बिहार में मानसून के तीन महीने बीतने के बाद बारिश का आंकड़ा सामान्य से काफी पीछे है। 31 अगस्त तक राज्य में 775.7mm बारिश होनी चाहिए थी, लेकिन 469.3 mm बारिश हुई। यानी सामान्य से करीब 40% कम बारिश दर्ज की गई। इस साल मानसून की शुरुआत सामान्य समय के आसपास हुई, लेकिन इसके बाद लगातार कमजोर गतिविधि के कारण कम बारिश हुई। अब मानसून के अंतिम महीने सितंबर में भी बहुत बड़े सुधार के संकेत नहीं हैं। मानसून के 12 दिन पहले विदा होने की संभावना है। मौसम वैज्ञानिक आनंद शंकर के मुताबिक, वैश्विक मौसमी परिस्थितियां इस बार मानसून के लिए ज्यादा अनुकूल नहीं रहीं। इस वजह से बिहार में मानसून कमजोर बना रहा। सितंबर में भी राज्य में बारिश का वितरण एक जैसा नहीं रहेगा। दक्षिण बिहार में सामान्य से ज्यादा, जबकि उत्तर बिहार में सामान्य से कम बारिश होने की संभावना है। भास्कर की रिपोर्ट में जानिए, बीते तीन महीने में बारिश का ट्रेंड कैसा रहा? सितंबर में मौसम का मिजाज कैसा रहेगा? मानसून कमजोर रहने के 3 बड़े कारण क्या हैं? कम बारिश का खेती पर कितना असर पड़ा है? 11 जून को बिहार पहुंचा था मानसून इस बार बिहार में दक्षिण-पश्चिम मानसून ने 11 जून 2026 को दस्तक दी थी। समय से 4 दिन पहले मानसून बिहार पहुंचा था। शुरुआत के बाद कुछ समय तक बारिश की गतिविधियां बनी रहीं, लेकिन पूरे राज्य में लगातार और समान रूप से बारिश नहीं हो सकी। नतीजा जून से अगस्त तक बारिश सामान्य आंकड़े से काफी नीचे चली गई। IMD के अनुसार मानसून की वापसी सामान्य तौर पर सितंबर के बाद शुरू होती है और देश से पूरी तरह वापसी अक्टूबर के बाद होती है। तीन महीने में 40% कम बारिश बिहार में 1 जून से 31 अगस्त तक सामान्य बारिश 775.7mm होनी चाहिए थी। इसके मुकाबले सिर्फ 469.3mm बारिश दर्ज की गई। यानी राज्य में करीब 306.4 mm बारिश की कमी रही। सितंबर में उत्तर-दक्षिण बिहार का मौसम अलग रहेगा मौसम वैज्ञानिक आनंद शंकर के मुताबिक सितंबर में बिहार में मानसून की स्थिति बहुत मजबूत रहने की उम्मीद नहीं है। हालांकि राज्य के सभी हिस्सों में एक जैसा मौसम नहीं रहेगा। दक्षिण बिहार: सामान्य से ज्यादा बारिश के आसार हैं। इसमें 18 जिले (बक्सर, भोजपुर, रोहतास, कैमूर, औरंगाबाद, अरवल, पटना, गया, नालंदा, नवादा, जहानाबाद, शेखपुरा, लखीसराय, मुंगेर, जमुई, बांका, भागलपुर और बेगूसराय) शामिल हैं। उत्तर बिहार: सामान्य से कम बारिश की संभावना है। इसमें 20 जिले (पश्चिम चंपारण, पूर्वी चंपारण, गोपालगंज, सीवान, सारण, सीतामढ़ी, शिवहर, मुजफ्फरपुर, वैशाली, समस्तीपुर, दरभंगा, मधुबनी, सुपौल, अररिया, किशनगंज, पूर्णिया, कटिहार, मधेपुरा, सहरसा और खगड़िया) शामिल हैं। उत्तर बिहार में सितंबर में भी बारिश का वितरण असमान रहने की संभावना है। यानी किसी इलाके में अच्छी बारिश हो सकती है, जबकि कुछ जिलों में बारिश का इंतजार बना रह सकता है। मानसून कमजोर रहने के 4 बड़े कारण 1. अल नीनो का असर प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से ज्यादा रहने पर अल नीनो की स्थिति बनी। इसका असर भारत की मानसूनी हवाओं पर पड़ता है। इससे बारिश कम होती है। इस साल IMD ने भी मानसून के दौरान अल नीनो के और मजबूत होने का अनुमान जताया था। 2. मानसून के पक्ष में नहीं रहे ग्लोबल कंडीशन सिर्फ अल नीनो ही नहीं, बल्कि कई वैश्विक समुद्री और वायुमंडलीय परिस्थितियां इस साल मानसून के लिए ज्यादा अनुकूल नहीं रहीं। इससे मानसून की सक्रियता और बारिश वाले सिस्टम की ताकत प्रभावित हुई। 3. बारिश कराने वाले सिस्टम लगातार सक्रिय नहीं रहे बिहार में अच्छी बारिश के लिए निम्न दबाव क्षेत्र और मानसून ट्रफ जैसे सिस्टम का मजबूत रहना जरूरी है। इस बार ये सिस्टम लगातार सक्रिय नहीं रहे। इसलिए बारिश के बीच कई दिनों के लंबे गैप आए और मानसून कमजोर पड़ता गया। 4. बारिश का वितरण असमान रहा बारिश हुई भी तो पूरे बिहार में समान रूप से नहीं हुई। कुछ जिलों में अच्छी बारिश हुई, जबकि कई जिले लगातार कमी में रहे। जहां जरूरत थी, वहां पर्याप्त बारिश नहीं हुई। जहां हुई, वो भी राज्य के औसत आंकड़े को संभालने के लिए पर्याप्त नहीं रही। इसी वजह से 31 अगस्त तक बिहार में सामान्य से करीब 40% कम बारिश दर्ज हुई। कम बारिश का सबसे बड़ा असर किसानों पर कम बारिश का सीधा असर खरीफ फसल पर पड़ा है। धान, मक्का समेत खरीफ फसलों को जिस समय पर्याप्त नमी और पानी की जरूरत होती है, उस दौरान बारिश कम होने से सिंचाई का खर्च बढ़ा। बारिश की कमी ज्यादा लंबी चली तो उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है। कम बारिश से भूजल पर निर्भरता बढ़ी। खेतों की सिंचाई के लिए किसानों ने ज्यादा ट्यूबवेल और पंप का इस्तेमाल किया। इससे भूजल स्तर पर दबाव बढ़ा है। कम बारिश से ये 3 बड़े नुकसान 1- किसानों को नुकसान: पर्याप्त बारिश नहीं होने के चलते धान की फसल प्रभावित हुई है। धान के पौधों को बढ़ने के लिए ज्यादा पानी चाहिए। सिंचाई का खर्च बढ़ा है। 2- पानी का संकट: बारिश कम होने से जमीन में पानी का रिचार्ज कम होगा। इसका असर आगे चलकर भूजल और पेयजल उपलब्धता पर पड़ सकता है। 3- प्रदूषण बढ़ने का खतरा: बारिश वातावरण की धूल और कई प्रदूषकों को साफ करने में मदद करती है। लंबे समय तक बारिश कम होने पर धूल और प्रदूषण की समस्या बढ़ सकती है। अब जानिए किस जिले में कितनी कम हुई बारिश जहानाबाद सबसे ज्यादा प्रभावित जहानाबाद में सामान्य 647.8 mm बारिश होनी चाहिए थी, लेकिन सिर्फ 250.7 mm हुई। यानी 61% (397.1 mm) कम बारिश हुई। वहीं, किशनगंज में बिहार के जिलों में सबसे ज्यादा 942.2 mm बारिश हुई, फिर भी सामान्य 1391.7 mm के मुकाबले 32% कमी रही। दोनों जिलों में बारिश का अंतर 691.5 mm रहा। यह उत्तर-पूर्वी और दक्षिण बिहार के बीच बारिश के बड़े क्षेत्रीय अंतर को दिखाता है। पटना में सामान्य से करीब 50% कम बारिश बिहार में कमजोर मानसून का असर राजधानी पटना में भी साफ दिखाई दे रहा है। पटना में सामान्य तौर पर 683.6 mm बारिश होनी चाहिए थी, लेकिन 31 अगस्त तक 345.1 mm बारिश हुई है। यानी सामान्य के मुकाबले करीब 338.5 mm कम बारिश दर्ज की गई है। पटना में इस बार सामान्य बारिश की करीब आधी यानी 50.5% बारिश ही हुई, जबकि बारिश में करीब 49.5% की कमी रही। राजधानी का यह आंकड़ा बताता है कि राज्य में मानसून की स्थिति कितनी कमजोर रही है। बिहार में मानसून के तीन महीने बीतने के बाद बारिश का आंकड़ा सामान्य से काफी पीछे है। 31 अगस्त तक राज्य में 775.7mm बारिश होनी चाहिए थी, लेकिन 469.3 mm बारिश हुई। यानी सामान्य से करीब 40% कम बारिश दर्ज की गई। इस साल मानसून की शुरुआत सामान्य समय के आसपास हुई, लेकिन इसके बाद लगातार कमजोर गतिविधि के कारण कम बारिश हुई। अब मानसून के अंतिम महीने सितंबर में भी बहुत बड़े सुधार के संकेत नहीं हैं। मानसून के 12 दिन पहले विदा होने की संभावना है। मौसम वैज्ञानिक आनंद शंकर के मुताबिक, वैश्विक मौसमी परिस्थितियां इस बार मानसून के लिए ज्यादा अनुकूल नहीं रहीं। इस वजह से बिहार में मानसून कमजोर बना रहा। सितंबर में भी राज्य में बारिश का वितरण एक जैसा नहीं रहेगा। दक्षिण बिहार में सामान्य से ज्यादा, जबकि उत्तर बिहार में सामान्य से कम बारिश होने की संभावना है। भास्कर की रिपोर्ट में जानिए, बीते तीन महीने में बारिश का ट्रेंड कैसा रहा? सितंबर में मौसम का मिजाज कैसा रहेगा? मानसून कमजोर रहने के 3 बड़े कारण क्या हैं? कम बारिश का खेती पर कितना असर पड़ा है? 11 जून को बिहार पहुंचा था मानसून इस बार बिहार में दक्षिण-पश्चिम मानसून ने 11 जून 2026 को दस्तक दी थी। समय से 4 दिन पहले मानसून बिहार पहुंचा था। शुरुआत के बाद कुछ समय तक बारिश की गतिविधियां बनी रहीं, लेकिन पूरे राज्य में लगातार और समान रूप से बारिश नहीं हो सकी। नतीजा जून से अगस्त तक बारिश सामान्य आंकड़े से काफी नीचे चली गई। IMD के अनुसार मानसून की वापसी सामान्य तौर पर सितंबर के बाद शुरू होती है और देश से पूरी तरह वापसी अक्टूबर के बाद होती है। तीन महीने में 40% कम बारिश बिहार में 1 जून से 31 अगस्त तक सामान्य बारिश 775.7mm होनी चाहिए थी। इसके मुकाबले सिर्फ 469.3mm बारिश दर्ज की गई। यानी राज्य में करीब 306.4 mm बारिश की कमी रही। सितंबर में उत्तर-दक्षिण बिहार का मौसम अलग रहेगा मौसम वैज्ञानिक आनंद शंकर के मुताबिक सितंबर में बिहार में मानसून की स्थिति बहुत मजबूत रहने की उम्मीद नहीं है। हालांकि राज्य के सभी हिस्सों में एक जैसा मौसम नहीं रहेगा। दक्षिण बिहार: सामान्य से ज्यादा बारिश के आसार हैं। इसमें 18 जिले (बक्सर, भोजपुर, रोहतास, कैमूर, औरंगाबाद, अरवल, पटना, गया, नालंदा, नवादा, जहानाबाद, शेखपुरा, लखीसराय, मुंगेर, जमुई, बांका, भागलपुर और बेगूसराय) शामिल हैं। उत्तर बिहार: सामान्य से कम बारिश की संभावना है। इसमें 20 जिले (पश्चिम चंपारण, पूर्वी चंपारण, गोपालगंज, सीवान, सारण, सीतामढ़ी, शिवहर, मुजफ्फरपुर, वैशाली, समस्तीपुर, दरभंगा, मधुबनी, सुपौल, अररिया, किशनगंज, पूर्णिया, कटिहार, मधेपुरा, सहरसा और खगड़िया) शामिल हैं। उत्तर बिहार में सितंबर में भी बारिश का वितरण असमान रहने की संभावना है। यानी किसी इलाके में अच्छी बारिश हो सकती है, जबकि कुछ जिलों में बारिश का इंतजार बना रह सकता है। मानसून कमजोर रहने के 4 बड़े कारण 1. अल नीनो का असर प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से ज्यादा रहने पर अल नीनो की स्थिति बनी। इसका असर भारत की मानसूनी हवाओं पर पड़ता है। इससे बारिश कम होती है। इस साल IMD ने भी मानसून के दौरान अल नीनो के और मजबूत होने का अनुमान जताया था। 