क्या बिहार में नीतीश की पार्टी जेडीयू टूट रही:संजय झा ने क्यों पार्टी का नाम बदलने की बात कही, पढ़िए JDU के अंदर की कहानी

क्या बिहार में नीतीश की पार्टी जेडीयू टूट रही:संजय झा ने क्यों पार्टी का नाम बदलने की बात कही, पढ़िए JDU के अंदर की कहानी

पहले ये बयान पढ़िए ‘अब वो समय आ गया है कि JDU का नाम बदल कर जनता दल (नीतीश) कर दिया जाए।’ पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने ये बयान खगड़िया में आयोजित नीतीश संवाद कार्यक्रम में दिया है। संजय झा के इस बयान के कई मायने निकाले जा रहे हैं? सियासी गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की शुरू हो गई है कि क्या कांग्रेस (I) की तरह JDU में भी टूट का खतरा बढ़ गया है? क्या JDU के भीतर गुटबाजी है? क्या नीतीश कुमार की विरासत को बचाने के लिए ऐसा किया जा रहा है? अब इन सवालों को विस्तार से समझिए… पहले पार्टी के दो सीनियर लीडर का बयान नीतीश कुमार ने पार्टी को स्थापित किया है। पार्टी उनके नेतृत्व में आगे बढ़ रही है। सभी लोग नीतीश कुमार के चलते ही इस पार्टी से जुड़े हुए हैं। निश्चित रूप से यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास करने योग्य है।- श्रवण कुमार, विधायक दल के नेता पार्टी का नाम बदलने की संजय झा की निजी इच्छा है। ये अच्छी बात है। जब पार्टी के सामने इसका प्रस्ताव आएगा तो पार्टी फैसला करेगी। -बिजेंद्र यादव, डिप्टी सीएम क्या कांग्रेस की तर्ज पर जदयू के भीतर टूट की स्थिति बन रही बात 1978 की है। पूर्व पीएम और कांग्रेस की लीडर इंदिरा गांधी देश में इमरजेंसी लागू करने के बाद अगला लोकसभा चुनाव हार गईं थी। पार्टी के भीतर संजय गांधी पावरफुल हो गए थे। कांग्रेस के कई सीनियर लीडर इंदिरा गांधी की लीडरशिप से खफा थे। इंदिरा गांधी ने अपना एक अलग गुट बना लिया था। इसका नाम कांग्रेस (I) रखा गया। यहां I का मतलब इंदिरा गांधी से था। जबकि दूसरे गुट का नेतृत्व देवराज उर्स कर रहे थे। इस धड़े का नाम कांग्रेस (U) रखा गया। तीन साल बाद इंदिरा गुट को असली कांग्रेस की मान्यता दी गई। क्या जदयू के भीतर भी इस तरह का माहौल बन रहा है। पार्टी के कई नेता ऑन रिकॉर्ड सीधे इस बात को खारिज कर देते हैं। लेकिन, ऑफ रिकॉर्ड स्वीकार करते हैं कि दो अलग-अलग तिकड़ी पार्टी में हावी है। संजय झा और ललन सिंह दोनों खुद को पावरफुल दिखाने में जुटे हैं। यही कारण है कि इस तरह की बातें शुरू हो गई हैं। इस सवाल पर सीनियर जर्नलिस्ट और द हिंदू के सीनियर असिस्टेंट एडिटर अमरनाथ तिवारी ने कहा, ‘इस बयान के सीधे मायने ये निकल रहे हैं कि पार्टी टूटने वाली है।’ क्या विरासत बचाने के लिए नीतीश के नाम का इस्तेमाल हो रहा? JDU के सामने एक समस्या विरासत बचाने की है। क्योंकि नीतीश कुमार के बाद कोई भी ऐसे नेता पार्टी के भीतर नहीं हैं, जिनकी पूरे बिहार में स्वीकार्यता हो। ऐसे समय में जब नीतीश एक्टिव पॉलिटिक्स से तकरीबन रिटायरमेंट की ओर बढ़ गए हैं। उनके बाद उनकी विरासत आगे कैसे जाएगी। इस लिहाज से भी उनके नाम के इस्तेमाल को देखा जा रहा है। इस सवाल पर द इंडियन एक्सप्रेस के सीनयिर असिस्टेंट एडिटर संतोष सिंह कहते हैं, ‘पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि नीतीश के बाद अगले 5 साल तक जनता के बीच कौन सा फैक्टर पार्टी को आगे ले जाएगा। क्या जदयू के भीतर गुटबाजी हावी हो रही है? जदयू में टूट के सवाल पर संतोष सिंह कहते हैं, ’यह पूरी तरह निराधार है। JDU के भीतर कोई ऐसे नेता ही नहीं हैं, जिनका बड़ा जनाधार हो। अगर किसी तरह की टूट पार्टी के भीतर होती है तो दूसरा धड़ा मुंह के बल गिरेगा। पार्टी या पार्टी के कोई भी नेता अभी तक नीतीश की साया से बाहर नहीं आ पाए हैं।‘ नीतीश की विरासत पर दूसरे दल भी जताने लगे हैं अधिकार अब उन पार्टियों को जानिए, जिनमें टूट हुई NCP: जुलाई 2023 में शरद पवार की NCP में टूट हुई। अजीत पवार के नेतृत्व वाले धड़े को इलेक्शन कमीशन ने असली NCP माना। बाद में शरद पवार ने NCP (शरदचंद्र पवार) पार्टी बना लीं। शिवसेना: 2022 में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना में टूट हुई। इलेक्शन कमीशन ने एकनाथ शिंदे गुट को असली ‘शिवसेना’ माना। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले गुट का नाम शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) शिवसेना (UBT) रखा गया। LJP: जून 2021 में राम विलास पासवान के निधन के बाद पशुपति कुमार पारस के नेतृत्व में पार्टी टूटी। पार्टी दो हिस्से में बंट गई। पशुपति पारस के नेतृत्व में रालोजपा बनी। चिराग पासवान ने लोजपा (रामविलास) बनाया। पहले ये बयान पढ़िए ‘अब वो समय आ गया है कि JDU का नाम बदल कर जनता दल (नीतीश) कर दिया जाए।’ पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने ये बयान खगड़िया में आयोजित नीतीश संवाद कार्यक्रम में दिया है। संजय झा के इस बयान के कई मायने निकाले जा रहे हैं? सियासी गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की शुरू हो गई है कि क्या कांग्रेस (I) की तरह JDU में भी टूट का खतरा बढ़ गया है? क्या JDU के भीतर गुटबाजी है? क्या नीतीश कुमार की विरासत को बचाने के लिए ऐसा किया जा रहा है? अब इन सवालों को विस्तार से समझिए… पहले पार्टी के दो सीनियर लीडर का बयान नीतीश कुमार ने पार्टी को स्थापित किया है। पार्टी उनके नेतृत्व में आगे बढ़ रही है। सभी लोग नीतीश कुमार के चलते ही इस पार्टी से जुड़े हुए हैं। निश्चित रूप से यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास करने योग्य है।- श्रवण कुमार, विधायक दल के नेता पार्टी का नाम बदलने की संजय झा की निजी इच्छा है। ये अच्छी बात है। जब पार्टी के सामने इसका प्रस्ताव आएगा तो पार्टी फैसला करेगी। -बिजेंद्र यादव, डिप्टी सीएम क्या कांग्रेस की तर्ज पर जदयू के भीतर टूट की स्थिति बन रही बात 1978 की है। पूर्व पीएम और कांग्रेस की लीडर इंदिरा गांधी देश में इमरजेंसी लागू करने के बाद अगला लोकसभा चुनाव हार गईं थी। पार्टी के भीतर संजय गांधी पावरफुल हो गए थे। कांग्रेस के कई सीनियर लीडर इंदिरा गांधी की लीडरशिप से खफा थे। इंदिरा गांधी ने अपना एक अलग गुट बना लिया था। इसका नाम कांग्रेस (I) रखा गया। यहां I का मतलब इंदिरा गांधी से था। जबकि दूसरे गुट का नेतृत्व देवराज उर्स कर रहे थे। इस धड़े का नाम कांग्रेस (U) रखा गया। तीन साल बाद इंदिरा गुट को असली कांग्रेस की मान्यता दी गई। क्या जदयू के भीतर भी इस तरह का माहौल बन रहा है। पार्टी के कई नेता ऑन रिकॉर्ड सीधे इस बात को खारिज कर देते हैं। लेकिन, ऑफ रिकॉर्ड स्वीकार करते हैं कि दो अलग-अलग तिकड़ी पार्टी में हावी है। संजय झा और ललन सिंह दोनों खुद को पावरफुल दिखाने में जुटे हैं। यही कारण है कि इस तरह की बातें शुरू हो गई हैं। इस सवाल पर सीनियर जर्नलिस्ट और द हिंदू के सीनियर असिस्टेंट एडिटर अमरनाथ तिवारी ने कहा, ‘इस बयान के सीधे मायने ये निकल रहे हैं कि पार्टी टूटने वाली है।’ क्या विरासत बचाने के लिए नीतीश के नाम का इस्तेमाल हो रहा? JDU के सामने एक समस्या विरासत बचाने की है। क्योंकि नीतीश कुमार के बाद कोई भी ऐसे नेता पार्टी के भीतर नहीं हैं, जिनकी पूरे बिहार में स्वीकार्यता हो। ऐसे समय में जब नीतीश एक्टिव पॉलिटिक्स से तकरीबन रिटायरमेंट की ओर बढ़ गए हैं। उनके बाद उनकी विरासत आगे कैसे जाएगी। इस लिहाज से भी उनके नाम के इस्तेमाल को देखा जा रहा है। इस सवाल पर द इंडियन एक्सप्रेस के सीनयिर असिस्टेंट एडिटर संतोष सिंह कहते हैं, ‘पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि नीतीश के बाद अगले 5 साल तक जनता के बीच कौन सा फैक्टर पार्टी को आगे ले जाएगा। क्या जदयू के भीतर गुटबाजी हावी हो रही है? जदयू में टूट के सवाल पर संतोष सिंह कहते हैं, ’यह पूरी तरह निराधार है। JDU के भीतर कोई ऐसे नेता ही नहीं हैं, जिनका बड़ा जनाधार हो। अगर किसी तरह की टूट पार्टी के भीतर होती है तो दूसरा धड़ा मुंह के बल गिरेगा। पार्टी या पार्टी के कोई भी नेता अभी तक नीतीश की साया से बाहर नहीं आ पाए हैं।‘ नीतीश की विरासत पर दूसरे दल भी जताने लगे हैं अधिकार अब उन पार्टियों को जानिए, जिनमें टूट हुई NCP: जुलाई 2023 में शरद पवार की NCP में टूट हुई। अजीत पवार के नेतृत्व वाले धड़े को इलेक्शन कमीशन ने असली NCP माना। बाद में शरद पवार ने NCP (शरदचंद्र पवार) पार्टी बना लीं। शिवसेना: 2022 में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना में टूट हुई। इलेक्शन कमीशन ने एकनाथ शिंदे गुट को असली ‘शिवसेना’ माना। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले गुट का नाम शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) शिवसेना (UBT) रखा गया। LJP: जून 2021 में राम विलास पासवान के निधन के बाद पशुपति कुमार पारस के नेतृत्व में पार्टी टूटी। पार्टी दो हिस्से में बंट गई। पशुपति पारस के नेतृत्व में रालोजपा बनी। चिराग पासवान ने लोजपा (रामविलास) बनाया।  

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