नेपाल बाढ़ से पहले मिल गए थे खतरे के संकेत! सैटेलाइट तस्वीरों में दिखे ग्लेशियर के बड़े बदलाव

नेपाल बाढ़ से पहले मिल गए थे खतरे के संकेत! सैटेलाइट तस्वीरों में दिखे ग्लेशियर के बड़े बदलाव

Nepal Flash Flood Warning Signs: नेपाल में पिछले सप्ताह आई बाढ़ से कुछ दिन पहले ही खतरे के संकेत मिल गए थे। वैज्ञानिकों के एक समूह हाई रिस्क कलेक्टिव ने इसको लेकर बड़ा दावा किया है। समूह ने कहा कि सैटेलाइट तस्वीरों में उस ग्लेशियर और आसपास के पहाड़ी क्षेत्र में असामान्य गतिविधियां दिखाई दी थी, जो बाद में बड़े हिमस्खलन और अचानक बाढ़ की वजह बना।

वैज्ञानिकों के समूह ने यह भी कहा कि यदि इन खतरों के संकेत को समय रहते हुए पहचानकर अधिकारियों तक पहुंचाया जाता तो नदी के निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को अलर्ट किया जा सकता था और संवेदनशील क्षेत्रों से लोगों को निकाला जा सकता था।

बाढ़ से पहले ग्लेशियर में दिखे थे बदलाव

ABC News की रिपोर्ट के अनुसार, वैज्ञानिकों ने आपदा से पहले की सैटेलाइट तस्वीरों का विश्लेषण किया। इसमें ग्लेशियर के भीतर पानी की गति बढ़ने के संकेत मिले। 

वैज्ञानिकों का मानना है कि यह इस बात का संकेत हो सकता है कि ग्लेशियर के अंदर कुछ बदलाव हो रहा था और आसपास की चट्टानों की स्थिरता भी प्रभावित हो रही थी।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि आपदा से करीब दो दिन पहले की तस्वीरों में दो और महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई दिए। पहला, ग्लेशियर क्षेत्र में मौजूद पिघला हुआ पानी सामान्य की तुलना में भूरा नजर आया। दूसरा, आसपास की पहाड़ी चट्टानों में एक दरार तेजी से बढ़ती हुई दिखाई दी।

7,234 मीटर ऊंचे पर्वत का हिस्सा ढहा

26 अगस्त को नेपाल के 7,234 मीटर ऊंचे लांगटांग लिरुंग पर्वत के उत्तरी हिस्से का एक बड़ा भाग अचानक ढह गया। पहाड़ का मलबा ग्लेशियर के एक बड़े हिस्से के साथ नीचे घाटी में आ गिरा। इसके बाद चट्टानों और बर्फ से बना विशाल मलबा तेज गति से नीचे की ओर बहा और देखते ही देखते एक विनाशकारी फ्लैश फ्लड में बदल गया। 

इस बाढ़ ने नेपाल की भोटे कोशी-त्रिशूली-नारायणी नदी प्रणाली के बड़े हिस्से और तिब्बत सीमा से लगे इलाकों में भारी तबाही मचाई।

क्या समय रहते बचाई जा सकती थीं जानें?

वैज्ञानिकों का कहना है कि सैटेलाइट तस्वीरों में मिले संकेत अपने आप में यह साबित नहीं करते कि कुछ ही समय में आपदा आने वाली है। हालांकि, ऐसे बदलावों की पहचान से संभावित खतरे का आकलन बेहतर तरीके से किया जा सकता है और समय रहते चेतावनी प्रणाली को सक्रिय किया जा सकता है।

वैज्ञानिकों के समूह के मुताबिक, नदी के निचले हिस्सों में 10 मिनट या उससे अधिक का चेतावनी समय भी प्रभावी साबित हो सकता था। इससे व्यापक चेतावनी जारी करने और संवेदनशील इलाकों में लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने में मदद मिल सकती थी।

वैज्ञानिकों का मानना है कि इस घटना ने हिमालय जैसे दुर्गम इलाकों में आपदा की निगरानी के लिए आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल की जरूरत को एक बार फिर सामने ला दिया है।

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