सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि कर्मचारियों द्वारा नियमितीकरण से पूर्व अनुबंध, तदर्थ, दैनिक वेतन एवं वर्क-चार्ज के आधार पर दी गई सेवा को पेंशन एवं सेवानिवृत्ति लाभों के लिए अर्हकारी सेवा में शामिल किया जाना चाहिए। न्यायालय ने यह भी कहा है कि सेवा में आने वाले कृत्रिम या प्रशासनिक अंतरालों को, परिस्थितियों के अनुसार, वास्तविक निरंतर सेवा के बीच बाधा नहीं माना जाना चाहिए। न्यायालय ने पेंशन को पूर्व में दी गई सेवा के बदले मिलने वाली सामाजिक सुरक्षा बताते हुए कहा कि ऐसे में कर्मचारी को पेंशन लाभ से वंचित करना सामान्यतः अनुचित है। सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के बाद मध्यप्रदेश अधिकारी कर्मचारी संयुक्त मोर्चा के प्रदेश उपाध्यक्ष एवं शिक्षक नेता उपेन्द्र कौशल ने कहा कि मध्यप्रदेश में 1998 से आगे विभिन्न चरणों में नियुक्त पुराने शिक्षकों की सेवा, वेतन, वरिष्ठता एवं पेंशन संबंधी विषयों पर शासन को सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय की भावना का अध्ययन करते हुए वर्षवार, संवर्गवार एवं नियुक्ति की वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर न्यायसंगत नीति बनानी चाहिए। पंजाब स्कूल एजुकेशन बोर्ड के मामले में आया है सुप्रीम कोर्ट का फैसला दरअसल पंजाब स्कूल एजुकेशन बोर्ड एवं अन्य बनाम सतनाम सिंह एवं अन्य की सिविल अपील क्रमांक 6865/2022 में 8 सितंबर 2026 को दिए निर्णय में स्पष्ट किया है कि लंबे समय तक लगातार सेवा देने के बाद नियमित किए गए कर्मचारियों की पूर्व-नियमित सेवा को केवल तकनीकी आधार पर पेंशन एवं सेवानिवृत्ति लाभों से वंचित करना उचित नहीं है। न्यायालय ने कहा कि कर्मचारी की सेवा के वास्तविक स्वरूप को उसके नियुक्ति-पत्र में प्रयुक्त शब्दावली से अधिक महत्व दिया जाना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी माना है कि संबंधित कर्मचारियों द्वारा नियमितीकरण से पूर्व अनुबंध, तदर्थ, दैनिक वेतन एवं वर्क-चार्ज के आधार पर दी गई सेवा को पेंशन एवं सेवानिवृत्ति लाभों के लिए अर्हकारी सेवा में शामिल किया जाना चाहिए। न्यायालय ने यह भी कहा कि सेवा में आने वाले कृत्रिम अथवा प्रशासनिक अंतरालों को, परिस्थितियों के अनुसार, वास्तविक निरंतर सेवा के बीच बाधा नहीं माना जाना चाहिए। पेंशन को बताया सेवा का अर्जित अधिकार फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने पेंशन को पूर्व में दी गई सेवा के बदले मिलने वाली सामाजिक सुरक्षा बताते हुए कहा कि लंबे समय तक निरंतर सेवा देने वाले कर्मचारी को बाद में नियमित किए जाने के पश्चात केवल तकनीकी या कृत्रिम आधार पर पेंशन लाभ से वंचित करना सामान्यतः अनुचित है। इस फैसले में न्यायालय ने पूर्व-नियमित सेवा को पेंशन के लिए गणना में शामिल करने के पूर्व के न्यायिक दृष्टांतों पर भी भरोसा किया तथा ऐसे मामले में जहां कर्मचारी 2004 से पहले सेवा में आया था और बाद में नियमित हुआ, पूर्व सेवा को पेंशन के लिए अर्हकारी मानने के सिद्धांत को स्वीकार किया। मध्यप्रदेश के पुराने शिक्षकों-कर्मचारियों के लिए भी महत्वपूर्ण मध्यप्रदेश अधिकारी कर्मचारी संयुक्त मोर्चा के प्रदेश उपाध्यक्ष एवं शिक्षक नेता उपेन्द्र कौशल ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय उन हजारों पुराने शिक्षकों एवं कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण है, जिन्होंने वर्षों तक विभिन्न अस्थायी, संविदा, अध्यापक अथवा स्थानीय निकाय आधारित व्यवस्थाओं में सेवा देने के बाद नियमित/नवीन संवर्ग में स्थान प्राप्त किया है। उन्होंने कहा कि यदि किसी कर्मचारी ने शासन की व्यवस्था के अंतर्गत वर्षों तक सेवा दी और बाद में उसे नियमित सेवा में शामिल किया गया है, तो उसकी पूर्व सेवा के वास्तविक स्वरूप तथा सेवानिवृत्ति लाभों पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। केवल नियमितीकरण की बाद की तारीख को आधार बनाकर वर्षों की पूर्व सेवा की उपेक्षा करना न्यायसंगत नहीं होना चाहिए। सरकार पुराने शिक्षकों, कर्मचारियों की पूर्व सेवा का कराए परीक्षण कौशल ने कहा कि मध्यप्रदेश में 1998 से आगे विभिन्न चरणों में नियुक्त पुराने शिक्षकों की सेवा, वेतन, वरिष्ठता एवं पेंशन संबंधी विषयों पर शासन को सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय की भावना का अध्ययन करते हुए वर्षवार, संवर्गवार एवं नियुक्ति की वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर न्यायसंगत नीति बनानी चाहिए। उन्होंने शासन से मांग की कि पुराने शिक्षकों-कर्मचारियों की पूर्व सेवा को लेकर उत्पन्न विसंगतियों का परीक्षण किया जाए तथा जिन कर्मचारियों ने लंबे समय तक सेवा देने के बाद नियमित सेवा प्राप्त की है, उन्हें उनके वास्तविक सेवा योगदान के अनुरूप पेंशन एवं अन्य सेवानिवृत्ति लाभ प्रदान करने की दिशा में निर्णय लिया जाए।

