Grand Chess Tour Final जीतकर Praggnanandhaa ने रचा इतिहास, Caruana को मात देकर बने पहले भारतीय विजेता

Grand Chess Tour Final जीतकर Praggnanandhaa ने रचा इतिहास, Caruana को मात देकर बने पहले भारतीय विजेता

सेंट लुईस में गुरुवार देर रात फैबियानो करूआना को 15-13 से हराकर प्रज्ञानानंद ने ग्रैंड चेस टूर फाइनल का खिताब जीत लिया। इसके साथ ही वह इस प्रतियोगिता को जीतने वाले पहले भारतीय खिलाड़ी बन गए हैं। 11 साल के इतिहास में उनसे पहले केवल छह खिलाड़ी यह उपलब्धि हासिल कर सके हैं। खिताब के साथ उन्हें दो लाख अमेरिकी डॉलर की पुरस्कार राशि भी मिली।यह जीत इसलिए भी खास मानी जा रही है क्योंकि कुछ महीने पहले तक प्रज्ञानानंद का प्रदर्शन सवालों के घेरे में था। 2026 कैंडिडेट्स प्रतियोगिता में उनका अभियान उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा था। पांच बार के विश्व चैंपियन विश्वनाथन आनंद ने भी उस दौर को उनके लिए मुश्किल समय बताया है। आनंद के मुताबिक पिछले साल के अंत से ही प्रज्ञानानंद की लय कुछ कमजोर हुई थी और कैंडिडेट्स में उनका प्रदर्शन खास प्रभावी नहीं रहा।लेकिन इसके बाद 21 वर्षीय भारतीय खिलाड़ी ने जिस तरह वापसी की, उसने उन्हें एक बार फिर विश्व शतरंज के शीर्ष खिलाड़ियों की चर्चा में ला दिया है। आनंद ने यहां तक कहा है कि मौजूदा प्रदर्शन को देखते हुए प्रज्ञानानंद को इस समय दुनिया का नंबर एक खिलाड़ी माना जा सकता है। उन्होंने हालांकि यह भी स्पष्ट किया कि मैग्नस कार्लसन सभी समान प्रतियोगिताओं में हिस्सा नहीं लेते हैं, इसलिए यह तुलना पूरी तरह सीधी नहीं है।गौरतलब है कि प्रज्ञानानंद की वापसी किसी एक प्रतियोगिता तक सीमित नहीं रही। नॉर्वे शतरंज प्रतियोगिता में एक समय वह निचले स्थानों पर थे, लेकिन लगातार चार जीत दर्ज कर उन्होंने स्थिति बदल दी। इसके बाद ग्रैंड चेस टूर में उनका प्रदर्शन और मजबूत हुआ। सेंट लुईस पहुंचने से पहले वह रैपिड वर्ग जीत चुके थे और ब्लिट्ज में भी पर्याप्त अंक हासिल कर चुके थे।फाइनल में शुरुआत हालांकि उनके पक्ष में नहीं रही। फैबियानो करूआना के खिलाफ पहला शास्त्रीय मुकाबला हारने के बाद दूसरे मुकाबले में भी उन्हें बराबरी का अच्छा मौका गंवाना पड़ा। इसके बाद प्रज्ञानानंद ने रैपिड के दोनों मुकाबले जीतकर बढ़त बना ली। चार बाजियों के ब्लिट्ज वर्ग में दोनों खिलाड़ियों ने 4-4 अंक हासिल किए और भारतीय खिलाड़ी ने कुल 15-13 के अंतर से खिताब अपने नाम कर लिया।इस दौरान उन्होंने कई पुरानी चुनौतियों का भी जवाब दिया। साइप्रस कैंडिडेट्स में उन्हें दो बार हराने वाले जावोखिर सिंदारोव के साथ उन्होंने सिंकफील्ड कप में संयुक्त रूप से पहला स्थान हासिल किया। सेमीफाइनल में विन्सेंट कीमर को हराकर उन्होंने पिछली हार का भी हिसाब बराबर किया।बता दें कि आनंद के अनुसार प्रज्ञानानंद की सबसे बड़ी ताकत दबाव के बीच देर से मुकाबला पलटने की क्षमता बनती जा रही है। कैंडिडेट्स की निराशा से लेकर ग्रैंड चेस टूर के खिताब तक का सफर इसी बदलाव की कहानी है। अगले महीने होने वाले शतरंज ओलंपियाड से पहले भारतीय खिलाड़ी का यह प्रदर्शन निश्चित तौर पर आत्मविश्वास बढ़ाने वाला है और अब उनकी नजर अंतरराष्ट्रीय मंच पर इस लय को बरकरार रखने पर है। 

