रिम्स : एजेंसियों के 44 करोड़ के बिल बकाया, सप्लाई घटाई; इलाज पर असर

रिम्स : एजेंसियों के 44 करोड़ के बिल बकाया, सप्लाई घटाई; इलाज पर असर

राज्य के सबसे बड़े चिकित्सा संस्थान रिम्स में एक तरफ करोड़ों रुपए का बजट मिल रहा है, वहीं दूसरी तरफ आपूर्ति कर चुकी एजेंसियों के करोड़ों रुपए के बिल भुगतान की प्रक्रिया में अटके हैं। उपलब्ध दस्तावेजों व रिम्स के आधिकारिक पत्राचार के अनुसार विभिन्न उपकरणों और सेवाओं से संबंधित 44 करोड़ रुपए से अधिक का भुगतान लंबित है। इसमें मशीनों-उपकरणों के साथ दवा, इंप्लांट और अन्य जरूरी मेडिकल सामग्री की नियमित सप्लाई करने वाली एजेंसियों का बकाया भी शामिल है। भुगतान में देरी से एजेंसियां नई सप्लाई रोकने या कम करने की स्थिति में पहुंच सकती हैं। रिम्स में हड्डी, न्यूरोसर्जरी, ऑर्थोपेडिक्स और कार्डियक समेत कई विभागों में इंप्लांट के बिना ऑपरेशन संभव नहीं होता। ओटी की डिस्पोजेबल सामग्री, सर्जिकल सामान और जरूरी दवाओं की कमी पड़ सकती है। इससे ऑपरेशन और इलाज प्रभावित हो सकते हैं।
कुछ बिल लंबित, बाकी प्रक्रिया में हैं पिछले दो वित्तीय वर्षों में समय पर राशि खर्च नहीं होने के कारण रिम्स को करीब 95 करोड़ रुपए सरेंडर करने पड़े। रिम्स को हाल में स्वास्थ्य विभाग से करीब 200 करोड़ रुपए का आवंटन मिला है। इसके बावजूद पुराने भुगतान लंबित हैं। इससे सवाल उठता है कि जब बजट उपलब्ध है और एजेंसियां उपकरण, दवा, इंप्लांट व अन्य सामग्री की आपूर्ति कर चुकी हैं, तो भुगतान समय पर क्यों नहीं हो रहा। बिल सत्यापन, स्वीकृति या फाइल निपटारे में कहां देरी है, इसकी समीक्षा जरूरी है। भुगतान की यह देरी सिर्फ वित्तीय प्रक्रिया का मामला नहीं, बल्कि मरीजों के इलाज के लिए जरूरी सप्लाई चेन से सीधे जुड़ी है।- डॉ. शिशिर कुमार, जनसंपर्क अधिकारी, रिम्स। रेडियोलॉजी से लेकर सर्जरी विभाग व ट्रॉमा सेंटर तक के बिल बकाया नए टेंडरों पर भी पड़ सकता है असर: लंबे समय तक भुगतान अटकने से नई खरीद प्रक्रिया भी प्रभावित होने की बात सामने आ रही है। आपूर्तिकर्ता एजेंसियों से जुड़े लोगों के अनुसार, भुगतान नहीं मिलने पर उनकी कार्यशील पूंजी फंस जाती है। ऐसे में रिम्स के नए टेंडरों में हिस्सा लेना आर्थिक जोखिम बन जाता है। इसके कारण अनुभवी एजेंसियां दूरी बनाती हैं। रेडियोलॉजी विभाग में 3टी एमआरआई मशीन का करीब 23.50 करोड़ रुपए, डिजिटल मैमोग्राफी का 3.74 करोड़ रुपए से अधिक और पैथोलॉजी विभाग में ऑटोमेटेड स्लाइड स्टेनर का करीब 3.62 करोड़ रुपए का भुगतान लंबित है। ये उपकरण मरीजों की जांच से सीधे जुड़े हैं। सर्जरी विभाग में एडल्ट सिस्टो रिसेक्टो व कोलीडोस्कोप से संबंधित करीब 2.16 करोड़ रुपए और एंडोस्कोपिक यूएसजी का करीब 2.16 करोड़ रुपए बकाया है। फ्लेक्सिबल इंटुबेशन वीडियो एंडोस्कोप का 37.27 लाख, मेडिटेक की ओटी टेबल के 53.16 लाख और 9.66 लाख रुपए के बिल भी भुगतान प्रक्रिया में हैं। ट्रॉमा सेंटर में एम्बू फ्लेक्सिबल ब्रोंकोस्कोप का 9.95 लाख और मल्टीपैरा मॉनिटर का 9.44 लाख, न्यूरोसर्जरी में डिफाइब्रिलेटर का 8.64 लाख और सी-आर्म मशीन का 97.86 लाख रुपए का भुगतान लंबित है। डेंटल मैक्सिलोफेशियल सर्जरी की इलेक्ट्रो-हाइड्रोलिक ओटी टेबल व सीलिंग ओटी लाइट का 17.84 लाख, पीजी स्किल लैब का 4.64 