राम मंदिर निर्माण के बाद अयोध्या को भाजपा का सबसे मजबूत राजनीतिक गढ़ माना गया। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव ने इस धारणा को बड़ा झटका दिया। फैजाबाद लोकसभा सीट से सपा के अवधेश प्रसाद ने भाजपा के लल्लू सिंह को 54,567 वोट से हराकर ऐतिहासिक जीत दर्ज की। सपा को 48.59% और भाजपा को 43.81% वोट मिले। बसपा को भी 4.07% वोट मिले। अब 2027 के विधानसभा चुनाव में यही नतीजा भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ा है। जिले की पांचों सीटों पर भाजपा के लिए 2017 जैसा प्रदर्शन दोहराना आसान नहीं होगा। 2017 में भाजपा की लहर, 2022 में बदला समीकरण 2017 का विधानसभा चुनाव न सिर्फ भाजपा के लिए दो दशक का सूखा समाप्त करने वाला रहा था, बल्कि जिले की पांचों विधानसभा सीटों पर भाजपा ने ऐतिहासिक जीत भी प्राप्त की थी। इससे पहले मंदिर आंदोलन के उबाल के दौर में वर्ष 1991 के चुनाव में भाजपा ने जिले की पांचों विधानसभा सीटों पर जीत प्राप्त की थी। इसके बाद अयोध्या और रुदौली छोड़ अन्य सीटों पर भाजपा ने 24 साल बाद वापसी की थी। पिछले विधानसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन के बावजूद गैर भाजपा दलों का सूपड़ा साफ हो गया और भाजपा नेताओं ने रिकार्ड मतों से विजय प्राप्त की। जबकि 2022 में तस्वीर फिर बदली। सपा ने मिल्कीपुर और गोसाईगंज में वापसी की, जबकि अयोध्या, बीकापुर और रुदौली भाजपा के पास रहीं। अयोध्या सदर में भाजपा के वेद प्रकाश गुप्ता ने 2022 में 49.04% वोट लेकर पवन पांडेय को 19,990 वोट से हराया। इसके बावजूद सपा को 40.40% वोट मिले। यानी भाजपा की जीत के बावजूद सपा का आधार मजबूत बना रहा। मिल्कीपुर-गोसाईगंज में सपा की वापसी का संकेत मिल्कीपुर और गोसाईगंज में 2022 का परिणाम भाजपा के लिए चेतावनी रहा। दोनों सीटों पर सपा ने वापसी की। मिल्कीपुर में अवधेश प्रसाद की जीत ने बाद में लोकसभा चुनाव में भी राजनीतिक आधार तैयार किया। यही वजह है कि 2024 में उन्हीं अवधेश प्रसाद ने फैजाबाद लोकसभा सीट पर भाजपा के मजबूत गढ़ में सेंध लगा दी। बबलू की दावेदारी से भाजपा के लिए चुनौती बीकापुर विधानसभा सीट पर बसपा की ओर से पूर्व विधायक जितेंद्र सिंह बबलू की दावेदारी सबसे मजबूत मानी जा रही है। 2007 में बबलू ने 10,223 वोटों से जीत दर्ज की थी। 2017 में भी बबलू बसपा के टिकट पर करीब 22% वोट पाने में सफल रहे थे। 2022 में बसपा का वोट शेयर घटकर करीब 8.8% रह गया। हालांकि भाजपा और सपा के बीच महज 5,560 वोटों का अंतर रहा। ऐसे में बबलू की सर्व समाज में पकड़ और बसपा के दलित वोट बैंक की वापसी भाजपा-सपा दोनों का गणित बिगाड़ सकती है। कांग्रेस के साथ गठबंधन से सपा को सीधा फायदा 2027 में सपा-कांग्रेस गठबंधन हुआ तो इसका असर सिर्फ वोट जोड़ने तक सीमित नहीं रहेगा। कांग्रेस के पारंपरिक वोट और सपा के पीडीए समीकरण का मेल भाजपा के सामने चुनौती बढ़ा सकता है। खासकर अयोध्या सदर जैसी सीट पर कांग्रेस की अपनी दावेदारी रही तो सीट बंटवारा महत्वपूर्ण होगा। इसी संदर्भ में पवन पांडेय की उम्मीदवारी की पहले घोषणा को भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सपा ने अयोध्या सीट पर अपना दावा पहले ही स्पष्ट कर दिया है। गठबंधन की स्थिति में सीट उसके पास रहने पर पवन सीधे मुकाबले में होंगे। 2024 का संदेश भाजपा के लिए सबसे बड़ा संकेत 2024 में राम मंदिर के उद्घाटन के कुछ ही महीने बाद फैजाबाद लोकसभा सीट पर भाजपा की हार ने यह संदेश दिया कि अयोध्या में सिर्फ धार्मिक मुद्दा ही चुनाव का निर्णायक आधार नहीं है। रोजगार, महंगाई, विकास, विस्थापन और स्थानीय नाराजगी जैसे मुद्दे भी मतदाताओं के फैसले को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए 2027 में भाजपा के सामने चुनौती सिर्फ सपा प्रत्याशियों से नहीं होगी। सपा-कांग्रेस गठबंधन हुआ और बसपा ने अपने वोट बैंक को बनाए रखा तो मुकाबला और पेचीदा होगा। अयोध्या की पांचों सीटों के पिछले चुनावी आंकड़े बताते हैं कि यहां जीत के लिए सिर्फ मजबूत संगठन नहीं, बल्कि वोटों के बिखराव और गठबंधन के गणित को साधना भी जरूरी होगा।

