महोबा में रक्षाबंधन का पर्व 844 साल पुरानी परंपरा के तहत राखी के दूसरे दिन मनाया जाता है। इसी ऐतिहासिक विजय की याद में शुक्रवार 29 अगस्त से 15 दिवसीय कजली महोत्सव शुरू होगा। कीरत सागर तट पर होने वाले इस आयोजन में बुंदेली संस्कृति और लोक कलाओं की झलक देखने को मिलेगी। राखी के दिन हुआ था भुजरियों का युद्ध इतिहासकारों और आल्हा गायकों के अनुसार, करीब 844 साल पहले कीरत सागर के तट पर भुजरियों का युद्ध हुआ था। उस समय दिल्ली के राजा पृथ्वीराज चौहान की सेना ने महोबा पर हमला किया था। महोबा के वीर योद्धा आल्हा और ऊदल उस समय राज्य से बाहर थे। राजकुमारी चंद्रावल ने संभाली तलवार रक्षाबंधन के दिन राजकुमारी चंद्रावल अपनी सखियों के साथ तलवार लेकर युद्ध में उतर गई थीं। उन्होंने चौहान सेना का मुकाबला किया। इसकी जानकारी मिलने पर आल्हा और ऊदल साधु के वेश में रणभूमि पहुंचे और चंदेल सेना का नेतृत्व किया। जीत के बाद बदली रक्षाबंधन की तारीख युद्ध में राजकुमार अभई के बलिदान के बाद चंदेल सेना ने पृथ्वीराज चौहान की सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। इस जीत के बाद राखी के दूसरे दिन कजलियों का विसर्जन किया गया। तभी से महोबा में रक्षाबंधन के अगले दिन विजयोत्सव मनाने की परंपरा चली आ रही है। 29 अगस्त से शुरू होगा महोत्सव इसी ऐतिहासिक परंपरा को जीवंत रखने के लिए 29 अगस्त से कीरत सागर तट पर 15 दिवसीय कजली महोत्सव शुरू होगा। महोबा संरक्षण एवं विकास समिति और आल्हा परिषद की ओर से कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। आल्हा गायन से होगी शुरुआत 29 अगस्त को मां चंद्रिका वंदना, आल्हा गायन, कछियाई और ईसुरी की चौकड़ी होगी। 30 अगस्त को सूफी गजल, साइंस शो और ‘आज के सुदामा’ की प्रस्तुति होगी। बुंदेली और राजस्थानी संस्कृति का संगम 31 अगस्त को बुंदेली कजरी, नाट्य-नृत्य और राजस्थानी नृत्य प्रस्तुत किया जाएगा। 1 से 3 सितंबर तक सोहर, दिवारी नृत्य, पाई डंडा, कथक नाटिका और भोजपुरी भजन संध्या जैसे कार्यक्रम होंगे।