करोड़ रु. का भुगतान भी बकाया सूची में है। राज्य के सबसे बड़े चिकित्सा संस्थान रिम्स में एक तरफ करोड़ों रुपए का बजट मिल रहा है, वहीं दूसरी तरफ आपूर्ति कर चुकी एजेंसियों के करोड़ों रुपए के बिल भुगतान की प्रक्रिया में अटके हैं। उपलब्ध दस्तावेजों व रिम्स के आधिकारिक पत्राचार के अनुसार विभिन्न उपकरणों और सेवाओं से संबंधित 44 करोड़ रुपए से अधिक का भुगतान लंबित है। इसमें मशीनों-उपकरणों के साथ दवा, इंप्लांट और अन्य जरूरी मेडिकल सामग्री की नियमित सप्लाई करने वाली एजेंसियों का बकाया भी शामिल है। भुगतान में देरी से एजेंसियां नई सप्लाई रोकने या कम करने की स्थिति में पहुंच सकती हैं। रिम्स में हड्डी, न्यूरोसर्जरी, ऑर्थोपेडिक्स और कार्डियक समेत कई विभागों में इंप्लांट के बिना ऑपरेशन संभव नहीं होता। ओटी की डिस्पोजेबल सामग्री, सर्जिकल सामान और जरूरी दवाओं की कमी पड़ सकती है। इससे ऑपरेशन और इलाज प्रभावित हो सकते हैं।
कुछ बिल लंबित, बाकी प्रक्रिया में हैं पिछले दो वित्तीय वर्षों में समय पर राशि खर्च नहीं होने के कारण रिम्स को करीब 95 करोड़ रुपए सरेंडर करने पड़े। रिम्स को हाल में स्वास्थ्य विभाग से करीब 200 करोड़ रुपए का आवंटन मिला है। इसके बावजूद पुराने भुगतान लंबित हैं। इससे सवाल उठता है कि जब बजट उपलब्ध है और एजेंसियां उपकरण, दवा, इंप्लांट व अन्य सामग्री की आपूर्ति कर चुकी हैं, तो भुगतान समय पर क्यों नहीं हो रहा। बिल सत्यापन, स्वीकृति या फाइल निपटारे में कहां देरी है, इसकी समीक्षा जरूरी है। भुगतान की यह देरी सिर्फ वित्तीय प्रक्रिया का मामला नहीं, बल्कि मरीजों के इलाज के लिए जरूरी सप्लाई चेन से सीधे जुड़ी है।- डॉ. शिशिर कुमार, जनसंपर्क अधिकारी, रिम्स। रेडियोलॉजी से लेकर सर्जरी विभाग व ट्रॉमा सेंटर तक के बिल बकाया नए टेंडरों पर भी पड़ सकता है असर: लंबे समय तक भुगतान अटकने से नई खरीद प्रक्रिया भी प्रभावित होने की बात सामने आ रही है। आपूर्तिकर्ता एजेंसियों से जुड़े लोगों के अनुसार, भुगतान नहीं मिलने पर उनकी कार्यशील पूंजी फंस जाती है। ऐसे में रिम्स के नए टेंडरों में हिस्सा लेना आर्थिक जोखिम बन जाता है। इसके कारण अनुभवी एजेंसियां दूरी बनाती हैं। रेडियोलॉजी विभाग में 3टी एमआरआई मशीन का करीब 23.50 करोड़ रुपए, डिजिटल मैमोग्राफी का 3.74 करोड़ रुपए से अधिक और पैथोलॉजी विभाग में ऑटोमेटेड स्लाइड स्टेनर का करीब 3.62 करोड़ रुपए का भुगतान लंबित है। ये उपकरण मरीजों की जांच से सीधे जुड़े हैं। सर्जरी विभाग में एडल्ट सिस्टो रिसेक्टो व कोलीडोस्कोप से संबंधित करीब 2.16 करोड़ रुपए और एंडोस्कोपिक यूएसजी का करीब 2.16 करोड़ रुपए बकाया है। फ्लेक्सिबल इंटुबेशन वीडियो एंडोस्कोप का 37.27 लाख, मेडिटेक की ओटी टेबल के 53.16 लाख और 9.66 लाख रुपए के बिल भी भुगतान प्रक्रिया में हैं। ट्रॉमा सेंटर में एम्बू फ्लेक्सिबल ब्रोंकोस्कोप का 9.95 लाख और मल्टीपैरा मॉनिटर का 9.44 लाख, न्यूरोसर्जरी में डिफाइब्रिलेटर का 8.64 लाख और सी-आर्म मशीन का 97.86 लाख रुपए का भुगतान लंबित है। डेंटल मैक्सिलोफेशियल सर्जरी की इलेक्ट्रो-हाइड्रोलिक ओटी टेबल व सीलिंग ओटी लाइट का 17.84 लाख, पीजी स्किल लैब का 4.64 करोड़ रु. का भुगतान भी बकाया सूची में है।  

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *