पटना हाईकोर्ट ने नालंदा के गिरियक प्रखंड के चोरसुआ पंचायत के मुखिया चंदन कुमार के खिलाफ पारित थानाबदर के आदेश को अवैध बताते हुए इसे खारिज कर दिया। जस्टिस राजीव रंजन प्रसाद और जस्टिस सुनील दत्ता मिश्रा की खंडपीठ ने ये फैसला सुनाया। कोर्ट ने सीधे तौर पर जिला बदर के फैसले को संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत दिए गए मौलिक अधिकारों का हनन माना और राज्य सरकार को आदेश दिया कि वो याचिकाकर्ता मुखिया को 50 हजार रुपए बतौर मुआवजा, 10 हजार रुपए मुकदमा खर्च यानी कुल 60 हजार रुपए की राशि का भुगतान एक महीने के अंदर करे। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने राज्य के शीर्ष प्रशासनिक अधिकारियों को नसीहत दी कि असाधारण और कठोर शक्तियों का प्रयोग मनमाने तरीके से नहीं, बल्कि कानून की ओर से स्थापित प्रक्रिया के पूर्ण सम्मान के साथ किया जाना चाहिए। अब सिलसिलेवार तरीके समझिए पूरा मामला नालंदा जिले के गिरियक थाना क्षेत्र के चोरसुआ के रहने वाले नरेश महतो के बेटे चंदन कुमार चोरसुआ पंचायत के पिछले 10 साल से मुखिया हैं। चंदन कुमार के मुताबिक, मैंने प्रखंड स्तर पर चल रही अलग-अलग जन-कल्याणकारी योजनाओं में हो रही अनियमितताओं, क्रियान्वयन न होने और अधिकारियों की मनमानी के खिलाफ आवाज उठाई थी। इस कारण ब्लॉक के अधिकारी मुझसे नाराज थे। चंदन ने बताया कि 2025 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान मुझे सबक सिखाने और राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के इशारे पर पावापुरी ओपी में मेरे खिलाफ मात्र पांच दिनों के अंदर (28 अगस्त, 31 अगस्त और 2 सितंबर 2025) तीन ‘सनहा’ दर्ज कर लिए गए। इसके बाद स्थानीय पुलिस ने इसे सनहा को आधार बनाते हुए मुझे ‘सक्रिय दुर्दांत अपराधी’ और असामाजिक तत्व करार दिया। थाना प्रभारी से लेकर एसपी तक की अनुशंसा और डीएम का आदेश प्रशासनिक मशीनरी ने तेजी दिखाते हुए 8 सितंबर 2025 को पावापुरी ओपी प्रभारी गौरव सिंह से प्रस्ताव तैयार करवाया। 17 सितंबर को तत्कालीन राजगीर एसडीपीओ सुनील सिंह ने इस पर अपनी संस्तुति दी और 19 सितंबर को नालंदा के तत्कालीन एसपी भरत सोनी ने प्रस्ताव अनुमोदित कर कार्रवाई के लिए तत्कालीन जिलाधिकारी कुंदन कुमार को भेज दिया। नालंदा के तत्कालीन जिलाधिकारी कुंदन कुमार ने 3 अक्टूबर 2025 को जारी किया नोटिस नालंदा के तत्कालीन जिलाधिकारी कुंदन कुमार ने बीसीसीए वाद संख्या 212/2025 दर्ज करते हुए 3 अक्टूबर 2025 को नोटिस जारी किया, जो मुखिया को 7 अक्टूबर की शाम 5 बजकर 30 बजे तामील कराया गया। नोटिस में उन्हें 10 अक्टूबर को शाम 4 बजे उपस्थित होकर जवाब देने का निर्देश दिया गया। याचिकाकर्ता यानी चंदन कुमार ने आनन-फानन में अपना संक्षिप्त जवाब दाखिल किया और विस्तृत जवाब के लिए समय मांगा। लेकिन जिलाधिकारी ने उसी दिन यानी 10 अक्टूबर 2025 को अंतिम आदेश पारित कर दिया। डीएम ने आदेश दिया कि चंदन कुमार को दो महीने के लिए सप्ताह में तीन दिन (प्रत्येक सोमवार, बुधवार और