इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक जनहित याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता पर 2 लाख का जुर्माना लगाया है। कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता ने इसी मामले से जुड़ी पिछली न्यायिक कार्यवाहियों को छिपाया और यह गलत घोषणा की कि इससे पहले उसने कोई पीआईएल या रिट याचिका दाखिल नहीं है। यह आदेश चीफ़ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेन्द्र की खंडपीठ ने दिया। मामला बरेली के मोहनपुर ठिरिया स्थित नगर निगम के बूचड़खाने के संचालन के लिए वर्ष 2015 में मार्या फ्रोजेन एग्रो फूड प्रोडक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड के पक्ष में दिए गए टेंडर से जुड़ा था। याचिकाकर्ता शैलेश सिंह, जिन्होंने खुद को जनहितैषी नागरिक और खोजी पत्रकार बताया था, उसने टेंडर को चुनौती देते हुए नए सिरे से टेंडर कराने की मांग की थी। सुनवाई के दौरान कोर्ट में खुलीं बातें सुनवाई के दौरान कोर्ट को पता चला कि याचिकाकर्ता इससे पहले भी इसी विषय से संबंधित पीआईएल और एनजीटी की कार्यवाहियों को लेकर याचिका दाखिल कर चुका था। वर्ष 2024 की एक पीआईएल वापस ले ली गई थी, जबकि दूसरी में हाईकोर्ट ने एनजीटी का रुख करने की स्वतंत्रता दी थी। इसके बाद एनजीटी में भी कार्यवाही शुरू की गई और 2025 में एक अन्य ओरिजनल अप्लिकेशन (ओए) दाखिल की गई, जो लंबित थी। पीआईएल व्यक्तिगत लाभ, निजी मुनाफे के लिए नहीं कोर्ट ने कहा कि इन सभी कार्यवाहियों का वर्तमान पीआईएल में कोई खुलासा नहीं किया गया है। इसके बावजूद याचिकाकर्ता ने शपथपत्र में यह घोषणा की कि उसने कोई महत्वपूर्ण तथ्य नहीं छिपाया है और पहले कोई पीआईएल या रिट याचिका दाखिल नहीं की गई है। हाईकोर्ट ने इस घोषणा को प्रत्यक्ष झूठ बताया। कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता प्रतिवादी कंपनी के प्रतिस्पर्धियों के इशारे पर प्रॉक्सी ( छद्म ) क्षमता में काम करता हुआ प्रतीत होता है। अदालत ने कहा कि पीआईएल का इस्तेमाल व्यक्तिगत लाभ, निजी मुनाफे या किसी छिपे हुए उद्देश्य के लिए नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि रिट क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति अदालत के सामने पूरे और सही तथ्यों के साथ आए। महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है। हाईकोर्ट ने पीआईएल को “कानून की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग” बताते हुए खारिज कर दिया और याचिकाकर्ता को एक महीने के भीतर 2 लाख हाईकोर्ट की लीगल सर्विसेज कमेटी में जमा करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि राशि जमा न करने पर इसे भू-राजस्व के बकाये के रूप में वसूलने की कार्रवाई की जा सकेगी।

