कीड़ों और फफूंद से सड़ रहीं देह अजमेर के जेएलएन मेडिकल कॉलेज में देहदानियों की डेडबॉडी सड़ रही हैं। कॉलेज में जहां पर बॉडीज रखी जाती है, वहां सीलन, मिट्टी, धूल है। प्लास्टर गिर रहा है। ऐसे में शवों पर फंगस आ रहा है। न टैंक ढके हैं, ना इनमें पड़े शव पूरे केमिकल सॉल्यूशंस में डूबे हैं। अगर शव प्रेक्टिकल के लिए विद्यार्थियों को मिलेंगे, इससे उनमें भी संक्रमण का खतरा है। भास्कर ने शवों की स्थिति के फोटो एनाटोमी एक्सपर्ट के साथ साझा किए। फोटो देख वे चौंक गए। आपत्ति जताई- टैंक खुला क्यों है? शव केमिकल्स में डूबे हुए क्यों नहीं? फफूंद और फंगस दिख रही है। यहां एनाटॉमी विभाग के प्रोटोकॉल को नहीं माना गया है। मेडिकल कॉलेज के विद्यार्थियों ने बताया- प्रेक्टिकल स्टडी के लिए हर साल 25 बॉडी चाहिए, जबकि 4-5 बॉडीज पर स्टूडेंट्स पढ़ते हैं। फरवरी में शव में फंगस और कीड़े चलने की शिकायत कॉलेज प्रशासन से की थी, वही हालात बने हुए हैं। एंबाबलिंग रूम अनिवार्य होता है, जो यहां है ही नहीं। तस्वीर विचलित करेगी… इसलिए इसे 100% तक धुंधला कर छाप रहे हैं डेडबॉडी को खुले में बिल्कुल नहीं रख सकते, इतना ज्यादा खराब होने पर देह संक्रमण फैलाएगी यह ब्लैक फंगस नहीं, कीड़े है। बॉडी को खुले में नहीं, कवर करके रखा जाना चाहिए। खुले में बिल्कुल नहीं रख सकते हैं। यह कैमिकल सॉल्यूशन में डूबी होनी चाहिए। जो व्यक्ति ऐसी बॉडी के संपर्क में आएगा, उसे इंफेक्शन हो सकता है। सबसे ज्यादा खतरा, इनकी देखभाल करने वाले लोगों को है। फैकल्टीज और स्टूडेंट्स को इंफेक्शन हो सकता है। ऐसी बॉडी को कॉलेज प्रशासन को रखना ही नहीं चाहिए। यह इतनी ज्यादा खराब हो चुकी हैं कि इन्हें नष्ट कर देना चाहिए। यह अब ऐसी टेक्नोलॉजी और सॉल्यूशंस आ रहे हैं, जिनके इस्तेमाल से बॉडी को फार्मेलिन में रखने की आवश्यकता नहीं है। यह सॉल्शून इनोबाम है। – प्रोफेसर (डॉ.) कुमार सतीश रवि हेड डिपार्टमेंट ऑफ एनाटोमी एडिशनल प्रिंसिपल, निम्स मेडिकल कॉलेज ऐसे रखनी चाहिए देह
एसएमएस के एनाटॉमी डिपार्टमेंट के प्रोफेसर (डॉ.) धीरज सक्सेना बताते हैं- यहां सीमेंट-टाइल के बने 8 बाई 4 के 4 फीट गहरे 5 टैंक हैं। 36 देह संरक्षित है। सभी टैंक ढंके हैं। वॉल्व लगा है, जिससे केमिकल सॉल्यूशंस बदलते हैं। सॉल्यूशंस में स्प्रिरिट, ग्लिसरीन, फार्मेलिन मिलाया जाता है। एंटी फंगल कार्बोलिक एसिड मिलाते हैं। एम्बाल्मिंग रूम में बॉडी की शेविंग की जाती है। कॉलेज में बॉडी खराब नहीं हो रही है। रुटीन प्रोसिजर के तहत बॉडी को रखा जा रहा। डिस्केशन के बाद इंसिनरेटर मशीन में बायोमेडिकल वेस्ट की तरह डिस्पोज करते हैं। फरमिलीन से ट्रीट करते हैं। यहां कंक्रीट टैंक है। इनमें लीकेज की प्रॉब्लम हो सकती है। कॉलेज स्टील बॉडी टैंक की तरफ शिफ्ट कर रहे हैं। -डॉ. विकास सक्सेना, एचओडी, एनाटोमी डिपार्टमेंट, जेएलएन मेडिकल कालेज, अजमेर

