औरंगाबाद के टीचर राजकुमार को पटना में मिला राजकीय सम्मान:नक्सल प्रभावित इलाके में बच्चों के लिए बनवाई सड़क, बेटियों के लिए बनाया सेनेटरी पैड बैंक

औरंगाबाद के टीचर राजकुमार को पटना में मिला राजकीय सम्मान:नक्सल प्रभावित इलाके में बच्चों के लिए बनवाई सड़क, बेटियों के लिए बनाया सेनेटरी पैड बैंक

औरंगाबाद के टीचर राजकुमार प्रसाद गुप्ता को आज शिक्षक दिवस के अवसर पर पटना में राजकीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित किया गया। करीब 25 साल के टीचिंग करियर में उन्होंने नक्सल प्रभावित और संसाधनविहीन स्कूलों में स्मार्ट क्लास से लेकर लाइब्रेरी और लैबोरेट्री शुरू कराई। उनकी पहल से मध्य विद्यालय सलैया की पहचान जिले के बेहतर विद्यालयों में बनी है। राजकुमार प्रसाद गुप्ता की टीचिंग जर्नी चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों से शुरू हुई। बिहार लोक सेवा आयोग, पटना की अनुशंसा पर 2 दिसंबर 1999 को औरंगाबाद जिले में शिक्षक के रूप में नियुक्ति के बाद उनका ट्रांसफर देव प्रखंड मुख्यालय से करीब 28 किलोमीटर दूर अति नक्सल प्रभावित क्षेत्र के प्राथमिक विद्यालय महुलान में हुआ। स्कूल लगभग बंद था और वहां शिक्षक नियमित रूप से नहीं पहुंचते थे। पहाड़ी और जंगली क्षेत्र होने के कारण विद्यालय तक पहुंचना भी आसान नहीं था। पैदल या साइकिल से वहां पहुंचना पड़ता था। दो कमरों के उस विद्यालय में न प्लास्टर था और न खिड़की-दरवाजे। महज 25 बच्चों के साथ उन्होंने शिक्षण कार्य शुरू किया। संसाधनों की कमी उन्हें रोक नहीं सकी। स्कूल में पढ़ाई के दौरान राजकुमार गुप्ता की 3 तस्वीरें देखिए गांव के लोगों की मदद से दरवाजे, खिड़कियां, कुर्सी की व्यवस्था की ग्रामीणों के सहयोग से दरवाजे, खिड़कियां और कुर्सियों की व्यवस्था की। विद्यालय तक पहुंचने के लिए श्रमदान से रास्ता भी बनवाया। धीरे-धीरे बच्चों की संख्या बढ़ी और अभिभावक भी शिक्षा की मुख्यधारा से जुड़ने लगे। उन्होंने शिक्षा के साथ-साथ क्षेत्र में व्याप्त अंधविश्वास, नशापान और बाल विवाह जैसी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ भी जागरूकता अभियान चलाया। गणतंत्र दिवस पर विद्यालय में तिरंगा फहराना उनके लिए विशेष उपलब्धि रही, क्योंकि पहले वहां नक्सलियों द्वारा काला झंडा फहराया जाता था। स्काउटिंग, बालिका शिक्षा और टीएलएम से बदला पढ़ाई का अंदाज वर्ष 2004 में उनका स्थानांतरण प्राथमिक विद्यालय कर्मा, देव में हुआ। यह विद्यालय भी नक्सल प्रभावित क्षेत्र में था और बुनियादी सुविधाओं का अभाव था। विभाग से पत्राचार कर उन्होंने विद्यालय में चार कमरों का भवन बनवाने की दिशा में पहल की। संकुल संसाधन केंद्र समन्वयक और मास्टर ट्रेनर के रूप में भी उन्होंने काम किया और गतिविधि आधारित शिक्षण को बढ़ावा दिया। स्कूल में उन्होंने स्काउटिंग गतिविधियां शुरू कीं। इसका उद्देश्य बच्चों में अनुशासन के साथ समाज और देश के प्रति सेवा भावना विकसित करना था। बेहतर प्रदर्शन करने वाले बच्चों को राज्य और राष्ट्रपति पुरस्कार तक दिलाने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए बाल संसद और मीना मंच को सक्रिय किया, जिससे विद्यालय में छात्राओं की संख्या बढ़ी। शिक्षण-अधिगम सामग्री यानी टीएलएम आधारित पढ़ाई पर भी उन्होंने विशेष जोर दिया। स्वयं कई टीएलएम तैयार कर उनका कक्षा में इस्तेमाल किया। उनकी इस पहल को राज्य स्तर पर भी पहचान मिली। वर्ष 2011 में शिक्षा दिवस के अवसर पर पटना में शिक्षा मंत्री के हाथों टीएलएम निर्माण के लिए उन्हें प्रथम पुरस्कार से सम्मानित किया गया। सलैया स्कूल को बनाया इनोवेशन का लैब मध्य विद्यालय सलैया की जिम्मेदारी संभालने के बाद राजकुमार प्रसाद गुप्ता ने विद्यालय की तस्वीर बदलने के लिए एक-एक कर कई योजनाओं पर काम शुरू किया। विद्यालय की भौतिक और शैक्षणिक स्थिति को बेहतर बनाने के लिए रंग-रोगन, पुराने कमरों और बरामदों की मरम्मत, बेंच-डेस्क, किचन शेड, पुस्तकालय और प्रयोगशाला जैसी सुविधाएं विकसित की गईं। विद्यालय में एफएलएन कॉर्नर बनाया गया, जहां निपुण भारत मिशन के तहत बुनियादी साक्षरता एवं संख्या ज्ञान से संबंधित सामग्री बच्चों के लिए उपलब्ध कराई गई। स्मार्ट क्लास, आपदा कक्ष, हैंडवॉश स्टेशन, शुद्ध पेयजल के लिए वाटर प्यूरीफायर, पोषण वाटिका, विद्युतीकरण, बेल टाइमर और बाला पेंटिंग जैसी व्यवस्थाओं ने विद्यालय के वातावरण को आकर्षक बनाया। इसी क्रम में उनका चर्चित नवाचार ‘सीटी बजाओ-स्कूल चलो’ शुरू हुआ। पोषक क्षेत्र के दो-दो बच्चों को सीटी दी गई। बच्चे सीटी बजाते हुए निकलते तो रास्ते में दूसरे बच्चे भी उनके साथ विद्यालय आने लगे। सीटी की आवाज सुनकर अभिभावक भी बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित हुए। इससे नामांकन और उपस्थिति में सुधार हुआ। समुदाय को जोड़ा, बेटियों के लिए बनाया सेनेटरी पैड बैंक राजकुमार गुप्ता ने विद्यालय के विकास में समुदाय की भागीदारी को भी महत्वपूर्ण माना। उन्होंने जनप्रतिनिधियों, अभिभावकों और समाजसेवियों को विद्यालय से जोड़ा। नियमित अभिभावक-शिक्षक संगोष्ठी, टीएलएम मेला, बाल संसद, मीना मंच, बाल प्रेरक और आपदा प्रबंधन जैसी गतिविधियों से बच्चों में नेतृत्व क्षमता विकसित करने का प्रयास किया। छात्राओं की शिक्षा प्रभावित न हो, इसके लिए उन्होंने ‘सेनेटरी पैड बैंक’ की स्थापना की। यहां छात्राओं को निःशुल्क सेनेटरी पैड उपलब्ध कराया जाता है और माहवारी के दौरान स्वच्छता के प्रति जागरूक किया जाता है। इससे छात्राओं की नियमित उपस्थिति बढ़ाने में मदद मिली। विद्यालय के लिए समुदाय और समाजसेवियों के सहयोग से टीवी, सीमेंट बेंच, वाटर प्यूरीफायर, गेबियन और पेवर ब्लॉक जैसी सुविधाएं भी जुटाई गईं। कोविड-19 के दौरान विद्यालय बंद रहने पर उन्होंने आईसीटी और विभिन्न ऐप के माध्यम से बच्चों को पढ़ाई से जोड़े रखा। स्काउट मास्टर के रूप में उन्होंने अपनी टीम के साथ जिले के विभिन्न प्रखंडों में स्वनिर्मित मास्क वितरित कर कोरोना से बचाव का संदेश भी दिया। राजकुमार गुप्ता ने अपने अनुभवों और नवाचारों को पुस्तिका के रूप में भी दर्ज किया है। नक्सल प्रभावित क्षेत्र में बनवासी विद्यालय की स्थापना में योगदान के लिए उन्हें राज्यपाल द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। अब राजकीय शिक्षक पुरस्कार उनकी लंबे समय से जारी शिक्षा सेवा, नवाचार और सामाजिक सरोकारों को मिली एक और बड़ी पहचान है। उनकी कहानी यह संदेश देती है कि सीमित संसाधन और कठिन परिस्थितियां शिक्षा के रास्ते में बाधा जरूर बन सकती हैं, लेकिन मजबूत इच्छाशक्ति और समर्पण के आगे वे टिक नहीं सकतीं। औरंगाबाद के टीचर राजकुमार प्रसाद गुप्ता को आज शिक्षक दिवस के अवसर पर पटना में राजकीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित किया गया। करीब 25 साल के टीचिंग करियर में उन्होंने नक्सल प्रभावित और संसाधनविहीन स्कूलों में स्मार्ट क्लास से लेकर लाइब्रेरी और लैबोरेट्री शुरू कराई। उनकी पहल से मध्य विद्यालय सलैया की पहचान जिले के बेहतर विद्यालयों में बनी है। राजकुमार प्रसाद गुप्ता की टीचिंग जर्नी चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों से शुरू हुई। बिहार लोक सेवा आयोग, पटना की अनुशंसा पर 2 दिसंबर 1999 को औरंगाबाद जिले में शिक्षक के रूप में नियुक्ति के बाद उनका ट्रांसफर देव प्रखंड मुख्यालय से करीब 28 किलोमीटर दूर अति नक्सल प्रभावित क्षेत्र के प्राथमिक विद्यालय महुलान में हुआ। स्कूल लगभग बंद था और वहां शिक्षक नियमित रूप से नहीं पहुंचते थे। पहाड़ी और जंगली क्षेत्र होने के कारण विद्यालय तक पहुंचना भी आसान नहीं था। पैदल या साइकिल से वहां पहुंचना पड़ता था। दो कमरों के उस विद्यालय में न प्लास्टर था और न खिड़की-दरवाजे। महज 25 बच्चों के साथ उन्होंने शिक्षण कार्य शुरू किया। संसाधनों की कमी उन्हें रोक नहीं सकी। स्कूल में पढ़ाई के दौरान राजकुमार गुप्ता की 3 तस्वीरें देखिए गांव के लोगों की मदद से दरवाजे, खिड़कियां, कुर्सी की व्यवस्था की ग्रामीणों के सहयोग से दरवाजे, खिड़कियां और कुर्सियों की व्यवस्था की। विद्यालय तक पहुंचने के लिए श्रमदान से रास्ता भी बनवाया। धीरे-धीरे बच्चों की संख्या बढ़ी और अभिभावक भी शिक्षा की मुख्यधारा से जुड़ने लगे। उन्होंने शिक्षा के साथ-साथ क्षेत्र में व्याप्त अंधविश्वास, नशापान और बाल विवाह जैसी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ भी जागरूकता अभियान चलाया। गणतंत्र दिवस पर विद्यालय में तिरंगा फहराना उनके लिए विशेष उपलब्धि रही, क्योंकि पहले वहां नक्सलियों द्वारा काला झंडा फहराया जाता था। स्काउटिंग, बालिका शिक्षा और टीएलएम से बदला पढ़ाई का अंदाज वर्ष 2004 में उनका स्थानांतरण प्राथमिक विद्यालय कर्मा, देव में हुआ। यह विद्यालय भी नक्सल प्रभावित क्षेत्र में था और बुनियादी सुविधाओं का अभाव था। विभाग से पत्राचार कर उन्होंने विद्यालय में चार कमरों का भवन बनवाने की दिशा में पहल की। संकुल संसाधन केंद्र समन्वयक और मास्टर ट्रेनर के रूप में भी उन्होंने काम किया और गतिविधि आधारित शिक्षण को बढ़ावा दिया। स्कूल में उन्होंने स्काउटिंग गतिविधियां शुरू कीं। इसका उद्देश्य बच्चों में अनुशासन के साथ समाज और देश के प्रति सेवा भावना विकसित करना था। बेहतर प्रदर्शन करने वाले बच्चों को राज्य और राष्ट्रपति पुरस्कार तक दिलाने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए बाल संसद और मीना मंच को सक्रिय किया, जिससे विद्यालय में छात्राओं की संख्या बढ़ी। शिक्षण-अधिगम सामग्री यानी टीएलएम आधारित पढ़ाई पर भी उन्होंने विशेष जोर दिया। स्वयं कई टीएलएम तैयार कर उनका कक्षा में इस्तेमाल किया। उनकी इस पहल को राज्य स्तर पर भी पहचान मिली। वर्ष 2011 में शिक्षा दिवस के अवसर पर पटना में शिक्षा मंत्री के हाथों टीएलएम निर्माण के लिए उन्हें प्रथम पुरस्कार से सम्मानित किया गया। सलैया स्कूल को बनाया इनोवेशन का लैब मध्य विद्यालय सलैया की जिम्मेदारी संभालने के बाद राजकुमार प्रसाद गुप्ता ने विद्यालय की तस्वीर बदलने के लिए एक-एक कर कई योजनाओं पर काम शुरू किया। विद्यालय की भौतिक और शैक्षणिक स्थिति को बेहतर बनाने के लिए रंग-रोगन, पुराने कमरों और बरामदों की मरम्मत, बेंच-डेस्क, किचन शेड, पुस्तकालय और प्रयोगशाला जैसी सुविधाएं विकसित की गईं। विद्यालय में एफएलएन कॉर्नर बनाया गया, जहां निपुण भारत मिशन के तहत बुनियादी साक्षरता एवं संख्या ज्ञान से संबंधित सामग्री बच्चों के लिए उपलब्ध कराई गई। स्मार्ट क्लास, आपदा कक्ष, हैंडवॉश स्टेशन, शुद्ध पेयजल के लिए वाटर प्यूरीफायर, पोषण वाटिका, विद्युतीकरण, बेल टाइमर और बाला पेंटिंग जैसी व्यवस्थाओं ने विद्यालय के वातावरण को आकर्षक बनाया। इसी क्रम में उनका चर्चित नवाचार ‘सीटी बजाओ-स्कूल चलो’ शुरू हुआ। पोषक क्षेत्र के दो-दो बच्चों को सीटी दी गई। बच्चे सीटी बजाते हुए निकलते तो रास्ते में दूसरे बच्चे भी उनके साथ विद्यालय आने लगे। सीटी की आवाज सुनकर अभिभावक भी बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित हुए। इससे नामांकन और उपस्थिति में सुधार हुआ। समुदाय को जोड़ा, बेटियों के लिए बनाया सेनेटरी पैड बैंक राजकुमार गुप्ता ने विद्यालय के विकास में समुदाय की भागीदारी को भी महत्वपूर्ण माना। उन्होंने जनप्रतिनिधियों, अभिभावकों और समाजसेवियों को विद्यालय से जोड़ा। नियमित अभिभावक-शिक्षक संगोष्ठी, टीएलएम मेला, बाल संसद, मीना मंच, बाल प्रेरक और आपदा प्रबंधन जैसी गतिविधियों से बच्चों में नेतृत्व क्षमता विकसित करने का प्रयास किया। छात्राओं की शिक्षा प्रभावित न हो, इसके लिए उन्होंने ‘सेनेटरी पैड बैंक’ की स्थापना की। यहां छात्राओं को निःशुल्क सेनेटरी पैड उपलब्ध कराया जाता है और माहवारी के दौरान स्वच्छता के प्रति जागरूक किया जाता है। इससे छात्राओं की नियमित उपस्थिति बढ़ाने में मदद मिली। विद्यालय के लिए समुदाय और समाजसेवियों के सहयोग से टीवी, सीमेंट बेंच, वाटर प्यूरीफायर, गेबियन और पेवर ब्लॉक जैसी सुविधाएं भी जुटाई गईं। कोविड-19 के दौरान विद्यालय बंद रहने पर उन्होंने आईसीटी और विभिन्न ऐप के माध्यम से बच्चों को पढ़ाई से जोड़े रखा। स्काउट मास्टर के रूप में उन्होंने अपनी टीम के साथ जिले के विभिन्न प्रखंडों में स्वनिर्मित मास्क वितरित कर कोरोना से बचाव का संदेश भी दिया। राजकुमार गुप्ता ने अपने अनुभवों और नवाचारों को पुस्तिका के रूप में भी दर्ज किया है। नक्सल प्रभावित क्षेत्र में बनवासी विद्यालय की स्थापना में योगदान के लिए उन्हें राज्यपाल द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। अब राजकीय शिक्षक पुरस्कार उनकी लंबे समय से जारी शिक्षा सेवा, नवाचार और सामाजिक सरोकारों को मिली एक और बड़ी पहचान है। उनकी कहानी यह संदेश देती है कि सीमित संसाधन और कठिन परिस्थितियां शिक्षा के रास्ते में बाधा जरूर बन सकती हैं, लेकिन मजबूत इच्छाशक्ति और समर्पण के आगे वे टिक नहीं सकतीं।  

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