शुक्रवार) अपने घर से करीब 20-40 किलोमीटर दूर सिलाव थाने में सशरीर हाजिरी देनी होगी। वे गिरियक थाने के अधिकार क्षेत्र से बाहर बिना संबंधित थानाध्यक्ष की पूर्व अनुमति के नहीं जा सकेंगे। उनके साथ भारी लाठी, ब्लेड, चाकू, माचिस या लोहे की कोई भी वस्तु रखने पर प्रतिबंध लगा दिया गया और उन्हें एक साधारण नागरिक की तरह आचरण करने का फरमान सुनाया गया। ‘हफ्ते में तीन दिन थाने में रहना वास्तविक रूप से तड़ीपार’ इस फरमान के खिलाफ चंदन कुमार अक्टूबर 2025 में पटना हाईकोर्ट पहुंचे। मामले को सुनने के बाद पटना हाईकोर्ट ने इस व्यवस्था पर गहरी नाराजगी जताई। खंडपीठ ने कहा कि सोमवार, बुधवार और शुक्रवार को घर से 40 किलोमीटर दूर सिलाव थाने में हाजिरी लगाने और थानेदार की इजाजत के बिना थाना क्षेत्र से बाहर न निकलने की बाध्यता का व्यावहारिक अर्थ यह था कि उस व्यक्ति को दिन-रात थाने के पहरे में रहना पड़े। यह अनिवार्य रूप से ‘एक्सटर्नमेंट’ यानी तड़ीपार के समान है, जिससे एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि अपने पंचायत क्षेत्र के विकास और आम जनता के कार्यों से पूरी तरह कट गया। हाईकोर्ट में खुली पोल: डीएम बोले- ‘एसपी की चिट्ठी के सिवा कोई फाइल नहीं’ सितंबर के दूसरे हफ्ते में सुनवाई के दौरान पटना हाईकोर्ट ने नालंदा के जिलाधिकारी उदिता सिंह को ऑनलाइन पेश होने का आदेश दिया था। जब पीठ ने जिलाधिकारी उदिता सिंह से पूछा कि उन्होंने कानून की धारा 2(F) और धारा 3 के तहत किन स्वतंत्र तथ्यों के आधार पर मुखिया को समाज के लिए गंभीर खतरा माना, तो डीएम जबाव नहीं दे पाईं। डीएम ने अदालत के समक्ष स्वीकार किया कि तत्कालीन एसपी भरत सोनी की ओर से भेजे गए लेटर ऑफ इंट्रोडक्शन के अलावा उनके आधिकारिक रिकॉर्ड में कोई अन्य सामग्री या सत्यापन रिपोर्ट मौजूद नहीं थी। इस पर खंडपीठ ने बेहद कड़े शब्दों में कहा कि नालंदा के एसपी ने केवल एक ‘डाकघर’ की तरह काम किया, जिसने बिना किसी छानबीन के रिपोर्ट को आगे बढ़ा दिया। वहीं, जिलाधिकारी ने अपने न्यायिक और स्वतंत्र विवेक का रत्ती भर भी प्रयोग नहीं किया। खंडपीठ ने भी कहा कि डीएम को ये तक नहीं पता था कि जिन प्राथमिकियों का हवाला दिया जा रहा है, उनकी वास्तविक प्रकृति क्या है और याचिकाकर्ता उन सभी में सक्षम न्यायालय से अग्रिम अथवा नियमित जमानत पर रिहा चल रहा है। जब कोई व्यक्ति जमानत पर हो और उसने किसी शर्त का उल्लंघन न किया हो, तो जमानत रद्द कराने के बजाय सीधे आपातकालीन कानून थोप देना पूरी तरह अधिकार क्षेत्र का दुरुपयोग है। ‘असामाजिक तत्व’ की परिभाषा और प्रक्रियात्मक चूक हाईकोर्ट ने बिहार अपराध नियंत्रण अधिनियम की धारा 2(b), 2(f) और धारा 3 का विस्तृत विश्लेषण किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून के तहत किसी व्यक्ति को ‘असामाजिक तत्व’ मानकर कार्रवाई करने के लिए आवश्यक है कि कार्रवाई शुरू होने से ठीक पूर्व 24 महीनों के भीतर उसके खिलाफ कम से कम दो मामलों में पुलिस रिपोर्ट दायर हो चुकी हो। प्रशासन यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहा। इसके अलावा, अदालत ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के हनन पर कहा कि 7 अक्टूबर की शाम नोटिस देकर 10 अक्टूबर को स्पष्टीकरण मांगना और उसी दिन सजा सुना देना यह दर्शाता है कि प्रशासन ने पूर्व-नियोजित मानसिकता से काम किया। याचिकाकर्ता को न तो एसपी व एसडीपीओ की गोपनीय रिपोर्ट दी गई और न ही दर्ज सनहा की प्रतियां उपलब्ध कराई गईं, जिससे वह अपना प्रभावी बचाव नहीं कर सका। ‘लॉ एंड ऑर्डर’ और ‘पब्लिक ऑर्डर’ का बुनियादी फर्क समझाया सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों (राम मनोहर लोहिया बनाम बिहार राज्य, कुसो साह, अमीना बेगम तथा विजय कुमार राजपूत) का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने दोहराया कि ‘कानून-व्यवस्था’ और ‘लोक-व्यवस्था’ में जमीन-आसमान का फर्क होता है। अदालत ने कहा कि हर छोटा-मोटा अपराध या दो गुटों का झगड़ा समाज की समरसता या लोक-व्यवस्था को ध्वस्त नहीं करता। साधारण मारपीट या विवाद कानून-व्यवस्था का विषय हैं, जिनसे सामान्य आपराधिक कानूनों के जरिए निपटा जा सकता है। निवारक निरोध या तड़ीपार जैसी दंडात्मक और असाधारण शक्तियां केवल तब लागू की जा सकती हैं, जब किसी व्यक्ति के कृत्य से संपूर्ण समाज या इलाके का जन-जीवन ठप होने या व्यापक असुरक्षा फैलने का स्पष्ट और वास्तविक खतरा हो। केवल आगामी चुनावों की सामान्य आशंका जताकर किसी पर यह कठोर कानून नहीं थोपा जा सकता। अधिकारियों के लिए नजीर बनेगा फैसला खंडपीठ ने अपना फैसला सुनाते हुए नालंदा डीएम के आदेश को पूरी तरह खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने 11 नवंबर 2025 को ही डीएम के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी थी, लेकिन तब तक मुखिया एक महीने की अवैध पाबंदी और मानसिक प्रताड़ना झेल चुके थे। इसलिए कोर्ट ने 50,000 रुपये का मुआवजा और 10,000 रुपये वाद खर्च देने का आदेश जारी किया। अदालत ने अंत में चेतावनी भरे लहजे में लिखा कि प्रशासन के शीर्ष पदों पर बैठे जिलाधिकारियों और पुलिस अधीक्षकों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे कानून के दायरे में रहकर काम करें। कठोर कानूनों की स्थापित प्रक्रिया का लगातार उल्लंघन शासन और न्यायप्रणाली में जनता के भरोसे को तार-तार करता है, जिसे अदालत किसी भी सूरत में मूकदर्शक बनकर नहीं देख सकती। मुखिया ने कहा- न्याय की हुई जीत चोरसुआ पंचायत के मुखिया चंदन कुमार ने कहा कि न्याय की जीत हुई है। उन्हें राजनीतिक विरोधियों के द्वारा फंसाया गया था। जिसके बाद उन्होंने न्यायालय का शरण लिया और आखिरकार उन्हें पटना उच्च न्यायलय से न्याय मिली है। बीसीसीए लगाने वाले अधिकारियों का हो चुका है तबादला हालांकि बीसीसीए लगाने की कार्रवाई तत्कालीन जिलाधिकारी कुंदन कुमार ने एसपी भारत सोनी के प्रस्ताव पर की थी। दोनों ही अधिकारियों का फिलहाल जिले से ट्रांसफर हो चुका है। वर्तमान में जिलाधिकारी उदिता सिंह और एसपी हृदयकांत हैं। पटना