2. मानसून के पक्ष में नहीं रहे ग्लोबल कंडीशन सिर्फ अल नीनो ही नहीं, बल्कि कई वैश्विक समुद्री और वायुमंडलीय परिस्थितियां इस साल मानसून के लिए ज्यादा अनुकूल नहीं रहीं। इससे मानसून की सक्रियता और बारिश वाले सिस्टम की ताकत प्रभावित हुई। 3. बारिश कराने वाले सिस्टम लगातार सक्रिय नहीं रहे बिहार में अच्छी बारिश के लिए निम्न दबाव क्षेत्र और मानसून ट्रफ जैसे सिस्टम का मजबूत रहना जरूरी है। इस बार ये सिस्टम लगातार सक्रिय नहीं रहे। इसलिए बारिश के बीच कई दिनों के लंबे गैप आए और मानसून कमजोर पड़ता गया। 4. बारिश का वितरण असमान रहा बारिश हुई भी तो पूरे बिहार में समान रूप से नहीं हुई। कुछ जिलों में अच्छी बारिश हुई, जबकि कई जिले लगातार कमी में रहे। जहां जरूरत थी, वहां पर्याप्त बारिश नहीं हुई। जहां हुई, वो भी राज्य के औसत आंकड़े को संभालने के लिए पर्याप्त नहीं रही। इसी वजह से 31 अगस्त तक बिहार में सामान्य से करीब 40% कम बारिश दर्ज हुई। कम बारिश का सबसे बड़ा असर किसानों पर कम बारिश का सीधा असर खरीफ फसल पर पड़ा है। धान, मक्का समेत खरीफ फसलों को जिस समय पर्याप्त नमी और पानी की जरूरत होती है, उस दौरान बारिश कम होने से सिंचाई का खर्च बढ़ा। बारिश की कमी ज्यादा लंबी चली तो उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है। कम बारिश से भूजल पर निर्भरता बढ़ी। खेतों की सिंचाई के लिए किसानों ने ज्यादा ट्यूबवेल और पंप का इस्तेमाल किया। इससे भूजल स्तर पर दबाव बढ़ा है। कम बारिश से ये 3 बड़े नुकसान 1- किसानों को नुकसान: पर्याप्त बारिश नहीं होने के चलते धान की फसल प्रभावित हुई है। धान के पौधों को बढ़ने के लिए ज्यादा पानी चाहिए। सिंचाई का खर्च बढ़ा है। 2- पानी का संकट: बारिश कम होने से जमीन में पानी का रिचार्ज कम होगा। इसका असर आगे चलकर भूजल और पेयजल उपलब्धता पर पड़ सकता है। 3- प्रदूषण बढ़ने का खतरा: बारिश वातावरण की धूल और कई प्रदूषकों को साफ करने में मदद करती है। लंबे समय तक बारिश कम होने पर धूल और प्रदूषण की समस्या बढ़ सकती है। अब जानिए किस जिले में कितनी कम हुई बारिश जहानाबाद सबसे ज्यादा प्रभावित जहानाबाद में सामान्य 647.8 mm बारिश होनी चाहिए थी, लेकिन सिर्फ 250.7 mm हुई। यानी 61% (397.1 mm) कम बारिश हुई। वहीं, किशनगंज में बिहार के जिलों में सबसे ज्यादा 942.2 mm बारिश हुई, फिर भी सामान्य 1391.7 mm के मुकाबले 32% कमी रही। दोनों जिलों में बारिश का अंतर 691.5 mm रहा। यह उत्तर-पूर्वी और दक्षिण बिहार के बीच बारिश के बड़े क्षेत्रीय अंतर को दिखाता है। पटना में सामान्य से करीब 50% कम बारिश बिहार में कमजोर मानसून का असर राजधानी पटना में भी साफ दिखाई दे रहा है। पटना में सामान्य तौर पर 683.6 mm बारिश होनी चाहिए थी, लेकिन 31 अगस्त तक 345.1 mm बारिश हुई है। यानी सामान्य के मुकाबले करीब 338.5 mm कम बारिश दर्ज की गई है। पटना में इस बार सामान्य बारिश की करीब आधी यानी 50.5% बारिश ही हुई, जबकि बारिश में करीब 49.5% की कमी रही। राजधानी का यह आंकड़ा बताता है कि राज्य में मानसून की स्थिति कितनी कमजोर रही है।

