मिर्जापुर में कारगिल युद्ध के वीर योद्धा नायक दीपचंद ने रविवार को विंध्याचल धाम पहुंचकर मां विंध्यवासिनी के दर्शन-पूजन किए। उन्होंने विधि-विधान से माता की पूजा कर देश की सुख-समृद्धि, शांति और सुरक्षा की कामना की। युद्ध और उसके बाद आई मुश्किलों के बावजूद अदम्य साहस के साथ जीवन में आगे बढ़ रहे नायक दीपचंद का विंध्याचल पहुंचना श्रद्धालुओं के लिए प्रेरणादायी रहा। मंदिर पहुंचते ही श्रद्धालुओं ने सराहा जज्बा मां विंध्यवासिनी के दर्शन के दौरान नायक दीपचंद ने देशवासियों के कल्याण और सभी पर माता की कृपा बनाए रखने की प्रार्थना की। मंदिर परिसर में मौजूद श्रद्धालुओं को जब उनके कारगिल युद्ध के योगदान और संघर्ष के बारे में जानकारी हुई तो लोगों ने उनके साहस और देश के प्रति समर्पण की सराहना की। तोलोलिंग की लड़ाई में निभाई अहम भूमिका हरियाणा के हिसार जिले के पाबड़ा गांव में जन्मे नायक दीपचंद भारतीय सेना की 1889 मिसाइल रेजिमेंट में तैनात थे। वर्ष 1999 के कारगिल युद्ध में तोलोलिंग की लड़ाई के दौरान उनकी यूनिट ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। बताया जाता है कि उन्होंने अपनी गन से तोलोलिंग पोस्ट पर पहला गोला दागा था, जो सीधे दुश्मन के ठिकाने पर लगा। युद्ध के दौरान उनकी यूनिट को कई बार अपनी गन की पोजीशन बदलनी पड़ी। इस दौरान दुश्मन के ठिकानों पर करीब 10 हजार गोले दागे गए। ‘गोला-बारूद भरपूर मिलना चाहिए’ कारगिल युद्ध के दौरान जब अधिकारियों ने उनका हालचाल पूछा तो नायक दीपचंद ने कहा था— “साहब, राशन मिले न मिले, लेकिन गोला-बारूद भरपूर मिलना चाहिए।” उनका यह जवाब सैनिकों के जज्बे और देश की रक्षा के प्रति उनकी कर्तव्यनिष्ठा की मिसाल माना जाता है। विस्फोट में गंवाए दोनों पैर और एक हाथ कारगिल युद्ध के बाद ऑपरेशन पराक्रम के दौरान हुए एक भीषण विस्फोट में नायक दीपचंद ने अपने दोनों पैर और एक हाथ गंवा दिए। इसके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। कृत्रिम अंगों के सहारे उन्होंने दोबारा जीवन जीना सीखा और अपनी सकारात्मक सोच से मुश्किलों को मात दी। आज नायक दीपचंद प्रेरणादायक वक्ता के रूप में युवाओं और देशवासियों को संबोधित करते हैं। अपने अनुभवों के जरिए वह युवाओं में देशभक्ति, आत्मविश्वास और विपरीत परिस्थितियों से लड़ने का जज्बा पैदा कर रहे हैं।

