‘मां फोन पर चिल्ला रही थीं- पानी बहुत तेजी से आ रहा है, भागो…’, 9 दिन बाद भी परिवार का पता नहीं; पहाड़ से बेटे ने देखा तबाही का मंजर 65 किमी दूर से आया सैलाब, करीब 13 मिनट में तबाह कर दिया पूरा इलाका; 100-150 घरों में मुश्किल से 2-3 बचे, 4-5 हजार की आबादी में अब सिर्फ 12-13 लोगों के बचने की जानकारी नेपाल में आई भीषण बाढ़ और सैलाब ने हजारों परिवारों की जिंदगी पलट दी। देखते ही देखते घर, दुकानें, सामान और वर्षों की जमा-पूंजी पानी और मलबे में समा गई। इस त्रासदी में रक्सौल के रहने वाले बुधन साह के परिवार पर भी ऐसा कहर टूटा कि अब नौ दिन बाद भी उनके कई परिजनों का कोई सुराग नहीं है। परिवार के लोग नेपाल के अलग-अलग इलाकों में उन्हें तलाश रहे हैं, लेकिन हर जगह से निराशा ही हाथ लगी है। बुधन साह के बड़े बेटे ने उस दिन का खौफनाक मंजर अपनी आंखों से देखा था। वह अपने पिता को साथ लेकर काम के लिए पहाड़ की तरफ गया था। डेरा से करीब 5 किलोमीटर ऊपर पहुंचने के बाद अचानक उसकी मां का फोन आया। फोन पर मां सिर्फ इतना कह रही थीं- ‘जल्दी भागो, चीन की तरफ से बहुत तेजी से पानी आ रहा है।’ बेटे ने मां से कहा कि वे भी घर छोड़कर किसी ऊंची जगह पर चली जाएं। लेकिन इसके बाद फोन कट गया। दोबारा संपर्क की कोशिश हुई, कुछ मिनट के लिए फोन लगा भी, लेकिन फिर नेटवर्क चला गया। इसके बाद मोबाइल स्विच ऑफ बताने लगा। नौ दिन बीत गए, लेकिन मां समेत परिवार के कई सदस्यों का अब तक पता नहीं चल सका है। सुबह 7 बजे पिता को साथ लेकर निकले थे, 9 बजे काम शुरू होना था बुधन साह के बड़े बेटे ने बताया कि जिस दिन नेपाल में आपदा आई, उस सुबह परिवार के सभी लोग साथ थे। वह अपने पिता को लेकर काम करने के लिए पहाड़ की तरफ गया था। सुबह करीब 7 बजे वे लोग अपने डेरे से निकले थे। डेरा से लगभग 5 किलोमीटर ऊपर पहाड़ पर जाने के बाद करीब 9 बजे काम शुरू होना था। उस समय परिवार को अंदाजा भी नहीं था कि कुछ ही देर बाद उनके घर और आसपास के पूरे इलाके पर ऐसी आफत आने वाली है, जो सबकुछ तबाह कर देगी। बेटे ने बताया कि वह अपने पिता को साथ लेकर पहाड़ पर पहुंच गया था। परिवार के दूसरे सदस्य नीचे ही थे। इसी दौरान उसकी मां का फोन आया। उन्होंने घबराई आवाज में बताया कि चीन की तरफ से बहुत तेजी से पानी आ रहा है और हालात खराब होते जा रहे हैं। बेटे ने फोन पर मां से कहा कि वह किसी का इंतजार न करें और तुरंत वहां से निकल जाएं। उसने कहा कि अगर संभव हो तो जरूरी सामान लेकर निकलें, लेकिन सबसे पहले अपनी जान बचाएं। पहाड़ से देखा तो पांच मंजिल तक पहुंच रहा था पानी बड़े बेटे के मुताबिक, पहाड़ पर पहुंचने के बाद जब उसने नीचे की तरफ देखा तो पानी का मंजर देखकर उसके होश उड़ गए। पानी इतनी तेजी से बढ़ रहा था कि कई जगह पांच मंजिला मकानों के ऊपर तक पानी पहुंचता हुआ दिखाई दे रहा था। इलाके के घरों में पानी घुस चुका था। चारों तरफ अफरा-तफरी का माहौल था। लोग अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भाग रहे थे। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि पानी कहां तक पहुंचेगा और कितनी देर में पूरा इलाका इसकी चपेट में आ जाएगा। बेटे ने दोबारा अपनी मां को फोन किया और कहा कि पानी बहुत तेजी से आ रहा है। उन्होंने परिवार के लोगों से तुरंत वहां से निकलने को कहा। लेकिन इसी दौरान फोन कट गया। उसने बताया कि इसके बाद उसने लगातार दो-तीन बार फोन किया। करीब दो-चार मिनट बाद एक बार फोन लगा, लेकिन उसके बाद नेटवर्क पूरी तरह गायब हो गया। कुछ देर बाद मां का मोबाइल स्विच ऑफ बताने लगा। इसके बाद आज तक उनसे कोई संपर्क नहीं हो पाया है। ‘65 किलोमीटर दूर था पानी, 13 मिनट में पहुंच गया’ बुधन साह के बेटे ने पानी की रफ्तार का अंदाजा बताते हुए कहा कि जिस इलाके से पानी आने की सूचना मिली थी, वह उनके डेरे से करीब 65 किलोमीटर दूर था। सामान्य स्थिति में बाइक से वहां पहुंचने में करीब दो घंटे का समय लगता है। लेकिन उस दिन पानी इतनी भयावह रफ्तार से बढ़ा कि उनके अनुमान के मुताबिक करीब 13 मिनट में पानी उनके इलाके तक पहुंच गया। उसने कहा कि पानी की रफ्तार देखकर ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने पूरे इलाके को बहा देने के लिए पानी का सैलाब छोड़ दिया हो। लोगों को संभलने और सुरक्षित जगह पहुंचने तक का मौका नहीं मिला। 100-150 घरों में मुश्किल से 2-3 बचे जिस जगह बुधन साह का परिवार रहता था, वहां करीब 100 से 150 घर थे। बाढ़ के बाद उस इलाके की तस्वीर पूरी तरह बदल गई। परिवार के अनुसार, वहां मुश्किल से दो-तीन घर ही बच पाए हैं। बाकी मकान पानी और मलबे में तबाह हो गए। जिस जगह कभी घरों से लोगों की आवाजें आती थीं, वहां अब मिट्टी, मलबा और दलदल दिखाई देता है। बेटे ने बताया कि उस इलाके में करीब 4 से 5 हजार लोगों की आबादी थी। लेकिन आपदा के बाद अब वहां मुश्किल से 12-13 लोगों के बचे होने की जानकारी मिल रही है। बड़ी संख्या में लोग लापता हैं और उनके बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पा रही है। तीन दिन बाद पहुंचे तो घर-दुकान सब मलबे में दबे थे आपदा के करीब तीन दिन बाद बुधन साह के परिवार के लोग उस इलाके में पहुंचे, जहां उनका डेरा था। ऊंचाई वाले इलाके से नीचे आने और वहां पहुंचने में भी काफी समय लगा। तीन दिन बाद जब वे वहां पहुंचे तो उनके सामने तबाही का ऐसा मंजर था, जिसकी उन्होंने कल्पना तक नहीं की थी। पूरा इलाका मिट्टी और मलबे से पटा हुआ था। घर, दुकानें और लोगों का सामान सब पानी की चपेट में आ चुके थे। परिवार के मुताबिक, कई जगह चार से पांच मंजिला मकान तक मिट्टी और मलबे में दबे हुए थे। पक्के मकानों को भी पानी ने नहीं छोड़ा। कई इमारतें पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गईं। बेटे ने कहा कि जहां हजारों लोग रहते थे, वहां उन्हें एक भी सामान्य व्यक्ति दिखाई नहीं दिया। चारों तरफ सिर्फ पुलिस और प्रशासन के लोग नजर आ रहे थे। नारायणगढ़ से पोखरा तक तलाश, कहीं नहीं मिला परिवार परिजनों ने लापता सदस्यों की तलाश में कोई कसर नहीं छोड़ी। परिवार के लोग नारायणगढ़, चितवन, धादिंग, गंडक, काठमांडू और पोखरा तक जा चुके हैं। जहां-जहां किसी के सुरक्षित मिलने की उम्मीद थी, वहां जाकर पता किया। अस्पतालों और दूसरे संभावित स्थानों पर भी जानकारी जुटाई गई। लेकिन अभी तक परिवार के किसी लापता सदस्य का पता नहीं चल पाया है। बड़े बेटे ने कहा कि शुरुआती एक-दो दिनों में परिवार को पूरा भरोसा था कि शायद मां और दूसरे लोग किसी ऊंची जगह पर चले गए होंगे और सुरक्षित होंगे। उन्हें उम्मीद थी कि जैसे ही रास्ते और नेटवर्क की स्थिति सामान्य होगी, परिवार से संपर्क