नेपाल में बाढ़ और विकराल रूप ले सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि हिमालय तेजी से पिघल रहा है। जिसको लेकर 42 ग्लेशियल झीलों को खतरे की श्रेणी में रखा गया है। इसमें ज्यादातर एवरेस्ट क्षेत्र में हैं।
बर्फ तेजी से पिघलने झीलें फैल रही हैं और उनके बांध कभी भी टूट सकते हैं। इससे नीचे बस्तियों, सड़कों, पुलों और पर्यटन स्थलों को भारी नुकसान हो सकता है। इस बीच, वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि अब कैलाश मानसरोवर पर भी सबसे बड़ा खतरा मंडराने लगा है।
बाढ़ से हिल गया नेपाल का पर्यटन क्षेत्र
नेपाल के रासुवा इलाके में बुधवार को आई विकराल बाढ़ ने पूरे पर्यटन जगत को हिलाकर रख दिया है। रासुवागढ़ी-तिमुरे इलाके में अचानक आई इस बाढ़ ने कैलाश मानसरोवर जाने वाले रास्ते को बुरी तरह नुकसान पहुंचाया है।
नेपाल का पर्यटन मुख्य रूप से पहाड़ों पर टिका है। लेकिन अब ये पहाड़ खुद खतरे का संकेत दे रहे हैं। द काठमांडू पोस्ट ने पर्यावरण विशेषज्ञ विजय कुमार सिंह के हवाले से बताया कि नेपाल का पर्यटन मुख्य रूप से पहाड़ों पर निर्भर है। लेकिन यहां जोखिम भी बढ़ रहा है।
उन्होंने आगे कहा कि इसे सही तरीके से समझने और रोकने की जरूरत है। नेपाल दुनिया के कार्बन उत्सर्जन में बहुत कम योगदान देता है, लेकिन जलवायु परिवर्तन का सबसे ज्यादा असर यहीं दिख रहा है।
पर्यटन उद्योग पर लगातार प्रहार
नेपाल का पर्यटन पिछले कुछ सालों से एक के बाद एक झटके झेल रहा है। सितंबर 2024 में काठमांडू घाटी में भारी बाढ़ आई थी। 40 साल में सबसे ज्यादा बारिश हुई। विश्व बैंक के अनुसार, 249 लोग मारे गए, 177 घायल हुए और 10 हजार से ज्यादा परिवार बेघर हो गए।
इससे भी पहले कोविड महामारी ने तो पर्यटन को लगभग बंद ही कर दिया था। जब थोड़ी रिकवरी शुरू हुई तो सितंबर में युवाओं के नेतृत्व में भ्रष्टाचार विरोधी प्रदर्शनों ने फिर से सब रोक दिया। अब रासुवा की यह आपदा सबसे संवेदनशील समय पर आई है।
कैलाश मानसरोवर पर सबसे बड़ा असर
इस साल कैलाश मानसरोवर यात्रा की डिमांड बहुत बढ़ी थी। चीन ने नेपाल होते हुए भारतीय यात्रियों की संख्या 24 हजार तय की थी, जबकि मांग 40 हजार से ज्यादा थी।
उधर, तिब्बती कैलेंडर में घोड़े का साल चल रहा है। इस साल एक परिक्रमा करने का पुण्य 12-13 गुना बताया जाता है। इसलिए यात्री ज्यादा आ रहे थे। नेपाली टूर कंपनियों के लिए यह पैकेज काफी मुनाफे वाला है।
रासुवागढ़ी-केरुंग का 10 दिन का पैकेज करीब 1700 डॉलर का पड़ता है। नेपालगंज, सिमिकोट और हिल्सा जैसे जगहों पर होटल और व्यवसाय चलते हैं। लेकिन अब यह रफ्तार रुकने के आसार हैं।
6-7 महीनों तक उठ नहीं पायेगा नेपाल
पूर्व नेपाल पर्यटन बोर्ड प्रमुख दीपक राज जोशी ने कहा- आपदा के बाद उद्योग पर कम से कम 6-7 महीने तक असर रहेगा। हमें एक समर्पित रिकवरी टीम बनानी चाहिए जो बताए कि नेपाल के बाकी हिस्से सुरक्षित हैं।
कैसे उबर सकता है नेपाल?
द काठमांडू पोस्ट ने पूर्व पर्यावरण मंत्री गणेश शाह के हवाले से बताया कि नई पीढ़ी एडवेंचर पसंद करती है। नेपाल उन्हें आकर्षित कर सकता है। लेकिन इसके लिए सैटेलाइट कम्युनिकेशन और बेहतर तकनीक की जरूरत है ताकि बचाव तेज हो सके।
इस बीच, विशेषज्ञों का कहना है कि अब सिर्फ पर्यटक बढ़ाने से काम नहीं चलेगा। ग्लेशियल झीलों की निगरानी, अर्ली वार्निंग सिस्टम, मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर और तेज बचाव व्यवस्था जरूरी है।
विजय कुमार सिंह का सुझाव है कि इस आपदा को दस्तावेज बनाकर अंतरराष्ट्रीय जलवायु फंड से मदद मांगी जा सकती है। इससे पर्यटन को टिकाऊ बनाया जा सकता है। वरना वही कहानी दोहराई जाती रहेगी और लोग मरते रहेंगे।

