Grandmaster Mayank और उनकी शिष्या Pratiti का Asian Junior में जलवा; एक साथ दो गोल्ड जीत कर किया नाम रोशन

Grandmaster Mayank और उनकी शिष्या Pratiti का Asian Junior में जलवा; एक साथ दो गोल्ड जीत कर किया नाम रोशन

मुंबई में मंगलवार का दिन भारतीय शतरंज के लिए बेहद खास रहा। एक ही आयोजन में देश के दो युवा खिलाड़ियों ने एशियाई जूनियर शतरंज चैंपियनशिप के शास्त्रीय वर्ग का खिताब अपने नाम किया। असम के 17 वर्षीय मयंक चक्रवर्ती ने लड़कों के वर्ग में स्वर्ण पदक जीता, जबकि 13 साल की प्रतीति बोरदोलोई ने लड़कियों के वर्ग में बाजी मार ली। खास बात यह रही कि मयंक पिछले कुछ महीनों से प्रतीति को प्रशिक्षण भी दे रहे थे।मौजूद जानकारी के अनुसार, मयंक चक्रवर्ती पिछले मार्च में भारत के 94वें ग्रैंडमास्टर बने थे। वह पूर्वोत्तर भारत से यह उपलब्धि हासिल करने वाले पहले खिलाड़ी भी हैं। इतनी कम उम्र में ग्रैंडमास्टर बनने के बावजूद मयंक से बातचीत करने पर उनके जवाबों में उम्र से कहीं ज्यादा परिपक्वता नजर आती है।एशियाई जूनियर चैंपियनशिप में मयंक पहले से ही शीर्ष वरीय खिलाड़ी के तौर पर उतरे थे। इससे पहले वह इस प्रतियोगिता के तीव्र शतरंज वर्ग का खिताब भी जीत चुके हैं। हालांकि, उनके लिए शास्त्रीय वर्ग का खिताब ज्यादा महत्वपूर्ण है। मयंक के मुताबिक, शास्त्रीय शतरंज वही प्रारूप है जिसमें विश्व चैंपियन बनने की राह तय होती है और इसमें जीत हासिल करना दूसरे खिलाड़ियों पर अपनी श्रेष्ठता साबित करने जैसा है।उन्होंने बताया कि तीव्र शतरंज प्रतियोगिता एक दिन में समाप्त हो जाती है, जबकि शास्त्रीय मुकाबले छह से सात दिन तक चल सकते हैं। इस वजह से इसमें ज्यादा मेहनत, मानसिक तैयारी और शुरुआती चालों की गहरी तैयारी की जरूरत होती है। उनके अनुसार, तीव्र शतरंज में मुख्य रूप से तेजी से खेलना होता है, जबकि शास्त्रीय शतरंज में तैयारी और धैर्य दोनों की बड़ी भूमिका होती है।इसी प्रतियोगिता में 13 वर्षीय प्रतीति बोरदोलोई ने लड़कियों का खिताब जीतकर स्वर्ण पदक हासिल किया। बेंगलुरु में रहने वाली प्रतीति के लिए यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि उन्होंने इसी साल इटली के मोंटे सिल्वानो में आयोजित विश्व युवा शतरंज चैंपियनशिप में रजत पदक जीता था। उस प्रतियोगिता में वह भारत की एकमात्र पदक विजेता रही थीं।गौरतलब है कि मयंक पिछले तीन से चार महीनों से प्रतीति को प्रशिक्षण दे रहे हैं। दोनों की तैयारी इटली में आयोजित विश्व युवा चैंपियनशिप के दौरान शुरू हुई थी। हालांकि, मुंबई में चल रही प्रतियोगिता के दौरान मयंक खुद भी मुकाबले खेल रहे थे, इसलिए वह प्रतीति की ज्यादा मदद नहीं कर सके। प्रतीति ने बताया कि प्रतियोगिता से पहले मयंक ने खास तौर पर शुरुआती चालों की तैयारी में उनकी मदद की थी।प्रतीति इस प्रतियोगिता में लड़कियों के वर्ग की शीर्ष वरीय खिलाड़ी थीं। ऐसे में उन पर उम्मीदों का दबाव भी था। उनकी मां प्रांती दत्ता बोरदोलोई ने कहा कि शीर्ष वरीय होने पर दबाव से बचना आसान नहीं होता। उनके मुताबिक, जब किसी खिलाड़ी को सबसे आगे रखा जाता है तो उससे हर हाल में जीत की उम्मीद जुड़ जाती है।