कटिहार में गंगा नदी के कटाव और बढ़ते जलस्तर ने मनिहारी क्षेत्र के कई परिवारों से उनका घर-बार छीन लिया है। बाढ़ और कटाव से विस्थापित परिवार अब रेलवे पटरियों के किनारे जिंदगी गुजारने को मजबूर हैं। रेल ट्रैक से महज कुछ दूरी पर प्लास्टिक तानकर परिवार रह रहे हैं। ऐसे में ट्रेन गुजरने के दौरान हादसे का खतरा बना रहता है। ट्रेन की आवाज सुनते ही लोग अपने बच्चों और मवेशियों को लेकर सुरक्षित दूरी की ओर भागने लगते हैं। देखें, मौके से आई तस्वीरें… प्लास्टिक के नीचे परिवार, हर वक्त हादसे का डर
पीड़ित शंभू महतो, दर्शनीय मौसमात और जोगेंद्र महतो ने बताया कि उनका बसेरा रेलवे पटरी से सटा हुआ है। प्लास्टिक के नीचे परिवार के साथ रहने की मजबूरी है। ट्रेन गुजरने के दौरान उन्हें हमेशा किसी अनहोनी की आशंका बनी रहती है। सबसे ज्यादा चिंता छोटे बच्चों की सुरक्षा को लेकर रहती है। 1987 से विस्थापन का दंश झेल रहा परिवार
स्थानीय निवासी विजय कृष्ण सिंह ने बताया कि वे पहले बैद्यनाथपुर में रहते थे। वर्ष 1987 से बाढ़ और गंगा के कटाव के कारण विस्थापन का जीवन जी रहे हैं। कटाव में उनका घर और जमीन गंगा में समा गया। इसके बाद से स्थायी रूप से बसाने की कोई ठोस व्यवस्था नहीं हो सकी। हर साल सुरक्षित ठिकाने की तलाश
विजय कृष्ण सिंह के अनुसार, बाढ़ आते ही विस्थापित परिवारों को रहने के लिए सुरक्षित जगह की तलाश करनी पड़ती है। उनका कहना है कि जब सिर छिपाने के लिए घर ही नहीं है, तो मजबूरी में रेलवे ट्रैक के किनारे जान जोखिम में डालकर रहना पड़ रहा है। राहत के लिए प्लास्टिक भी पर्याप्त नहीं
वार्ड कमिश्नर बेचन सिंह ने बताया कि बाढ़ के बाद बड़ी संख्या में लोग रेलवे पटरी के किनारे शरण लिए हुए हैं। जिला प्रशासन की ओर से प्लास्टिक उपलब्ध कराने की बात कही गई थी, लेकिन जरूरतमंद परिवारों को इसका पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है। सुरक्षित जगह और राहत की मांग
वार्ड कमिश्नर ने प्रशासन से बाढ़ पीड़ित परिवारों के लिए सुरक्षित स्थान उपलब्ध कराने की मांग की है। साथ ही राहत सामग्री और अन्य जरूरी सुविधाओं की समुचित व्यवस्था करने की अपील की है, ताकि लोगों को रेलवे ट्रैक जैसे जोखिम वाले स्थान पर रहने के लिए मजबूर न होना पड़े। कटिहार में गंगा नदी के कटाव और बढ़ते जलस्तर ने मनिहारी क्षेत्र के कई परिवारों से उनका घर-बार छीन लिया है। बाढ़ और कटाव से विस्थापित परिवार अब रेलवे पटरियों के किनारे जिंदगी गुजारने को मजबूर हैं। रेल ट्रैक से महज कुछ दूरी पर प्लास्टिक तानकर परिवार रह रहे हैं। ऐसे में ट्रेन गुजरने के दौरान हादसे का खतरा बना रहता है। ट्रेन की आवाज सुनते ही लोग अपने बच्चों और मवेशियों को लेकर सुरक्षित दूरी की ओर भागने लगते हैं। देखें, मौके से आई तस्वीरें… प्लास्टिक के नीचे परिवार, हर वक्त हादसे का डर
पीड़ित शंभू महतो, दर्शनीय मौसमात और जोगेंद्र महतो ने बताया कि उनका बसेरा रेलवे पटरी से सटा हुआ है। प्लास्टिक के नीचे परिवार के साथ रहने की मजबूरी है। ट्रेन गुजरने के दौरान उन्हें हमेशा किसी अनहोनी की आशंका बनी रहती है। सबसे ज्यादा चिंता छोटे बच्चों की सुरक्षा को लेकर रहती है। 1987 से विस्थापन का दंश झेल रहा परिवार
स्थानीय निवासी विजय कृष्ण सिंह ने बताया कि वे पहले बैद्यनाथपुर में रहते थे। वर्ष 1987 से बाढ़ और गंगा के कटाव के कारण विस्थापन का जीवन जी रहे हैं। कटाव में उनका घर और जमीन गंगा में समा गया। इसके बाद से स्थायी रूप से बसाने की कोई ठोस व्यवस्था नहीं हो सकी। हर साल सुरक्षित ठिकाने की तलाश
विजय कृष्ण सिंह के अनुसार, बाढ़ आते ही विस्थापित परिवारों को रहने के लिए सुरक्षित जगह की तलाश करनी पड़ती है। उनका कहना है कि जब सिर छिपाने के लिए घर ही नहीं है, तो मजबूरी में रेलवे ट्रैक के किनारे जान जोखिम में डालकर रहना पड़ रहा है। राहत के लिए प्लास्टिक भी पर्याप्त नहीं
वार्ड कमिश्नर बेचन सिंह ने बताया कि बाढ़ के बाद बड़ी संख्या में लोग रेलवे पटरी के किनारे शरण लिए हुए हैं। जिला प्रशासन की ओर से प्लास्टिक उपलब्ध कराने की बात कही गई थी, लेकिन जरूरतमंद परिवारों को इसका पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है। सुरक्षित जगह और राहत की मांग
वार्ड कमिश्नर ने प्रशासन से बाढ़ पीड़ित परिवारों के लिए सुरक्षित स्थान उपलब्ध कराने की मांग की है। साथ ही राहत सामग्री और अन्य जरूरी सुविधाओं की समुचित व्यवस्था करने की अपील की है, ताकि लोगों को रेलवे ट्रैक जैसे जोखिम वाले स्थान पर रहने के लिए मजबूर न होना पड़े।

