UP Elections 2027 Political Strategy Delimitation Impact: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव करीब छह महीने दूर हैं लेकिन राजनीतिक दलों के लिए चुनावी तैयारी का समय शुरू हो चुका है। इस बार तैयारी सिर्फ रैलियों और बड़े चेहरों के दौरों तक सीमित नहीं है। पार्टियां बूथों की समीक्षा कर रही हैं, छूटे हुए सामाजिक समूहों तक पकड़ बनाने में जुटी हैं। साथ ही युवाओं को जोड़ने के अभियान चलाकर अपने गठबंधन में सीटों की स्थिति मजबूत करने में जुटी हैं।
इसी बीच राष्ट्रीय स्तर पर लोकसभा परिसीमन का मुद्दा भी यूपी की चुनावी राजनीति से जुड़ गया है। परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों पर केंद्र की अगली कार्रवाई का असर भविष्य की लोकसभा सीटों और राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर पड़ेगा। फिलहाल भाजपा नेतृत्व ने परिसीमन पर अंतिम फैसला नहीं किया है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक एक मत यह है कि यूपी विधानसभा चुनाव तक इस मुद्दे पर आगे बढ़ने से बचना चाहिए। इसकी बड़ी वजह यह है कि पार्टी आगामी विस चुनाव को तत्काल राजनीतिक प्राथमिकता मान रही है और अगले लोकसभा चुनाव के लिए क्षेत्रीय दलों से अपने रिश्ते खुले रखना चाहती है। यूपी में इसका असर सिर्फ भाजपा तक सीमित नहीं है। आगामी विस चुनाव की तैयारी में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों खेमों के सामने अब सीट, समाज और संगठन तीनों को एकसाथ साधने की चुनौती है।

परिसीमन: मुद्दा दिल्ली का, असर लखनऊ तक
लोकसभा परिसीमन का तत्काल असर आगामी विधानसभा चुनाव पर सीधे नहीं पड़ेगा लेकिन इसकी राजनीति यूपी की चुनावी रणनीति से जुड़ गई है। मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था के तहत 2026 के बाद पहली जनगणना के आधार पर परिसीमन का रास्ता खुलता है। महिला आरक्षण कानून का क्रियान्वयन भी परिसीमन के बाद होना है। केंद्र सरकार के सामने इससे जुड़े संवैधानिक प्रावधानों को आगे बढ़ाने का सवाल है।
भाजपा के भीतर एक मत यह है कि यूपी चुनाव से पहले इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने से राजनीतिक स्तर पर अनावश्यक टकराव पैदा हो सकता है। खास तौर पर दक्षिणी राज्यों और क्षेत्रीय दलों की चिंताओं को देखते हुए पार्टी अगले लोकसभा चुनाव की संभावित गठबंधन राजनीति को ध्यान में रख रही है। यह भाजपा का घोषित अंतिम निर्णय नहीं है। पार्टी सूत्रों के अनुसार इस पर उच्च पदस्थ पदाधिकारियों में विचार-विमर्श चल रहा है। यही वजह है कि परिसीमन का सवाल फिलहाल यूपी के आगामी विधानसभा चुनाव की राजनीति और अगले लोकसभा चुनाव की राष्ट्रीय राजनीति दोनों को जोड़ने वाला मुद्दा बन गया है।
राष्ट्रीय स्तर पर परिसीमन की बहस इसी चुनावी तैयारी के ऊपर एक और राजनीतिक परत जोड़ रही है। भाजपा के लिए यूपी चुनाव तत्काल प्राथमिकता है, जबकि सहयोगियों और क्षेत्रीय दलों के साथ रिश्तों का असर अगले लोकसभा चुनाव तक जाने वाला है। विपक्षी दलों के लिए आगामी विधानसभा चुनाव में सामाजिक समीकरण और संगठन का विस्तार सत्ता पक्ष के मुकाबले अपनी स्थिति मजबूत करने का आधार बनेगा। इसलिए यूपी में चुनाव की तारीख आने से पहले ही असली मुकाबला बूथ, समाज और सीट तीनों स्तरों पर शुरू हो चुका है।