प्रतीति की जीत के साथ उन्हें महिला ग्रैंडमास्टर की उपाधि के लिए जरूरी मानकों में से एक मानदंड भी हासिल हुआ है। मयंक के लिए यह उपलब्धि इसलिए और खास रही क्योंकि उनके अपने खिताब के साथ उनकी शिष्या भी उसी दिन चैंपियन बनीं। उन्होंने कहा कि खुद चैंपियन बनने की खुशी तो है ही, लेकिन अपने विद्यार्थी को चैंपियन बनते देख खुशी और बढ़ गई है।बता दें कि ग्रैंडमास्टर बनने के बाद भी मयंक की दिनचर्या में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है। उनका कहना है कि संघर्ष अब भी जारी है और जिंदगी पहले जैसी ही है। वह समय का बेहतर इस्तेमाल करने के लिए तय दिनचर्या का पालन करते हैं। सोशल मीडिया और दूसरी गैरजरूरी चीजों से दूरी बनाकर वह पढ़ाई, शतरंज और प्रशिक्षण पर ध्यान देते हैं।मयंक की अगली चुनौती भी ज्यादा दूर नहीं है। अगले पांच दिनों में उन्हें तुर्किये और उसके बाद मलेशिया में होने वाली अंतरराष्ट्रीय शतरंज प्रतियोगिताओं के लिए रवाना होना है। वहीं प्रतीति और उनका परिवार इस जीत और महिला ग्रैंडमास्टर मानदंड से संतुष्ट है। उनकी मां का कहना है कि भारत में रहकर तैयारी और प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना विदेशों की तुलना में काफी कम खर्चीला है। विदेश में इसी तरह की गतिविधियों पर करीब दस गुना अधिक खर्च हो सकता है। इस तरह मयंक और प्रतीति की यह साझी सफलता भारतीय शतरंज के लिए नई पीढ़ी की मजबूत तस्वीर पेश कर रही है। 

मुंबई में मंगलवार का दिन भारतीय शतरंज के लिए बेहद खास रहा। एक ही आयोजन में देश के दो युवा खिलाड़ियों ने एशियाई जूनियर शतरंज चैंपियनशिप के शास्त्रीय वर्ग का खिताब अपने नाम किया। असम के 17 वर्षीय मयंक चक्रवर्ती ने लड़कों के वर्ग में स्वर्ण पदक जीता, जबकि 13 साल की प्रतीति बोरदोलोई ने लड़कियों के वर्ग में बाजी मार ली। खास बात यह रही कि मयंक पिछले कुछ महीनों से प्रतीति को प्रशिक्षण भी दे रहे थे।
मौजूद जानकारी के अनुसार, मयंक चक्रवर्ती पिछले मार्च में भारत के 94वें ग्रैंडमास्टर बने थे। वह पूर्वोत्तर भारत से यह उपलब्धि हासिल करने वाले पहले खिलाड़ी भी हैं। इतनी कम उम्र में ग्रैंडमास्टर बनने के बावजूद मयंक से बातचीत करने पर उनके जवाबों में उम्र से कहीं ज्यादा परिपक्वता नजर आती है।
एशियाई जूनियर चैंपियनशिप में मयंक पहले से ही शीर्ष वरीय खिलाड़ी के तौर पर उतरे थे। इससे पहले वह इस प्रतियोगिता के तीव्र शतरंज वर्ग का खिताब भी जीत चुके हैं। हालांकि, उनके लिए शास्त्रीय वर्ग का खिताब ज्यादा महत्वपूर्ण है। मयंक के मुताबिक, शास्त्रीय शतरंज वही प्रारूप है जिसमें विश्व चैंपियन बनने की राह तय होती है और इसमें जीत हासिल करना दूसरे खिलाड़ियों पर अपनी श्रेष्ठता साबित करने जैसा है।