हाईकोर्ट ने नालंदा के गिरियक प्रखंड के चोरसुआ पंचायत के मुखिया चंदन कुमार के खिलाफ पारित थानाबदर के आदेश को अवैध बताते हुए इसे खारिज कर दिया। जस्टिस राजीव रंजन प्रसाद और जस्टिस सुनील दत्ता मिश्रा की खंडपीठ ने ये फैसला सुनाया। कोर्ट ने सीधे तौर पर जिला बदर के फैसले को संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत दिए गए मौलिक अधिकारों का हनन माना और राज्य सरकार को आदेश दिया कि वो याचिकाकर्ता मुखिया को 50 हजार रुपए बतौर मुआवजा, 10 हजार रुपए मुकदमा खर्च यानी कुल 60 हजार रुपए की राशि का भुगतान एक महीने के अंदर करे। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने राज्य के शीर्ष प्रशासनिक अधिकारियों को नसीहत दी कि असाधारण और कठोर शक्तियों का प्रयोग मनमाने तरीके से नहीं, बल्कि कानून की ओर से स्थापित प्रक्रिया के पूर्ण सम्मान के साथ किया जाना चाहिए। अब सिलसिलेवार तरीके समझिए पूरा मामला नालंदा जिले के गिरियक थाना क्षेत्र के चोरसुआ के रहने वाले नरेश महतो के बेटे चंदन कुमार चोरसुआ पंचायत के पिछले 10 साल से मुखिया हैं। चंदन कुमार के मुताबिक, मैंने प्रखंड स्तर पर चल रही अलग-अलग जन-कल्याणकारी योजनाओं में हो रही अनियमितताओं, क्रियान्वयन न होने और अधिकारियों की मनमानी के खिलाफ आवाज उठाई थी। इस कारण ब्लॉक के अधिकारी मुझसे नाराज थे। चंदन ने बताया कि 2025 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान मुझे सबक सिखाने और राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के इशारे पर पावापुरी ओपी में मेरे खिलाफ मात्र पांच दिनों के अंदर (28 अगस्त, 31 अगस्त और 2 सितंबर 2025) तीन ‘सनहा’ दर्ज कर लिए गए। इसके बाद स्थानीय पुलिस ने इसे सनहा को आधार बनाते हुए मुझे ‘सक्रिय दुर्दांत अपराधी’ और असामाजिक तत्व करार दिया। थाना प्रभारी से लेकर एसपी तक की अनुशंसा और डीएम का आदेश प्रशासनिक मशीनरी ने तेजी दिखाते हुए 8 सितंबर 2025 को पावापुरी ओपी प्रभारी गौरव सिंह से प्रस्ताव तैयार करवाया। 17 सितंबर को तत्कालीन राजगीर एसडीपीओ सुनील सिंह ने इस पर अपनी संस्तुति दी और 19 सितंबर को नालंदा के तत्कालीन एसपी भरत सोनी ने प्रस्ताव अनुमोदित कर कार्रवाई के लिए तत्कालीन जिलाधिकारी कुंदन कुमार को भेज दिया। नालंदा के तत्कालीन जिलाधिकारी कुंदन कुमार ने 3 अक्टूबर 2025 को जारी किया नोटिस नालंदा के तत्कालीन जिलाधिकारी कुंदन कुमार ने बीसीसीए वाद संख्या 212/2025 दर्ज करते हुए 3 अक्टूबर 2025 को नोटिस जारी किया, जो मुखिया को 7 अक्टूबर की शाम 5 बजकर 30 बजे तामील कराया गया। नोटिस में उन्हें 10 अक्टूबर को शाम 4 बजे उपस्थित होकर जवाब देने का निर्देश दिया गया। याचिकाकर्ता यानी चंदन कुमार ने आनन-फानन में अपना संक्षिप्त जवाब दाखिल किया और विस्तृत जवाब के लिए समय मांगा। लेकिन जिलाधिकारी ने उसी दिन यानी 10 अक्टूबर 2025 को अंतिम आदेश पारित कर दिया। डीएम ने आदेश दिया कि चंदन कुमार को दो महीने के लिए सप्ताह में तीन दिन (प्रत्येक सोमवार, बुधवार और