Surplus Liquidity in Banks: भारतीय बैंकिंग सिस्टम इस समय नकदी से लबालब है। सितंबर के पहले हफ्ते में बैंकों के पास अतिरिक्त नकदी यानी सरप्लस लिक्विडिटी 11 लाख करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच गई। ब्लूमबर्ग के आंकड़ों के मुताबिक, 9 सितंबर 2026 को यह करीब 10.5 लाख करोड़ थी। इतनी बड़ी मात्रा में अतिरिक्त पैसा सिर्फ बैंकिंग सेक्टर की एक तकनीकी खबर नहीं है। इसका सीधा असर आम लोगों के लोन, FD, निवेश और ब्याज दरों पर भी पड़ सकता है।
आखिर बैंकिंग सिस्टम में इतना पैसा आया कहां से?
इस तेजी की बड़ी वजह RBI की स्पेशल डॉलर-रुपया स्वैप सुविधा रही। यह सुविधा FCNR(B) यानी Foreign Currency Non-Resident Bank Deposits और दूसरे विदेशी स्रोतों से मिलने वाली रकम से जुड़ी थी। एफसीएनआर (बी) डिपॉजिट ऐसे फिक्स्ड डिपॉजिट होते हैं, जिन्हें NRI विदेशी मुद्रा, जैसे अमेरिकी डॉलर में रखते हैं। इसमें जमा रकम विदेशी मुद्रा में ही रहती है, इसलिए रुपये में गिरावट आने पर भी जमा रकम की वैल्यू पर वैसा असर नहीं पड़ता। एफसीएनआर (बी) स्कीम के तहत NRI निवेशकों ने बड़ी मात्रा में पैसा भारतीय बैंकों में जमा कराया है।
इस योजना का मकसद देश के घटते विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करना और रुपये को सपोर्ट देना था। मिडिल ईस्ट संकट के दौरान कच्चे तेल की ऊंची कीमतों से भारत के फॉरेक्स रिजर्व पर दबाव बढ़ा था। भारत अपनी तेल जरूरत का करीब 85% हिस्सा आयात करता है। 31 अगस्त 2026 को यह सुविधा बंद होने तक बैंकों ने FCNR(B) डिपॉजिट के जरिए 127.2 अरब डॉलर जुटाए थे। इस निवेश से भारत के विदेशी मुद्रा भंडार को उम्मीद से काफी अधिक सपोर्ट मिला है।
बैंकों को मिले डॉलर के बदले रुपये
इस पूरी प्रक्रिया को आसान भाषा में ऐसे समझ सकते हैं। बैंकों ने NRI से डॉलर जुटाए और इन डॉलर्स को RBI के साथ स्वैप करके बदले में रुपये हासिल किए। इन रुपयों का इस्तेमाल बैंक लोन देने और निवेश करने में कर सकते हैं। यानी सिस्टम में अचानक बड़ी मात्रा में रुपये पहुंच गए। यही वजह है कि बैंकिंग सिस्टम में सरप्लस लिक्विडिटी तेजी से बढ़ी। हालांकि, एनआरआई की जमा रकम डॉलर में ही रहती है। मैच्योरिटी पर बैंक को ब्याज के साथ डॉलर वापस करना होता है। इसलिए अभी जो अतिरिक्त लिक्विडिटी दिखाई दे रही है, वह हमेशा के लिए नहीं है। अगले तीन से पांच साल में जब ये डिपॉजिट मैच्योर होंगे, तो स्वैप धीरे-धीरे खत्म होंगे और सिस्टम से यह अतिरिक्त पैसा वापस निकल सकता है।
लिक्विडिटी क्या होती है?
सीधे शब्दों में कहें तो लिक्विडिटी का मतलब सिस्टम में उपलब्ध पैसे से है, जिसका इस्तेमाल बैंक लोन देने और दूसरे वित्तीय लेनदेन के लिए कर सकते हैं। जब बैंक के पास जरूरत से कम पैसा होता है तो उसे लिक्विडिटी डेफिसिट कहा जाता है। वहीं, जब जरूरत से ज्यादा पैसा उपलब्ध हो तो इसे लिक्विडिटी सरप्लस कहते हैं। अतिरिक्त पैसा बैंक दूसरे बैंकों को उधार दे सकते हैं या RBI के पास जमा कर सकते हैं।
क्या ज्यादा लिक्विडिटी अच्छी खबर है?