सेंट लुईस में गुरुवार देर रात फैबियानो करूआना को 15-13 से हराकर प्रज्ञानानंद ने ग्रैंड चेस टूर फाइनल का खिताब जीत लिया। इसके साथ ही वह इस प्रतियोगिता को जीतने वाले पहले भारतीय खिलाड़ी बन गए हैं। 11 साल के इतिहास में उनसे पहले केवल छह खिलाड़ी यह उपलब्धि हासिल कर सके हैं। खिताब के साथ उन्हें दो लाख अमेरिकी डॉलर की पुरस्कार राशि भी मिली।
यह जीत इसलिए भी खास मानी जा रही है क्योंकि कुछ महीने पहले तक प्रज्ञानानंद का प्रदर्शन सवालों के घेरे में था। 2026 कैंडिडेट्स प्रतियोगिता में उनका अभियान उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा था। पांच बार के विश्व चैंपियन विश्वनाथन आनंद ने भी उस दौर को उनके लिए मुश्किल समय बताया है। आनंद के मुताबिक पिछले साल के अंत से ही प्रज्ञानानंद की लय कुछ कमजोर हुई थी और कैंडिडेट्स में उनका प्रदर्शन खास प्रभावी नहीं रहा।
लेकिन इसके बाद 21 वर्षीय भारतीय खिलाड़ी ने जिस तरह वापसी की, उसने उन्हें एक बार फिर विश्व शतरंज के शीर्ष खिलाड़ियों की चर्चा में ला दिया है। आनंद ने यहां तक कहा है कि मौजूदा प्रदर्शन को देखते हुए प्रज्ञानानंद को इस समय दुनिया का नंबर एक खिलाड़ी माना जा सकता है। उन्होंने हालांकि यह भी स्पष्ट किया कि मैग्नस कार्लसन सभी समान प्रतियोगिताओं में हिस्सा नहीं लेते हैं, इसलिए यह तुलना पूरी तरह सीधी नहीं है।
गौरतलब है कि प्रज्ञानानंद की वापसी किसी एक प्रतियोगिता तक सीमित नहीं रही। नॉर्वे शतरंज प्रतियोगिता में एक समय वह निचले स्थानों पर थे, लेकिन लगातार चार जीत दर्ज कर उन्होंने स्थिति बदल दी। इसके बाद ग्रैंड चेस टूर में उनका प्रदर्शन और मजबूत हुआ। सेंट लुईस पहुंचने से पहले वह रैपिड वर्ग जीत चुके थे और ब्लिट्ज में भी पर्याप्त अंक हासिल कर चुके थे।
फाइनल में शुरुआत हालांकि उनके पक्ष में नहीं रही। फैबियानो करूआना के खिलाफ पहला शास्त्रीय मुकाबला हारने के बाद दूसरे मुकाबले में भी उन्हें बराबरी का अच्छा मौका गंवाना पड़ा। इसके बाद प्रज्ञानानंद ने रैपिड के दोनों मुकाबले जीतकर बढ़त बना ली। चार बाजियों के ब्लिट्ज वर्ग में दोनों खिलाड़ियों ने 4-4 अंक हासिल किए और भारतीय खिलाड़ी ने कुल 15-13 के अंतर से खिताब अपने नाम कर लिया।
इस दौरान उन्होंने कई पुरानी चुनौतियों का भी जवाब दिया। साइप्रस कैंडिडेट्स में उन्हें दो बार हराने वाले जावोखिर सिंदारोव के साथ उन्होंने सिंकफील्ड कप में संयुक्त रूप से पहला स्थान हासिल किया। सेमीफाइनल में विन्सेंट कीमर को हराकर उन्होंने पिछली हार का भी हिसाब बराबर किया।
बता दें कि आनंद के अनुसार प्रज्ञानानंद की सबसे बड़ी ताकत दबाव के बीच देर से मुकाबला पलटने की क्षमता बनती जा रही है। कैंडिडेट्स की निराशा से लेकर ग्रैंड चेस टूर के खिताब तक का सफर इसी बदलाव की कहानी है। अगले महीने होने वाले शतरंज ओलंपियाड से पहले भारतीय खिलाड़ी का यह प्रदर्शन निश्चित तौर पर आत्मविश्वास बढ़ाने वाला है और अब उनकी नजर अंतरराष्ट्रीय मंच पर इस लय को बरकरार रखने पर है।

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