शुक्रवार) अपने घर से करीब 20-40 किलोमीटर दूर सिलाव थाने में सशरीर हाजिरी देनी होगी। वे गिरियक थाने के अधिकार क्षेत्र से बाहर बिना संबंधित थानाध्यक्ष की पूर्व अनुमति के नहीं जा सकेंगे। उनके साथ भारी लाठी, ब्लेड, चाकू, माचिस या लोहे की कोई भी वस्तु रखने पर प्रतिबंध लगा दिया गया और उन्हें एक साधारण नागरिक की तरह आचरण करने का फरमान सुनाया गया। ‘हफ्ते में तीन दिन थाने में रहना वास्तविक रूप से तड़ीपार’ इस फरमान के खिलाफ चंदन कुमार अक्टूबर 2025 में पटना हाईकोर्ट पहुंचे। मामले को सुनने के बाद पटना हाईकोर्ट ने इस व्यवस्था पर गहरी नाराजगी जताई। खंडपीठ ने कहा कि सोमवार, बुधवार और शुक्रवार को घर से 40 किलोमीटर दूर सिलाव थाने में हाजिरी लगाने और थानेदार की इजाजत के बिना थाना क्षेत्र से बाहर न निकलने की बाध्यता का व्यावहारिक अर्थ यह था कि उस व्यक्ति को दिन-रात थाने के पहरे में रहना पड़े। यह अनिवार्य रूप से ‘एक्सटर्नमेंट’ यानी तड़ीपार के समान है, जिससे एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि अपने पंचायत क्षेत्र के विकास और आम जनता के कार्यों से पूरी तरह कट गया। हाईकोर्ट में खुली पोल: डीएम बोले- ‘एसपी की चिट्ठी के सिवा कोई फाइल नहीं’ सितंबर के दूसरे हफ्ते में सुनवाई के दौरान पटना हाईकोर्ट ने नालंदा के जिलाधिकारी उदिता सिंह को ऑनलाइन पेश होने का आदेश दिया था। जब पीठ ने जिलाधिकारी उदिता सिंह से पूछा कि उन्होंने कानून की धारा 2(F) और धारा 3 के तहत किन स्वतंत्र तथ्यों के आधार पर मुखिया को समाज के लिए गंभीर खतरा माना, तो डीएम जबाव नहीं दे पाईं। डीएम ने अदालत के समक्ष स्वीकार किया कि तत्कालीन एसपी भरत सोनी की ओर से भेजे गए लेटर ऑफ इंट्रोडक्शन के अलावा उनके आधिकारिक रिकॉर्ड में कोई अन्य सामग्री या सत्यापन रिपोर्ट मौजूद नहीं थी। इस पर खंडपीठ ने बेहद कड़े शब्दों में कहा कि नालंदा के एसपी ने केवल एक ‘डाकघर’ की तरह काम किया, जिसने बिना किसी छानबीन के रिपोर्ट को आगे बढ़ा दिया। वहीं, जिलाधिकारी ने अपने न्यायिक और स्वतंत्र विवेक का रत्ती भर भी प्रयोग नहीं किया। खंडपीठ ने भी कहा कि डीएम को ये तक नहीं पता था कि जिन प्राथमिकियों का हवाला दिया जा रहा है, उनकी वास्तविक प्रकृति क्या है और याचिकाकर्ता उन सभी में सक्षम न्यायालय से अग्रिम अथवा नियमित जमानत पर रिहा चल रहा है। जब कोई व्यक्ति जमानत पर हो और उसने किसी शर्त का उल्लंघन न किया हो, तो जमानत रद्द कराने के बजाय सीधे आपातकालीन कानून थोप देना पूरी तरह अधिकार क्षेत्र का दुरुपयोग है। ‘असामाजिक तत्व’ की परिभाषा और प्रक्रियात्मक चूक हाईकोर्ट ने बिहार अपराध नियंत्रण अधिनियम की धारा 2(b), 2(f) और धारा 3 का विस्तृत विश्लेषण किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून के तहत किसी व्यक्ति को ‘असामाजिक तत्व’ मानकर कार्रवाई करने के लिए आवश्यक है कि कार्रवाई शुरू होने से ठीक पूर्व 24 महीनों के भीतर उसके खिलाफ कम से कम दो मामलों में पुलिस रिपोर्ट दायर हो चुकी हो। प्रशासन यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहा। इसके अलावा, अदालत ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के हनन पर कहा कि 7 अक्टूबर की शाम नोटिस देकर 10 अक्टूबर को स्पष्टीकरण मांगना और उसी दिन सजा सुना देना यह दर्शाता है कि प्रशासन ने पूर्व-नियोजित मानसिकता से काम किया। याचिकाकर्ता को न तो एसपी व एसडीपीओ की गोपनीय रिपोर्ट दी गई और न ही दर्ज सनहा की प्रतियां उपलब्ध कराई गईं, जिससे वह अपना प्रभावी बचाव नहीं कर सका। ‘लॉ एंड ऑर्डर’ और ‘पब्लिक ऑर्डर’ का बुनियादी फर्क समझाया सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों (राम मनोहर लोहिया बनाम बिहार राज्य, कुसो साह, अमीना बेगम तथा विजय कुमार राजपूत) का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने दोहराया कि ‘कानून-व्यवस्था’ और ‘लोक-व्यवस्था’ में जमीन-आसमान का फर्क होता है। अदालत ने कहा कि हर छोटा-मोटा अपराध या दो गुटों का झगड़ा समाज की समरसता या लोक-व्यवस्था को ध्वस्त नहीं करता। साधारण मारपीट या विवाद कानून-व्यवस्था का विषय हैं, जिनसे सामान्य आपराधिक कानूनों के जरिए निपटा जा सकता है। निवारक निरोध या तड़ीपार जैसी दंडात्मक और असाधारण शक्तियां केवल तब लागू की जा सकती हैं, जब किसी व्यक्ति के कृत्य से संपूर्ण समाज या इलाके का जन-जीवन ठप होने या व्यापक असुरक्षा फैलने का स्पष्ट और वास्तविक खतरा हो। केवल आगामी चुनावों की सामान्य आशंका जताकर किसी पर यह कठोर कानून नहीं थोपा जा सकता। अधिकारियों के लिए नजीर बनेगा फैसला खंडपीठ ने अपना फैसला सुनाते हुए नालंदा डीएम के आदेश को पूरी तरह खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने 11 नवंबर 2025 को ही डीएम के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी थी, लेकिन तब तक मुखिया एक महीने की अवैध पाबंदी और मानसिक प्रताड़ना झेल चुके थे। इसलिए कोर्ट ने 50,000 रुपये का मुआवजा और 10,000 रुपये वाद खर्च देने का आदेश जारी किया। अदालत ने अंत में चेतावनी भरे लहजे में लिखा कि प्रशासन के शीर्ष पदों पर बैठे जिलाधिकारियों और पुलिस अधीक्षकों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे कानून के दायरे में रहकर काम करें। कठोर कानूनों की स्थापित प्रक्रिया का लगातार उल्लंघन शासन और न्यायप्रणाली में जनता के भरोसे को तार-तार करता है, जिसे अदालत किसी भी सूरत में मूकदर्शक बनकर नहीं देख सकती। मुखिया ने कहा- न्याय की हुई जीत चोरसुआ पंचायत के मुखिया चंदन कुमार ने कहा कि न्याय की जीत हुई है। उन्हें राजनीतिक विरोधियों के द्वारा फंसाया गया था। जिसके बाद उन्होंने न्यायालय का शरण लिया और आखिरकार उन्हें पटना उच्च न्यायलय से न्याय मिली है। बीसीसीए लगाने वाले अधिकारियों का हो चुका है तबादला हालांकि बीसीसीए लगाने की कार्रवाई तत्कालीन जिलाधिकारी कुंदन कुमार ने एसपी भारत सोनी के प्रस्ताव पर की थी। दोनों ही अधिकारियों का फिलहाल जिले से ट्रांसफर हो चुका है। वर्तमान में जिलाधिकारी उदिता सिंह और एसपी हृदयकांत हैं।