टैक्स एवं निवेश सलाहकार बलवंत जैन के अनुसार, ज्यादा लिक्विडिटी अपने आप में न तो अच्छी है और न खराब। असली सवाल यह है कि अर्थव्यवस्था को जितने पैसे की जरूरत है, उसके मुकाबले सिस्टम में कितना अतिरिक्त पैसा मौजूद है। एक तरफ FCNR(B) में बड़ी रकम आना विदेशी निवेशकों और NRI के भरोसे को दिखाता है। दूसरी तरफ अगर बैंक इस अतिरिक्त पैसे को सही तरीके से इस्तेमाल नहीं कर पाते हैं तो यह ब्याज दरों पर दबाव डाल सकता है। मॉर्गन स्टेनली की एक रिपोर्ट के मुताबिक मार्च 2027 तक अतिरिक्त लिक्विडिटी बनी रह सकती है।
RBI के लिए क्यों बढ़ सकती है परेशानी?
आरबीआई अर्थव्यवस्था में पैसों की कीमत यानी ब्याज दर को प्रभावित करने के लिए मुख्य रूप से रेपो रेट का इस्तेमाल करता है। आरबीआई रेपो रेट के जरिए बाजार की लिक्विडिटी को प्रभावित करता है। लेकिन सरपल्स लिक्विडिटी की स्थिति में आरबीआई की मौद्रिक नीति का ट्रांसमिशन कमजोर हो सकता है। अगर आरबीआई को महंगाई को कंट्रोल में लाना होता है, तो वह बाजार से लिक्विडिटी कम करता है। ऐसा वह रेपो रेट बढ़ाकर करता है। रेपो रेट बढ़ने से लोन महंगे होते हैं, ऐसे में लोग लोन कम लेते हैं। बाजार में कम पैसा आता है, तो अतिरिक्त खरीदारी कम होती है, जिससे महंगाई काबू में आती है।
दूसरी तरफ जब मंहगाई कंट्रोल में हो और आरबीआई को जीडीपी ग्रोथ को सपोर्ट करना होता है, तो वह बाजार में लिक्विडिटी बढ़ाता है। वह ऐसा रेपो रेट घटाकर करता है। इससे लोन सस्ते होते हैं। लोग ज्यादा लोन लेते हैं, जिससे बाजार में पैसा आता है और जीडीपी को सपोर्ट मिलता है।
लेकिन सरप्लस लिक्विडिटी की स्थिति में जब बैंकों के पास जरूरत से बहुत ज्यादा पैसा हो, तो स्थिति बदल जाती है। बैंक अतिरिक्त रकम को दूसरे बैंकों को उधार देने के लिए ज्यादा प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं। इससे शॉर्ट टर्म में ब्याज दरें नीचे आ सकती हैं। यानी आरबीआई एक तरफ रेपो रेट के जरिए पैसे की कीमत को प्रभावित करना चाहता है, लेकिन दूसरी तरफ बाजार में मौजूद अतिरिक्त नकदी ब्याज दरों को नीचे खींच सकती है। इसे ही मौद्रिक नीति के ट्रांसमिशन के कमजोर होने के तौर पर देखा जाता है।
अभी कहां पहुंची है ब्याज दर?
आरबीआई की मौजूदा रेपो रेट 5.25% है। इसके मुकाबले Standing Deposit Facility यानी SDF की दर 5% और Marginal Standing Facility यानी MSF की दर 5.5% है। एसडीएफ के जरिए बैंक अपना अतिरिक्त पैसा आरबीआई के पास रख सकते हैं और उस पर ब्याज कमा सकते हैं। वहीं, फंड की तत्काल जरूरत होने पर बैंक एमएसएफ का इस्तेमाल कर सकते हैं। 9 सितंबर 2026 को Weighted Average Call Rate यानी WACR 5.04% था, जो एसडीएफ की 5% दर के काफी करीब है।
शेयर बाजार पर क्या असर?
