समानता का संदेश आज भी प्रासंगिक
उदाराम प्रजापत थलवाड़, अध्यक्ष, बाबा रामदेव मरुधर सेवा संघ, हुब्बल्ली, ने कहा कि बाबा रामदेव का सबसे बड़ा संदेश मानव समानता का है। उन्होंने ऊंच-नीच और भेदभाव से ऊपर उठकर हर इंसान को समान दृष्टि से देखने की प्रेरणा दी। बदलते समय में भी सामाजिक भेदभाव की स्थितियां दिखाई देती हैं। ऐसे में बाबा रामदेव के विचार और अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं। उनकी शिक्षाओं को धार्मिक आयोजनों तक सीमित रखने के बजाय सामाजिक जीवन में अपनाने की जरूरत है।
रामदेवरा आस्था के साथ सामाजिक समरसता का केंद्र
जामताराम देवासी सराणा, व्यवसायी, हुब्बल्ली, ने कहा कि रामदेवरा केवल राजस्थान ही नहीं, बल्कि देशभर के श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। यहां अलग-अलग क्षेत्रों और समुदायों के लोग श्रद्धा के साथ पहुंचते हैं। बाबा रामदेव की व्यापक लोकस्वीकृति की विशेषता यही है कि विभिन्न समुदायों में उनके प्रति आस्था दिखाई देती है। यह धार्मिक आस्था के साथ भाईचारे और सामाजिक सद्भाव की भावना को मजबूत करती है।
सेवा को बनाया जाए आस्था का हिस्सा
अभिषेक मेहता जोधपुर, व्यवसायी, हुब्बल्ली, ने कहा कि बाबा रामदेव को सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी, जब उनकी लोककल्याण की भावना को जीवन में उतारा जाए। जरूरतमंद की सहायता करना, भूखे को भोजन कराना और असहाय की मदद करना भी बाबा रामदेव की भक्ति का एक रूप है। धार्मिक आयोजनों के साथ सेवा कार्यों को जोड़कर समाज के जरूरतमंद वर्ग तक सहायता पहुंचाई जा सकती है।
जाति-भेद से ऊपर उठने की प्रेरणा
धर्मेन्द्र माली कोसेलाव, व्यवसायी, हुब्बल्ली, ने कहा कि बाबा रामदेव की लोकआस्था किसी एक वर्ग या समुदाय तक सीमित नहीं रही। उनकी मान्यता के पीछे सामाजिक समानता और भाईचारे की भावना दिखाई देती है। आज समाज को जाति, भाषा और समुदाय के आधार पर होने वाले भेदभाव से ऊपर उठने की जरूरत है। बाबा रामदेव की स्मृति हर व्यक्ति को सम्मान और समान अवसर देने की प्रेरणा देती है।
आस्था के साथ भाईचारे की भावना मजबूत हो
रमेश राजपुरोहित आमलारी, व्यवसायी, हुब्बल्ली, ने कहा कि बाबा रामदेव की सबसे बड़ी विशेषता उनकी व्यापक लोकस्वीकृति है। उनकी आस्था लोगों को जोड़ने का माध्यम बनती है। रामदेव जयंती जैसे अवसरों पर धार्मिक कार्यक्रमों के साथ सामाजिक सद्भाव और भाईचारे के संदेश को भी प्रमुखता दी जानी चाहिए। समाज में जब लोग एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ खड़े होते हैं, तभी किसी संत या लोकदेवता की शिक्षाओं का वास्तविक प्रभाव दिखाई देता है।