भाजपा: 18,900 बूथों से वापसी की तलाश
यूपी भाजपा की चुनावी तैयारी का पहला केंद्र बूथ है। पार्टी ने पिछले लोकसभा चुनाव के आंकड़ों को विधानसभा स्तर तक खंगालना शुरू किया है। करीब 18,900 बूथ ऐसे चिह्नित किए गए हैं जहां पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन उसके पिछले आधार की तुलना में कमजोर रहा। इन बूथों पर पार्टी संगठन और सामाजिक समीकरण की अलग-अलग समीक्षा कर रही है।
राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष और यूपी प्रभारी विनोद तावड़े के दौरों में भी स्थानीय नेताओं, सांसदों, विधायकों और कार्यकर्ताओं से फीडबैक लेने का सिलसिला चल रहा है। फोकस यह पता लगाने पर है कि किन इलाकों में संगठन कमजोर हुआ, किन सामाजिक समूहों में दूरी बनी और किन सीटों पर स्थानीय स्तर के मतभेद चुनावी परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं।
दूसरा मोर्चा सरकार की योजनाओं और संगठन के बीच तालमेल का है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रदेशभर में सक्रियता भी इसी चुनावी तैयारी के समानांतर चल रही है।
तीसरा और महत्वपूर्ण मोर्चा एनडीए का कुनबा है। भाजपा के साथ रालोद, अपना दल (एस), निषाद पार्टी और सुभासपा सरकार में शामिल हैं। इन सभी दलों का अपना सामाजिक और क्षेत्रीय आधार है। आगामी चुनाव में भाजपा के सामने सहयोगियों को साथ रखने के साथ सीटों का ऐसा तालमेल बनाने की चुनौती है, जिससे सहयोगी भी संतुष्ट रहें और भाजपा का अपना चुनावी विस्तार भी बना रहे।

सपा: पीडीए से आगे, अब हर बूथ तक पहुंच
समाजवादी पार्टी की चुनावी तैयारी का केंद्र पीडीए है, लेकिन पार्टी इसके सामाजिक दायरे को बढ़ाने की कोशिश कर रही है। पार्टी की रणनीति यादव-मुस्लिम आधार के साथ गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित समूहों में पैठ बढ़ाने की है। इसके लिए संगठन को बूथ स्तर पर सक्रिय करने के साथ अलग-अलग सामाजिक समूहों में संपर्क अभियान चलाए जा रहे हैं।
सपा ने युवाओं को जोड़ने के लिए ‘यूथ जोड़ो, बूथ मजबूत करो’ अभियान भी शुरू किया है। कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के युवाओं तक पहुंच बनाने के साथ संगठन को चुनावी बूथ से जोड़ने की कोशिश है।
पार्टी के लिए दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा रोजगार और भर्ती परीक्षाएं हैं। युवा वर्ग से जुड़े इन मुद्दों को संगठनात्मक अभियान से जोड़कर सपा चुनावी नैरेटिव तैयार कर रही है।
निषाद समुदाय को लेकर भी सपा की गतिविधियां बढ़ी हैं। हाल में निषाद समुदाय से जुड़े एक मामले के बाद सपा नेताओं ने आंदोलन में भाग लिया। समुदाय के बीच राजनीतिक पहुंच बढ़ाने के लिए पार्टी की तरफ से संगठनात्मक नियुक्तियां और कार्यक्रम भी किए गए हैं।

कांग्रेस: संगठन खड़ा कर सीट की जमीन तैयार
कांग्रेस के लिए यह सिर्फ विधानसभा चुनाव नहीं है बल्कि पार्टी यूपी में अपने संगठन को दोबारा मजबूत करने की प्रक्रिया को अगले लोकसभा चुनाव की तैयारी से भी जोड़ रही है।
पार्टी की रणनीति में तीन प्रमुख हिस्से हैं युवा संपर्क, संगठन का पुनर्गठन और सपा के साथ गठबंधन की जमीन तैयार करना।
युवा मतदाताओं तक पहुंच के लिए जेन-जी आउटरीच की तैयारी है। दूसरी ओर पार्टी अपने पुराने कार्यकर्ताओं और स्थानीय संगठन को सक्रिय करने पर जोर दे रही है।
सपा के साथ सीटों के तालमेल का सवाल भी कांग्रेस की तैयारी का अहम हिस्सा है। दोनों दल पिछले लोकसभा चुनाव में साथ रह चुके हैं, हालांकि आगामी विस चुनाव के लिए सीटों के बंटवारे का अंतिम स्वरूप अभी तय नहीं है।
कांग्रेस की हालिया संगठनात्मक नियुक्तियों में दलित और अति पिछड़ा वर्ग तक पहुंच बढ़ाने का संकेत भी दिखाई देता है।