जैन के अनुसार, सरप्लस लिक्विडिटी शेयर बाजार के लिए सामान्य तौर पर सपोर्टिव हो सकती है। बैंकों और वित्तीय संस्थानों के पास अतिरिक्त पैसा होने पर इसका कुछ हिस्सा शेयर बाजार से जुड़े फाइनेंसिंग चैनलों तक पहुंच सकता है। कम ब्याज दरों से कंपनियों की फाइनेंसिंग लागत भी घट सकती है। हालांकि, शेयरों की कीमत सिर्फ लिक्विडिटी से तय नहीं होती। कंपनी की कमाई, आर्थिक विकास और निवेशकों का सेंटीमेंट भी अहम भूमिका निभाते हैं।
बॉन्ड और डेट फंड पर असर
डेट मार्केट में इसका ज्यादा सीधा असर हो सकता है। जब बाजार में निवेश के लिए ज्यादा पैसा होता है तो बॉन्ड की मांग बढ़ सकती है। बॉन्ड की कीमत बढ़ने पर उसकी यील्ड आम तौर पर घटती है।
लिक्विड और अल्ट्रा शॉर्ट ड्यूरेशन डेट फंड का रिटर्न शॉर्ट टर्म ब्याज दरों से जुड़ा होता है। इसलिए अगर अतिरिक्त लिक्विडिटी के कारण शॉर्ट टर्म रेट नीचे जाते हैं तो इन फंडों में नए निवेश पर मिलने वाला रिटर्न भी कम हो सकता है।
लंबी अवधि वाले डेट फंड पर असर थोड़ा अलग होता है। अगर सरप्लस लिक्विडिटी के कारण बॉन्ड की कीमतों को सपोर्ट मिलता है और यील्ड नीचे आती है, तो इन फंडों की NAV को फायदा हो सकता है।
FD कराने वालों पर क्या असर?
यहां तस्वीर थोड़ी उलटी है। बैंक अगर नकदी से भरे हुए हों, तो उन्हें जमा जुटाने के लिए बहुत ऊंची ब्याज दर देने की जरूरत कम हो सकती है। इसका मतलब है कि नई FD कराने वाले ग्राहकों को ज्यादा ब्याज दर मिलने की संभावना कम हो सकती है।
लोन लेने वालों को मिल सकता है फायदा
उधर कर्ज लेने वालों के लिए ज्यादा लिक्विडिटी राहत की खबर हो सकती है। बैंकों के पास पर्याप्त पैसा होने पर उन्हें फंड की कमी नहीं रहती और इससे लोन की लागत पर नीचे आने का दबाव बन सकता है। हालांकि, होम लोन, पर्सनल लोन या बिजनेस लोन की दरें सिर्फ लिक्विडिटी से तय नहीं होतीं। RBI की नीति, बैंक की फंडिंग लागत और दूसरे मार्केट फैक्टर भी महत्वपूर्ण होते हैं।
RBI के पास पैसा निकालने के हैं कई रास्ते
अगर सिस्टम में नकदी जरूरत से ज्यादा हो जाती है तो आरबीआई इसे वापस खींच सकता है। इसके लिए केंद्रीय बैंक के पास कई विकल्प हैं।
Variable Rate Reverse Repo (VRRR): बैंक अतिरिक्त पैसा आरबीआई के पास एक तय अवधि के लिए जमा कर सकते हैं। ब्याज दर ऑक्शन के जरिए तय होती है।
Open Market Operations (OMO): आरबीआई सरकारी सिक्योरिटीज बेच सकता है। बैंक और वित्तीय संस्थान जब इन्हें खरीदते हैं तो पैसा आरबीआई के पास चला जाता है और बैंकिंग सिस्टम में उपलब्ध अतिरिक्त नकदी घटती है।
Cash Reserve Ratio (CRR): बैंक की जमा राशि का एक हिस्सा आरबीआई के पास रखना जरूरी होता है। आरबीआई अगर सीआरआर बढ़ाता है, तो बैंकों के पास लोन और निवेश के लिए उपलब्ध पैसा घट जाता है।
आम आदमी पर क्या होगा असर?
कुल मिलाकर बैंकिंग सिस्टम में इतनी बड़ी अतिरिक्त नकदी का असर अलग-अलग लोगों पर अलग हो सकता है। लोन लेने वालों को सस्ती ब्याज दरों का फायदा मिल सकता है, जबकि FD कराने वालों के लिए ऊंची ब्याज दरों का रास्ता मुश्किल हो सकता है। शेयर और बॉन्ड बाजार को भी अतिरिक्त नकदी से कुछ सपोर्ट मिल सकता है। लेकिन बहुत ज्यादा और लंबे समय तक बनी रहने वाली लिक्विडिटी आरबीआई के लिए चुनौती बन सकती है, खासकर तब, जब महंगाई केंद्रीय बैंक के 4% टार्गेट से ऊपर हो। ऐसे में आरबीआई को यह देखना होगा कि सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त पैसा अर्थव्यवस्था की जरूरत के मुताबिक इस्तेमाल हो और उसकी मौद्रिक नीति का असर भी बना रहे।



Same bank, same amount, same date and same tenure will mean the same interest rate across branches.
Banks will have to publish FD rates clearly on their websites, allowing customers to compare…