हो जाएगा। लेकिन एक दिन, दो दिन करते-करते नौ दिन बीत गए। लगातार तलाश के बावजूद कोई सुराग नहीं मिला। अब परिवार की उम्मीद धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगी है। ‘शादी के चार साल बाद इस बार बहन से राखी बंधवानी थी’ इस त्रासदी में परिवार के लिए सबसे बड़ा दर्द अपनी शादीशुदा बहन के लापता होने का भी है। बड़े बेटे ने बताया कि उसकी बहन शादीशुदा थी और घटना से करीब 15-16 दिन पहले ही परिवार से मिलने आई थी। वह बचपन से नेपाल के उसी इलाके में रही थी। करीब 7-8 साल की उम्र से वहीं रह रही थी और बाद में उसकी शादी भी वहीं हुई। भाई ने बताया कि शादी के करीब चार साल में बहन ने उसे एक बार भी राखी नहीं बांधी थी। इस बार उसने खास तौर पर बहन से कहा था कि वह राखी के लिए आए और इस बार उसे राखी बांधे। बहन परिवार के साथ थी, लेकिन आपदा के बाद उसका भी कोई पता नहीं चल रहा है। जिस भाई को इस बार बहन के हाथ से राखी बांधवाने की उम्मीद थी, वह अब उसकी तलाश में दर-दर भटक रहा है। ‘पहले लगता था कोई न कोई बच गया होगा, अब उम्मीद टूट रही’ बुधन साह के बेटे ने कहा कि शुरुआत में उन्हें उम्मीद थी कि परिवार के लोग किसी तरह अपनी जान बचाकर किसी सुरक्षित जगह पहुंचे होंगे। इतनी बड़ी आपदा में कई लोग ऊंचे इलाकों में चले गए होंगे, ऐसा परिवार को लगता था। लेकिन नौ दिन बाद भी जब किसी का कोई सुराग नहीं मिला तो परिवार की चिंता बढ़ गई है। उसने कहा कि पुरुष शायद किसी तरह तेज पानी से भागकर सुरक्षित जगह पहुंच भी गए हों, लेकिन परिवार की महिलाओं के लिए इतनी तेज रफ्तार से भागना मुश्किल था। इसी वजह से उनकी चिंता और ज्यादा बढ़ गई है। परिवार लगातार अपनों के लौटने की उम्मीद कर रहा है, लेकिन हर गुजरते दिन के साथ यह उम्मीद कमजोर होती जा रही है। छोटी बहन का भी नहीं मिला पता, अंतिम संस्कार की तैयारी की खबर बुधन साह की छोटी बेटी का भी कई दिनों तक पता नहीं चला। अब उसके ससुराल वालों की ओर से अंतिम संस्कार की तैयारी किए जाने की बात सामने आ रही है। परिवार के अनुसार, वहां भी सबकुछ बर्बाद हो चुका है। इस खबर के बाद बुधन साह की हिम्मत भी टूट गई है। जिस पिता को अपने परिवार के लोगों की तलाश करनी थी, अब उन्हें अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए जाना पड़ रहा है। परिवार के लिए यह स्थिति किसी दूसरी त्रासदी से कम नहीं है। एक तरफ कई परिजनों का कोई सुराग नहीं है, दूसरी तरफ जिनके बारे में अंतिम संस्कार की तैयारी की खबर मिल रही है, उन्हें आखिरी विदाई देने की मजबूरी सामने आ गई है। ‘सरकार हमारे परिवार की मदद करे, अब नेपाल जाने की हिम्मत नहीं’ बुधन साह की बेटी रानी कुमारी ने सरकार से मदद की गुहार लगाई है। उन्होंने कहा कि जो हो चुका है, उसे बदला नहीं जा सकता, लेकिन अब सरकार उनके परिवार की मदद करे और लापता परिजनों की तलाश में सहयोग दे। रानी ने कहा कि भारत सरकार और नेपाल सरकार दोनों को इस मामले को गंभीरता से लेना चाहिए। परिवार को हर संभव मदद मिलनी चाहिए और लापता लोगों की तलाश में सहयोग किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि परिवार वर्षों से नेपाल में रहकर अपना जीवन चला रहा था। वहां किराने की दुकान थी और उसी से परिवार का गुजारा होता था। करीब 15-16 वर्षों से नेपाल से परिवार का संबंध रहा है। लेकिन इस त्रासदी ने अब उनके मन में नेपाल लौटने का डर पैदा कर दिया है। ‘अब नेपाल नहीं जाना चाहती, भारत में काम मिला तो यहीं रहूंगी’ रानी कुमारी ने साफ कहा कि अब वह दोबारा रोजगार के लिए नेपाल नहीं जाना चाहतीं। उन्होंने कहा कि नेपाल में जो कुछ उन्होंने देखा और झेला, उसके बाद वहां लौटने की हिम्मत नहीं है। उनकी इच्छा है कि भारत में ही कोई अच्छा काम मिल जाए, ताकि वह अपने परिवार का खर्च चला सकें। उन्होंने कहा कि नेपाल उनके परिवार के लिए सिर्फ रोजगार की जगह नहीं था। वहीं रहकर परिवार ने करीब डेढ़ दशक से ज्यादा समय बिताया था। किराने की दुकान से घर चलता था और उसी जगह से परिवार की रोजमर्रा की जिंदगी जुड़ी थी। लेकिन एक दिन आई बाढ़ ने वर्षों की मेहनत, घर-दुकान और सामान के साथ परिवार की खुशियां भी छीन लीं। ‘लोग सामान नहीं, सिर्फ जान बचाने के लिए भाग रहे थे’ रानी ने उस समय की स्थिति बताते हुए कहा कि पानी तेजी से बढ़ने के बाद पूरे इलाके में अफरा-तफरी मच गई थी। लोग अपने घरों और दुकानों से निकलकर सुरक्षित जगह की ओर भाग रहे थे। किसी को पैसे, सामान या दुकान की चिंता नहीं थी। हर व्यक्ति की कोशिश सिर्फ अपनी जान बचाने की थी। रास्तों में पानी भर चुका था। गाड़ियां और दूसरी चीजें पानी में बह रही थीं। रानी ने बताया कि वह लोग भी किसी तरह वहां से निकलकर ऊंची जगह की तरफ गए। लेकिन उस समय सबसे बड़ी चिंता अपने माता-पिता की थी। उन्होंने लगातार मां-पिता को फोन करने की कोशिश की, लेकिन संपर्क नहीं हो पाया। कभी फोन बंद बता रहा था तो कभी नेटवर्क नहीं मिल रहा था। रक्षाबंधन के लिए जाने वाली थीं, लेकिन उससे पहले आ गई त्रासदी रानी ने बताया कि परिवार के लोगों से मिलने और रक्षाबंधन के लिए नेपाल जाने की योजना थी। करीब एक सप्ताह बाद वहां जाने की बात थी। लेकिन उससे पहले ही नेपाल में ऐसी त्रासदी आ गई कि पूरी योजना बदल गई। जिस जगह परिवार से मिलने और त्योहार मनाने जाना था, अब वहां अपने लोगों को तलाशने की मजबूरी है। रानी कहती हैं कि कभी नेपाल जाना परिवार के लिए रोजी-रोटी और अपनों से मिलने की वजह था, लेकिन अब उसी नेपाल का नाम सुनकर त्रासदी का मंजर आंखों के सामने आ जाता है। 15-16 साल का रिश्ता एक सैलाब में उजड़ गया बुधन साह के परिवार ने नेपाल में करीब 15-16 साल बिताए। किराने की दुकान चलाकर परिवार का गुजारा होता था। बच्चों का जीवन, रिश्ते और रोजी-रोटी इसी जगह से जुड़ी थी। लेकिन एक भयावह सैलाब ने देखते ही देखते सबकुछ बदल दिया। अब परिवार के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि उनके लापता परिजन कहां हैं? नौ दिन बीत चुके हैं। फोन बंद हैं, संपर्क टूट चुका है और जिन जगहों पर तलाश की जा सकती थी, वहां भी परिवार पहुंच चुका है। फिर भी कोई खबर नहीं मिली। परिवार अब सरकार से सिर्फ आर्थिक मदद नहीं, बल्कि अपने लापता परिजनों की तलाश और उन्हें सुरक्षित घर तक पहुंचाने में मदद की उम्मीद कर रहा है। बुधन साह के बेटे के शब्दों में उस त्रासदी का डर आज भी जिंदा है- पहाड़ से दिखाई देता पानी, पांच मंजिला मकानों को डुबोता सैलाब, कुछ ही मिनटों में तबाह होता पूरा इलाका और फोन पर मां की वह आखिरी घबराई हुई आवाज- ‘जल्दी भागो, पानी बहुत तेजी से आ रहा है…।’ नौ दिन बाद भी परिवार उस आवाज का जवाब तलाश रहा है। ‘मां फोन पर चिल्ला रही थीं- पानी बहुत तेजी से आ रहा है, भागो…’, 9 दिन बाद भी परिवार का पता नहीं; पहाड़ से बेटे ने देखा तबाही का मंजर 65 किमी दूर से आया सैलाब, करीब 13 मिनट में तबाह कर दिया पूरा इलाका; 100-150 घरों में मुश्किल से 2-3 बचे, 4-5 हजार की आबादी में अब सिर्फ 12-13 लोगों के बचने की जानकारी नेपाल में आई भीषण बाढ़ और सैलाब ने हजारों परिवारों की जिंदगी पलट दी। देखते ही देखते घर, दुकानें, सामान और वर्षों की जमा-पूंजी पानी और मलबे में समा गई। इस त्रासदी में रक्सौल के रहने वाले बुधन साह के परिवार पर भी ऐसा कहर टूटा कि अब नौ दिन बाद भी उनके कई परिजनों का कोई सुराग नहीं है। परिवार के लोग नेपाल के अलग-अलग इलाकों में उन्हें तलाश रहे हैं, लेकिन हर जगह से निराशा ही हाथ लगी है। बुधन साह के बड़े बेटे ने उस दिन का खौफनाक मंजर अपनी आंखों से देखा था। वह अपने पिता को साथ लेकर काम के लिए पहाड़ की तरफ गया था। डेरा से करीब 5 किलोमीटर ऊपर पहुंचने के बाद अचानक उसकी मां का फोन आया। फोन पर मां सिर्फ इतना कह रही थीं- ‘जल्दी भागो, चीन की तरफ से बहुत तेजी से पानी आ रहा है।’ बेटे ने मां से कहा कि वे भी घर छोड़कर किसी ऊंची जगह पर चली जाएं। लेकिन इसके बाद फोन कट गया। दोबारा संपर्क की कोशिश हुई, कुछ मिनट के लिए फोन लगा भी, लेकिन फिर नेटवर्क चला गया। इसके बाद मोबाइल स्विच ऑफ बताने लगा। नौ दिन बीत गए, लेकिन मां समेत परिवार के कई सदस्यों का अब तक पता नहीं चल सका है। सुबह 7 बजे पिता को साथ लेकर निकले थे, 9 बजे काम शुरू होना था बुधन साह के बड़े बेटे ने बताया कि जिस दिन नेपाल में आपदा आई, उस सुबह परिवार के सभी लोग साथ थे। वह अपने पिता को लेकर काम करने के लिए पहाड़ की तरफ गया था। सुबह करीब 7 बजे वे लोग अपने डेरे से निकले थे। डेरा से लगभग 5 किलोमीटर ऊपर पहाड़ पर जाने के बाद करीब 9 बजे काम शुरू होना था। उस समय परिवार को अंदाजा भी नहीं था कि कुछ ही देर बाद उनके घर और आसपास के पूरे इलाके पर ऐसी आफत आने वाली है, जो सबकुछ तबाह कर देगी। बेटे ने बताया कि वह अपने पिता को साथ लेकर पहाड़ पर पहुंच गया था। परिवार के दूसरे सदस्य नीचे ही थे। इसी दौरान उसकी मां का फोन आया। उन्होंने घबराई आवाज में बताया कि चीन की तरफ से बहुत तेजी से पानी आ रहा है और हालात खराब होते जा रहे हैं। बेटे ने फोन पर मां से कहा कि वह किसी का इंतजार न करें और तुरंत वहां से निकल जाएं। उसने कहा कि अगर संभव हो तो जरूरी सामान लेकर निकलें, लेकिन सबसे पहले अपनी जान बचाएं। पहाड़ से देखा तो पांच मंजिल तक पहुंच रहा था पानी बड़े बेटे के मुताबिक, पहाड़ पर पहुंचने के बाद जब उसने नीचे की तरफ देखा तो पानी का मंजर देखकर उसके होश उड़ गए। पानी इतनी तेजी से बढ़ रहा था कि कई जगह पांच मंजिला मकानों के ऊपर तक पानी पहुंचता हुआ दिखाई दे रहा था। इलाके के घरों में पानी घुस चुका था। चारों तरफ अफरा-तफरी का माहौल था। लोग अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भाग रहे थे। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि पानी कहां तक पहुंचेगा और कितनी देर में पूरा इलाका इसकी चपेट में आ जाएगा। बेटे ने दोबारा अपनी मां को फोन किया और कहा कि पानी बहुत तेजी से आ रहा है। उन्होंने परिवार के लोगों से तुरंत वहां से निकलने को कहा। लेकिन इसी दौरान फोन कट गया। उसने बताया कि इसके बाद उसने लगातार दो-तीन बार फोन किया। करीब दो-चार मिनट बाद एक बार फोन लगा, लेकिन उसके बाद नेटवर्क पूरी तरह गायब हो गया। कुछ देर बाद मां का मोबाइल स्विच ऑफ बताने लगा। इसके बाद आज तक उनसे कोई संपर्क नहीं हो पाया है। ‘65 किलोमीटर दूर था पानी, 13 मिनट में पहुंच गया’ बुधन साह के बेटे ने पानी की रफ्तार का अंदाजा बताते हुए कहा कि जिस इलाके से पानी आने की सूचना मिली थी, वह उनके डेरे से करीब 65 किलोमीटर दूर था। सामान्य स्थिति में बाइक से वहां पहुंचने में करीब दो घंटे का समय लगता है। लेकिन उस दिन पानी इतनी भयावह रफ्तार से बढ़ा कि उनके अनुमान के मुताबिक करीब 13 मिनट में पानी उनके इलाके तक पहुंच गया। उसने कहा कि पानी की रफ्तार देखकर ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने पूरे इलाके को बहा देने के लिए पानी का सैलाब छोड़ दिया हो। लोगों को संभलने और सुरक्षित जगह पहुंचने तक का मौका नहीं मिला। 100-150 घरों में मुश्किल से 2-3 बचे जिस जगह बुधन साह का परिवार रहता था, वहां करीब 100 से 150 घर थे। बाढ़ के बाद उस इलाके की तस्वीर पूरी तरह बदल गई। परिवार के अनुसार, वहां मुश्किल से दो-तीन घर ही बच पाए हैं। बाकी मकान पानी और मलबे में तबाह हो गए। जिस जगह कभी घरों से लोगों की आवाजें आती थीं, वहां अब मिट्टी, मलबा और दलदल दिखाई देता है। बेटे ने बताया कि उस इलाके में करीब 4 से 5 हजार लोगों की आबादी थी। लेकिन आपदा के बाद अब वहां मुश्किल से 12-13 लोगों के बचे होने की जानकारी मिल रही है। बड़ी संख्या में लोग लापता हैं और उनके बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पा रही है। तीन दिन बाद पहुंचे तो घर-दुकान सब मलबे में दबे थे आपदा के करीब तीन दिन बाद बुधन साह के परिवार के लोग उस इलाके में पहुंचे, जहां उनका डेरा था। ऊंचाई वाले इलाके से नीचे आने और वहां पहुंचने में भी काफी समय लगा। तीन दिन बाद जब वे वहां पहुंचे तो उनके सामने तबाही का ऐसा मंजर था, जिसकी उन्होंने कल्पना तक नहीं की थी। पूरा इलाका मिट्टी और मलबे से पटा हुआ था। घर, दुकानें और लोगों का सामान सब पानी की चपेट में आ चुके थे। परिवार के मुताबिक, कई जगह चार से पांच मंजिला मकान तक मिट्टी और मलबे में दबे हुए थे। पक्के मकानों को भी पानी ने नहीं छोड़ा। कई इमारतें पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गईं। बेटे ने कहा कि जहां हजारों लोग रहते थे, वहां उन्हें एक भी सामान्य व्यक्ति दिखाई नहीं दिया। चारों तरफ सिर्फ पुलिस और प्रशासन के लोग नजर आ रहे थे। नारायणगढ़ से पोखरा तक तलाश, कहीं नहीं मिला परिवार परिजनों ने लापता सदस्यों की तलाश में कोई कसर नहीं छोड़ी। परिवार के लोग नारायणगढ़, चितवन, धादिंग, गंडक, काठमांडू और पोखरा तक जा चुके हैं। जहां-जहां किसी के सुरक्षित मिलने की उम्मीद थी, वहां जाकर पता किया। अस्पतालों और दूसरे संभावित स्थानों पर भी जानकारी जुटाई गई। लेकिन अभी तक परिवार के किसी लापता सदस्य का पता नहीं चल पाया है। बड़े बेटे ने कहा कि शुरुआती एक-दो दिनों में परिवार को पूरा भरोसा था कि शायद मां और दूसरे लोग किसी ऊंची जगह पर चले गए होंगे और सुरक्षित होंगे। उन्हें उम्मीद थी कि जैसे ही रास्ते और नेटवर्क की स्थिति सामान्य होगी, परिवार से संपर्क हो जाएगा। लेकिन एक दिन, दो दिन करते-करते नौ दिन बीत गए। लगातार तलाश के बावजूद कोई सुराग नहीं मिला। अब परिवार की उम्मीद धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगी है। ‘शादी के चार साल बाद इस बार बहन से राखी बंधवानी थी’ इस त्रासदी में परिवार के लिए सबसे बड़ा दर्द अपनी शादीशुदा बहन के लापता होने का भी है। बड़े बेटे ने बताया कि उसकी बहन शादीशुदा थी और घटना से करीब 15-16 दिन पहले ही परिवार से मिलने आई थी। वह बचपन से नेपाल के उसी इलाके में रही थी। करीब 7-8 साल की उम्र से वहीं रह रही थी और बाद में उसकी शादी भी वहीं हुई। भाई ने बताया कि शादी के करीब चार साल में बहन ने उसे एक बार भी राखी नहीं बांधी थी। इस बार उसने खास तौर पर बहन से कहा था कि वह राखी के लिए आए और इस बार उसे राखी बांधे। बहन परिवार के साथ थी, लेकिन आपदा के बाद उसका भी कोई पता नहीं चल रहा है। जिस भाई को इस बार बहन के हाथ से राखी बांधवाने की उम्मीद थी, वह अब उसकी तलाश में दर-दर भटक रहा है। ‘पहले लगता था कोई न कोई बच गया होगा, अब उम्मीद टूट रही’ बुधन साह के बेटे ने कहा कि शुरुआत में उन्हें उम्मीद थी कि परिवार के लोग किसी तरह अपनी जान बचाकर किसी सुरक्षित जगह पहुंचे होंगे। इतनी बड़ी आपदा में कई लोग ऊंचे इलाकों में चले गए होंगे, ऐसा परिवार को लगता था। लेकिन नौ दिन बाद भी जब किसी का कोई सुराग नहीं मिला तो परिवार की चिंता बढ़ गई है। उसने कहा कि पुरुष शायद किसी तरह तेज पानी से भागकर सुरक्षित जगह पहुंच भी गए हों, लेकिन परिवार की महिलाओं के लिए इतनी तेज रफ्तार से भागना मुश्किल था। इसी वजह से उनकी चिंता और ज्यादा बढ़ गई है। परिवार लगातार अपनों के लौटने की उम्मीद कर रहा है, लेकिन हर गुजरते दिन के साथ यह उम्मीद कमजोर होती जा रही है। छोटी बहन का भी नहीं मिला पता, अंतिम संस्कार की तैयारी की खबर बुधन साह की छोटी बेटी का भी कई दिनों तक पता नहीं चला। अब उसके ससुराल वालों की ओर से अंतिम संस्कार की तैयारी किए जाने की बात सामने आ रही है। परिवार के अनुसार, वहां भी सबकुछ बर्बाद हो चुका है। इस खबर के बाद बुधन साह की हिम्मत भी टूट गई है। जिस पिता को अपने परिवार के लोगों की तलाश करनी थी, अब उन्हें अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए जाना पड़ रहा है। परिवार के लिए यह स्थिति किसी दूसरी त्रासदी से कम नहीं है। एक तरफ कई परिजनों का कोई सुराग नहीं है, दूसरी तरफ जिनके बारे में अंतिम संस्कार की तैयारी की खबर मिल रही है, उन्हें आखिरी विदाई देने की मजबूरी सामने आ गई है। ‘सरकार हमारे परिवार की मदद करे, अब नेपाल जाने की हिम्मत नहीं’ बुधन साह की बेटी रानी कुमारी ने सरकार से मदद की गुहार लगाई है। उन्होंने कहा कि जो हो चुका है, उसे बदला नहीं जा सकता, लेकिन अब सरकार उनके परिवार की मदद करे और लापता परिजनों की तलाश में सहयोग दे। रानी ने कहा कि भारत सरकार और नेपाल सरकार दोनों को इस मामले को गंभीरता से लेना चाहिए। परिवार को हर संभव मदद मिलनी चाहिए और लापता लोगों की तलाश में सहयोग किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि परिवार वर्षों से नेपाल में रहकर अपना जीवन चला रहा था। वहां किराने की दुकान थी और उसी से परिवार का गुजारा होता था। करीब 15-16 वर्षों से नेपाल से परिवार का संबंध रहा है। लेकिन इस त्रासदी ने अब उनके मन में नेपाल लौटने का डर पैदा कर दिया है। ‘अब नेपाल नहीं जाना चाहती, भारत में काम मिला तो यहीं रहूंगी’ रानी कुमारी ने साफ कहा कि अब वह दोबारा रोजगार के लिए नेपाल नहीं जाना चाहतीं। उन्होंने कहा कि नेपाल में जो कुछ उन्होंने देखा और झेला, उसके बाद वहां लौटने की हिम्मत नहीं है। उनकी इच्छा है कि भारत में ही कोई अच्छा काम मिल जाए, ताकि वह अपने परिवार का खर्च चला सकें। उन्होंने कहा कि नेपाल उनके परिवार के लिए सिर्फ रोजगार की जगह नहीं था। वहीं रहकर परिवार ने करीब डेढ़ दशक से ज्यादा समय बिताया था। किराने की दुकान से घर चलता था और उसी जगह से परिवार की रोजमर्रा की जिंदगी जुड़ी थी। लेकिन एक दिन आई बाढ़ ने वर्षों की मेहनत, घर-दुकान और सामान के साथ परिवार की खुशियां भी छीन लीं। ‘लोग सामान नहीं, सिर्फ जान बचाने के लिए भाग रहे थे’ रानी ने उस समय की स्थिति बताते हुए कहा कि पानी तेजी से बढ़ने के बाद पूरे इलाके में अफरा-तफरी मच गई थी। लोग अपने घरों और दुकानों से निकलकर सुरक्षित जगह की ओर भाग रहे थे। किसी को पैसे, सामान या दुकान की चिंता नहीं थी। हर व्यक्ति की कोशिश सिर्फ अपनी जान बचाने की थी। रास्तों में पानी भर चुका था। गाड़ियां और दूसरी चीजें पानी में बह रही थीं। रानी ने बताया कि वह लोग भी किसी तरह वहां से निकलकर ऊंची जगह की तरफ गए। लेकिन उस समय सबसे बड़ी चिंता अपने माता-पिता की थी। उन्होंने लगातार मां-पिता को फोन करने की कोशिश की, लेकिन संपर्क नहीं हो पाया। कभी फोन बंद बता रहा था तो कभी नेटवर्क नहीं मिल रहा था। रक्षाबंधन के लिए जाने वाली थीं, लेकिन उससे पहले आ गई त्रासदी रानी ने बताया कि परिवार के लोगों से मिलने और रक्षाबंधन के लिए नेपाल जाने की योजना थी। करीब एक सप्ताह बाद वहां जाने की बात थी। लेकिन उससे पहले ही नेपाल में ऐसी त्रासदी आ गई कि पूरी योजना बदल गई। जिस जगह परिवार से मिलने और त्योहार मनाने जाना था, अब वहां अपने लोगों को तलाशने की मजबूरी है। रानी कहती हैं कि कभी नेपाल जाना परिवार के लिए रोजी-रोटी और अपनों से मिलने की वजह था, लेकिन अब उसी नेपाल का नाम सुनकर त्रासदी का मंजर आंखों के सामने आ जाता है। 15-16 साल का रिश्ता एक सैलाब में उजड़ गया बुधन साह के परिवार ने नेपाल में करीब 15-16 साल बिताए। किराने की दुकान चलाकर परिवार का गुजारा होता था। बच्चों का जीवन, रिश्ते और रोजी-रोटी इसी जगह से जुड़ी थी। लेकिन एक भयावह सैलाब ने देखते ही देखते सबकुछ बदल दिया। अब परिवार के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि उनके लापता परिजन कहां हैं? नौ दिन बीत चुके हैं। फोन बंद हैं, संपर्क टूट चुका है और जिन जगहों पर तलाश की जा सकती थी, वहां भी परिवार पहुंच चुका है। फिर भी कोई खबर नहीं मिली। परिवार अब सरकार से सिर्फ आर्थिक मदद नहीं, बल्कि अपने लापता परिजनों की तलाश और उन्हें सुरक्षित घर तक पहुंचाने में मदद की उम्मीद कर रहा है। बुधन साह के बेटे के शब्दों में उस त्रासदी का डर आज भी जिंदा है- पहाड़ से दिखाई देता पानी, पांच मंजिला मकानों को डुबोता सैलाब, कुछ ही मिनटों में तबाह होता पूरा इलाका और फोन पर मां की वह आखिरी घबराई हुई आवाज- ‘जल्दी भागो, पानी बहुत तेजी से आ रहा है…।’ नौ दिन बाद भी परिवार उस आवाज का जवाब तलाश रहा है।

