Haiwaan Movie Review In Hindi: अक्षय कुमार और सैफ अली खान 18 साल बाद पर्दे पर वापस आए हैं, लेकिन ‘हैवान’ की असली बाजी इससे कहीं आगे है। ये ऐसी साइकोलॉजिकल थ्रिलर है, जहां आंखों के सामने होने वाली लड़ाई से ज्यादा खतरनाक वो खेल है, जो दिमाग के अंदर चल रहा है। एक नेत्रहीन शख्स का सामना ऐसे दुश्मन से होता है, जिसकी अगली चाल का अंदाजा लगाना आसान नहीं। यहां हथियारों से ज्यादा काम इंस्टिंक्ट का है, ताकत से ज्यादा दिमाग का और हर कदम के साथ बढ़ता है सर्वाइवल का खेल। प्रियदर्शन ने इसी अनोखे कॉन्सेप्ट को अक्षय और सैफ के बिल्कुल अलग अवतार के साथ पेश किया है, जो ‘हैवान’ को एक ऐसी थ्रिलर बनाता है, जिसका अंदाज बॉलीवुड की आम एक्शन फिल्मों से काफी अलग है। फिल्म देखने से पहले पढ़ते हैं इसका रिव्यू।
कैसी है फिल्म की कहानी?
‘हैवान’ की दुनिया में कदम रखते ही साफ हो जाता है कि ये कोई आम हीरो-विलेन की कहानी नहीं है। यहां एक तरफ है परशुराम, जिसकी अगली चाल को पढ़ पाना आसान नहीं, और दूसरी तरफ श्याम, जो दुनिया को आंखों से नहीं देख सकता, लेकिन हर आवाज और आहट को महसूस करने की अपनी अलग ताकत रखता है। दोनों के रास्ते जब टकराते हैं, तो शुरू होता है ऐसा खेल जिसमें जीत सिर्फ ताकतवर होने से नहीं मिलती। फिल्म धीरे-धीरे अपने पत्ते खोलती है और हर नए मोड़ पर आपको यही सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर किसके पास बाजी पलटने का मौका है।
अक्षय-सैफ के किरदारों में जबरदस्त पंच
अक्षय कुमार को आपने एक्शन करते हुए बहुत देखा है, लेकिन ‘हैवान’ में उनका अंदाज ही अलग है। परशुराम को वो चीखने-चिल्लाने वाले विलेन की तरह नहीं निभाते, बल्कि उनकी खामोशी ही सबसे बड़ा खतरा बन जाती है। चेहरे पर कम एक्सप्रेशन, बॉडी लैंग्वेज में पूरा कंट्रोल और हर सीन में एक रहस्य के साथ अक्षय इस किरदार को ऐसा बनाते हैं कि स्क्रीन पर उनके आते ही माहौल बदल जाता है। सबसे दिलचस्प बात ये है कि आप परशुराम को समझने की कोशिश करते रहते हैं, लेकिन वह हर बार आपकी सोच से थोड़ा आगे निकलता हुआ नजर आता है।
सैफ अली खान के लिए श्याम एक ऐसा किरदार है जिसमें उन्हें बिना ज्यादा शोर किए बहुत कुछ कहना है। नेत्रहीन श्याम की सबसे बड़ी ताकत उसकी समझ और इंस्टिंक्ट है और सैफ इसे बेहद नैचुरल तरीके से पर्दे पर लेकर आते हैं। वह किरदार को ओवरड्रामैटिक बनाने के बजाय उसकी खामोशी और सतर्कता पर भरोसा करते हैं। यही वजह है कि जब श्याम किसी खतरे को महसूस करता है, तो दर्शक भी उसके साथ उस खतरे को महसूस करने लगते हैं। अक्षय के परशुराम की आक्रामक एनर्जी के सामने सैफ का शांत अंदाज इस टक्कर को और दिलचस्प बनाता है।
फिल्म में किरदारों का अभिनय
पहल चौधरी फिल्म में ऐसा सरप्राइज लेकर आती हैं जिसके बारे में ज्यादा बात करना कहानी का मजा खराब कर सकता है। उनके किरदार में मासूमियत भी है और इमोशन भी, लेकिन कहानी आगे बढ़ने के साथ उनकी मौजूदगी की अहमियत महसूस होती है। सैयामी खेर, श्रिया पिलगांवकर और बोमन ईरानी अपने किरदारों में फिल्म की दुनिया को मजबूत करते हैं। शारिब हाशमी पुलिस ऑफिसर के रूप में कहानी के दूसरे हिस्से को सपोर्ट करते हैं, जबकि असरानी की मौजूदगी फिल्म को इमोशनल टच देती है।
फिल्म के डायरेक्शन में भी पूरे नंबर
प्रियदर्शन की फिल्मों से जब कॉमेडी और एंटरटेनमेंट की उम्मीद हो, तब उनका ‘हैवान’ जैसे डार्क थ्रिलर के साथ आना अपने आप में दिलचस्प है। डायरेक्टर यहां सिर्फ एक्शन पर भरोसा नहीं करते। वह माहौल, खामोशी और किरदारों के बीच की टेंशन से रोमांच पैदा करते हैं। कई बार आपको लगता है कि अब कहानी साफ हो गई है, लेकिन तभी फिल्म कोई नया सवाल सामने रख देती है। 2 घंटे 44 मिनट का रनटाइम जरूर लंबा है, लेकिन फिल्म अपने मुख्य कॉन्फ्लिक्ट को लंबे समय तक जिंदा रखती है।
फिल्म में क्या बेहतर हो सकता था?
‘हैवान’ एक मजबूत थ्रिलर के तौर पर असर छोड़ती है, लेकिन कुछ जगहों पर फिल्म थोड़ी कमजोर भी पड़ती है। इसकी सबसे बड़ी कमी इसका लंबा रनटाइम है। करीब 2 घंटे 44 मिनट की अवधि आज के तेज रफ्तार थ्रिलर सिनेमा के लिहाज से कुछ ज्यादा महसूस होती है।
फिल्म देखें या फिर नहीं?
‘हैवान’ की सबसे बड़ी खूबी यही है कि ये आपको हर जवाब पहले से नहीं देती। अक्षय का डार्क परशुराम, सैफ का शांत लेकिन चौकन्ना श्याम और दोनों के बीच चलता खेल फिल्म को लगातार आगे बढ़ाता है। ऐसे में अगर आप कुछ नया और अलग तरह का माहौल बनाने वाला सिनेमा देखा चाहते हैं, तो ये फिल्म आपके लिए सही चॉइस है।