बसपा: अकेले चुनाव, अपने सामाजिक आधार की परीक्षा
बसपा ने आगामी विधानसभा चुनाव में फिलहाल अकेले चुनाव लड़ने की रणनीति बना रखी है। पार्टी की तैयारी का मुख्य आधार संगठन को बूथ तक सक्रिय करना और अपने परंपरागत दलित आधार को बनाए रखना है।
बसपा के सामने चुनौती यह है कि पिछले चुनावों में कमजोर पड़े संगठनात्मक ढांचे को फिर सक्रिय किया जाए और दलित आधार के साथ दूसरे सामाजिक समूहों तक पहुंच बढ़ाई जाए।
दूसरी ओर आकाश आनंद को लेकर बदलती राजनीतिक गतिविधियों के कारण बसपा से जुड़े सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों पर भी नजर बनी हुई है। एनडीए के सहयोगियों और विपक्षी दलों के नेताओं की ओर से आकाश आनंद को लेकर सार्वजनिक बयान सामने आए हैं। इससे बसपा के वोट आधार को लेकर दूसरे दलों की दिलचस्पी भी दिखाई देती है।

एनडीए के चार सहयोगी, चार अलग सियासी गणित
एनडीए गठबंधन के साथी रालोद, निषाद पार्टी, सुभासपा और अपना दल (एस) की राजनीतिक ताकत अलग-अलग सामाजिक और क्षेत्रीय समूहों में है। इसलिए आगामी विस चुनाव के सीट बंटवारे में भाजपा के लिए हर सहयोगी के दावे का अलग राजनीतिक संदर्भ होगा। वर्तमान राजनीतिक माहौल में एनडीए सहयोगियों की सीट हिस्सेदारी और अलग-अलग सामाजिक आधार को लेकर सक्रियता सामने आई है।

रालोद: पश्चिम का आधार बचाने के साथ विस्तार
जयंत चौधरी की राष्ट्रीय लोकदल का मुख्य आधार पश्चिमी उत्तर प्रदेश है। पार्टी अब संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने के साथ पश्चिम के बाहर भी विस्तार की कोशिश कर रही है।
रालोद की राजनीति में किसान, जाट और पश्चिमी यूपी के सामाजिक समीकरण महत्वपूर्ण हैं। पार्टी की ओर से दलित और अति पिछड़े वर्गों तक पहुंच बढ़ाने के कार्यक्रम भी किए जा रहे हैं।

निषाद पार्टी: सीटों के साथ समाज का सवाल
निषाद पार्टी अध्यक्ष संजय निषाद आगामी विस चुनाव में पिछली बार से अधिक सीटों की मांग उठा चुके हैं। उन्होंने खास तौर पर उन सीटों पर दावेदारी की बात कही है जहां भाजपा को पिछले चुनावों में नुकसान हुआ था। निषाद समुदाय से जुड़े मुद्दों को लेकर पार्टी लगातार सक्रिय है। हाल की घटनाओं में संजय निषाद का सरकार के भीतर रहते हुए अपनी ही सरकार से जुड़े मुद्दे पर विरोध दर्ज कराना भी राजनीतिक रूप से चर्चा में रहा है।

सुभासपा: पूर्वांचल में राजभर समीकरण
ओमप्रकाश राजभर की सुभासपा का प्रमुख आधार पूर्वांचल में है। पार्टी NDA के भीतर रहते हुए अपनी सीट हिस्सेदारी बढ़ाने की तैयारी कर रही है। राजभर और अति पिछड़ा वर्ग के सामाजिक समीकरण को पार्टी अपनी चुनावी रणनीति के केंद्र में रख रही है।

