Nepal Glacier Collapse: नेपाल-तिब्बत सीमा पर आई विनाशकारी बाढ़ को लेकर सैटेलाइट तस्वीरों ने ऐसी तस्वीर सामने रखी है, जिसने तबाही की पूरी कहानी को नया मोड़ दे दिया है। जिस पहाड़ी ढलान पर आपदा से पहले हरियाली और बर्फ नजर आ रही थी, वहां बाद में दूर-दूर तक भूरा मलबा दिखाई दिया। शुरुआती जांच में संकेत मिले हैं कि करीब 5,200 मीटर की ऊंचाई पर ग्लेशियर का हिस्सा टूटकर नीचे गिरा और बर्फ, चट्टान व पानी की प्रचंड लहर ने घाटियों को रौंद दिया।
Nepal Flash Flood 2026: हरे पहाड़ से भूरे मलबे तक… तस्वीरों में दिखी तबाही
Planet Labs की 25 और 26 अगस्त की सैटेलाइट तस्वीरों में नेपाल-चीन सीमा के आसपास का भू-दृश्य एक दिन के भीतर पूरी तरह बदला हुआ दिखाई देता है। पहले जहां पहाड़ी ढलानों पर हरियाली और बर्फ की परत नजर आती थी, वहीं आपदा के बाद बड़े हिस्से में मिट्टी, चट्टानों और तलछट का फैलाव दिखाई दिया।
विशेषज्ञों के मुताबिक ये तस्वीरें इस बात का महत्वपूर्ण सुराग देती हैं कि बाढ़ की शुरुआत कहां से हुई होगी। सैटेलाइट इमेजरी का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों ने ऊंचाई वाले इलाके में ग्लेशियर के निचले हिस्से के टूटने की संभावना जताई है।
5,200 मीटर से 1,200 मीटर नीचे आया बर्फ-चट्टानों का सैलाब
University of Calgary के अर्थ साइंटिस्ट डैन शुगर के मुताबिक तस्वीरों में करीब 5,200 मीटर की ऊंचाई पर ग्लेशियर का निचला हिस्सा टूटता हुआ प्रतीत होता है। इसके बाद बर्फ और चट्टानों का भारी हिस्सा लगभग 1,200 मीटर नीचे घाटी में आ गिरा।
Sikkim University के इंजीनियरिंग जियोलॉजी विशेषज्ञ विक्रम गुप्ता ने भी सैटेलाइट साक्ष्यों के आधार पर ग्लेशियर के निचले सिरे के टूटने की संभावना जताई है। उनके मुताबिक ग्लेशियर के साथ बड़ी मात्रा में चट्टान और तलछट भी नीचे आई होगी।
यही बर्फ, पत्थर और मलबा आगे जाकर पानी के साथ मिलकर बेहद ताकतवर फ्लैश फ्लड का रूप ले सकता है। ICIMOD के मुताबिक Lende Khola में बड़ी मात्रा में बर्फ और चट्टानी मलबा गिरने से अचानक तेज बहाव पैदा हुआ, जिसने भोटे कोशी और त्रिशूली नदी तंत्र में पानी, मलबा और बड़े-बड़े पत्थर बहा दिए।
30 मिनट में 9 मीटर ऊपर चढ़ा पानी
इस आपदा की भयावहता का अंदाजा सिर्फ तस्वीरों से नहीं, बल्कि नदी के जलस्तर से भी लगाया जा सकता है। ICIMOD के अनुसार Trishuli नदी के Galchhi इलाके में पानी का स्तर करीब 30 मिनट में लगभग 9 मीटर बढ़ गया। Male Khola में भी इसी अवधि में करीब 7 मीटर की वृद्धि दर्ज की गई।
इतनी तेज रफ्तार से आया पानी अपने साथ सिर्फ पानी नहीं लाया। इसमें भारी मात्रा में तलछट, बोल्डर और चट्टानी मलबा शामिल था। यही वजह रही कि रास्ते में आने वाले घरों, पुलों, सड़कों और दूसरी संरचनाओं को संभलने का मौका तक नहीं मिला।
क्या भूकंप ने शुरू की थी तबाही? जांच ने बदली कहानी
आपदा के शुरुआती घंटों में इलाके में दर्ज भूकंपीय गतिविधि को संभावित भूकंप से जोड़कर देखा गया था। लेकिन बाद के विश्लेषण ने तस्वीर बदल दी। Reuters की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के आकलन में संकेत मिला कि दर्ज हुआ seismic signal अलग से आया भूकंप नहीं, बल्कि ग्लेशियर, चट्टानों और मलबे के अचानक टूटने-खिसकने से पैदा हुई गतिविधि हो सकती है।
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि हर संभावित ट्रिगर का जवाब मिल गया है। वैज्ञानिक अभी यह जांच रहे हैं कि आखिर ग्लेशियर का हिस्सा टूटा क्यों। तापमान, बर्फ पिघलने की स्थिति, पहाड़ी ढलानों की अस्थिरता और मानव गतिविधियों जैसे संभावित कारकों पर भी नजर है। ICIMOD ने साफ कहा है कि इस खास घटना में जलवायु परिवर्तन की भूमिका तय करना अभी जल्दबाजी होगी।
आपदा से ठीक पहले घटती बर्फ ने भी बढ़ाया शक
सैटेलाइट तस्वीरों में एक और दिलचस्प बदलाव सामने आया। वैज्ञानिकों ने देखा कि लगभग एक दिन के अंतराल में कुछ ग्लेशियर क्षेत्रों में बर्फ की परत काफी कम दिखाई देने लगी और नीचे की सतह अधिक स्पष्ट नजर आई।
इससे क्षेत्र में अपेक्षाकृत गर्म परिस्थितियों की संभावना पर सवाल उठा है। लेकिन वैज्ञानिकों के पास अभी पर्याप्त मौसम स्टेशन डेटा नहीं है, इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि तापमान में बदलाव सीधे ग्लेशियर टूटने का कारण बना।



Fresh Satellite imagery from Planet shows the aftermath of devastating floods in Betrawoti Bazaar, Nepal, on Aug 26.
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