उन्होंने बताया कि तीव्र शतरंज प्रतियोगिता एक दिन में समाप्त हो जाती है, जबकि शास्त्रीय मुकाबले छह से सात दिन तक चल सकते हैं। इस वजह से इसमें ज्यादा मेहनत, मानसिक तैयारी और शुरुआती चालों की गहरी तैयारी की जरूरत होती है। उनके अनुसार, तीव्र शतरंज में मुख्य रूप से तेजी से खेलना होता है, जबकि शास्त्रीय शतरंज में तैयारी और धैर्य दोनों की बड़ी भूमिका होती है।
इसी प्रतियोगिता में 13 वर्षीय प्रतीति बोरदोलोई ने लड़कियों का खिताब जीतकर स्वर्ण पदक हासिल किया। बेंगलुरु में रहने वाली प्रतीति के लिए यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि उन्होंने इसी साल इटली के मोंटे सिल्वानो में आयोजित विश्व युवा शतरंज चैंपियनशिप में रजत पदक जीता था। उस प्रतियोगिता में वह भारत की एकमात्र पदक विजेता रही थीं।
गौरतलब है कि मयंक पिछले तीन से चार महीनों से प्रतीति को प्रशिक्षण दे रहे हैं। दोनों की तैयारी इटली में आयोजित विश्व युवा चैंपियनशिप के दौरान शुरू हुई थी। हालांकि, मुंबई में चल रही प्रतियोगिता के दौरान मयंक खुद भी मुकाबले खेल रहे थे, इसलिए वह प्रतीति की ज्यादा मदद नहीं कर सके। प्रतीति ने बताया कि प्रतियोगिता से पहले मयंक ने खास तौर पर शुरुआती चालों की तैयारी में उनकी मदद की थी।
प्रतीति इस प्रतियोगिता में लड़कियों के वर्ग की शीर्ष वरीय खिलाड़ी थीं। ऐसे में उन पर उम्मीदों का दबाव भी था। उनकी मां प्रांती दत्ता बोरदोलोई ने कहा कि शीर्ष वरीय होने पर दबाव से बचना आसान नहीं होता। उनके मुताबिक, जब किसी खिलाड़ी को सबसे आगे रखा जाता है तो उससे हर हाल में जीत की उम्मीद जुड़ जाती है।
प्रतीति की जीत के साथ उन्हें महिला ग्रैंडमास्टर की उपाधि के लिए जरूरी मानकों में से एक मानदंड भी हासिल हुआ है। मयंक के लिए यह उपलब्धि इसलिए और खास रही क्योंकि उनके अपने खिताब के साथ उनकी शिष्या भी उसी दिन चैंपियन बनीं। उन्होंने कहा कि खुद चैंपियन बनने की खुशी तो है ही, लेकिन अपने विद्यार्थी को चैंपियन बनते देख खुशी और बढ़ गई है।
बता दें कि ग्रैंडमास्टर बनने के बाद भी मयंक की दिनचर्या में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है। उनका कहना है कि संघर्ष अब भी जारी है और जिंदगी पहले जैसी ही है। वह समय का बेहतर इस्तेमाल करने के लिए तय दिनचर्या का पालन करते हैं। सोशल मीडिया और दूसरी गैरजरूरी चीजों से दूरी बनाकर वह पढ़ाई, शतरंज और प्रशिक्षण पर ध्यान देते हैं।
मयंक की अगली चुनौती भी ज्यादा दूर नहीं है। अगले पांच दिनों में उन्हें तुर्किये और उसके बाद मलेशिया में होने वाली अंतरराष्ट्रीय शतरंज प्रतियोगिताओं के लिए रवाना होना है। वहीं प्रतीति और उनका परिवार इस जीत और महिला ग्रैंडमास्टर मानदंड से संतुष्ट है। उनकी मां का कहना है कि भारत में रहकर तैयारी और प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना विदेशों की तुलना में काफी कम खर्चीला है। विदेश में इसी तरह की गतिविधियों पर करीब दस गुना अधिक खर्च हो सकता है। इस तरह मयंक और प्रतीति की यह साझी सफलता भारतीय शतरंज के लिए नई पीढ़ी की मजबूत तस्वीर पेश कर रही है।

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