबकि 30 सिल्वर और 20 ब्रॉन्ज मेडल भी अपने नाम किए। नियमित अभ्यास, अनुशासन और लक्ष्य के प्रति अडिग हैं और इनका परिणाम हरियाणा मास्टर एथलेटिक्स चैंपियनशिप में देखने को मिला। 85 वर्ष की उम्र में भी दौड़, गोला फैंक और हैमर थ्रो जैसी स्पर्धाओं में पदक हासिल कर चुके हैं। नौकरी पूरी करने के बाद हैमर और डिसकस थ्रो खेलना शुरू किया तो अब तक 200 से ज्यादा पदक जीत चुके हैं। रोजाना 11 किलोमीटर की दौड़ लगाते हैं। 15 अगस्त व 26 जनवरी पर होने वाले जिला स्तरीय कार्यक्रमों में परेड में भी शामिल होते हैं।

