भारत में समावेशी और टिकाऊ ग्रामीण अर्थव्यवस्था के निर्माण की दिशा में जारी प्रयासों में, देश के प्रमुख पशुधन संसाधनों में से एक बकरी ग्रामीण विकास और उद्यमिता का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती है। भारत में लगभग 15.4 करोड़ बकरियां हैं और उत्तर प्रदेश ने अपनी अर्थव्यवस्था को 1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। ऐसे में बकरी पालन को केवल पारंपरिक पशुपालन गतिविधि के रूप में देखने के बजाय इसे एक संगठित ग्रामीण उद्यम के रूप में विकसित करने की अपार संभावनाएं हैं, जो आजीविका, रोजगार और स्थानीय स्तर पर आर्थिक समृद्धि ला सकता है। उत्तर प्रदेश के सोनभद्र स्थित ‘रीजेनेरेट इंडिया’ के संस्थापक मुकेश पनिका अपने ‘Goat Enterprise’ पहल के माध्यम से इसी बदलाव की दिशा में काम कर रहे हैं। उनकी यह पहल पुनर्योजी कृषि, किसान उत्पादक संगठनों (FPO), तकनीक, बाजार संपर्क और सामुदायिक भागीदारी को एक साथ लाकर बकरी पालन को अधिक संगठित और टिकाऊ ग्रामीण व्यवसाय के रूप में विकसित करने पर जोर देती है। मुकेश पनिका कहते हैं, “बकरी पालन को लंबे समय से छोटे स्तर की पारिवारिक आजीविका गतिविधि के तौर पर देखा जाता रहा है। लेकिन अब जरूरत है कि हम बकरी को एक सशक्त आर्थिक संपत्ति के रूप में देखें, जो ग्रामीण समुदायों के लिए आय और उद्यमिता के अनंत अवसर पैदा कर सकती है।” इस बदलाव में सबसे बड़ी संभावना बकरियों और उनसे मिलने वाले उत्पादों के मूल्यवर्धन (Value Addition) में है। किसानों को केवल जीवित पशुओं की बिक्री तक सीमित रखने के बजाय बकरी के दूध, घी, पनीर, मिल्क पाउडर और सौंदर्य प्रसाधनों (Cosmetics) जैसे प्रसंस्कृत उत्पादों के जरिए नई वैल्यू चेन विकसित की जा सकती हैं। इससे संग्रहण, प्रसंस्करण, ब्रांडिंग, मार्केटिंग और वितरण जैसे क्षेत्रों में ग्रामीण स्तर पर नए माइक्रो-उद्यमों के अवसर पैदा हो सकते हैं। FPO इस परिवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। छोटे किसानों को एक साथ लाकर वे संसाधनों के बेहतर उपयोग, सीधे बाजार तक पहुँच, तकनीक अपनाने और संगठित वैल्यू चेन में भागीदारी को संभव बना सकते हैं।

